-‘बेहद गंभीर मामलों में हो बर्खास्तगी का दंड, आश्रितों पर पड़ता है असर’, कोर्ट की अहम टिप्पणी
-सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि किसी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त करने जैसा सख्त दंड देने से पहले अनुशासन प्राधिकरण को बेहद सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि इसका असर न केवल कर्मचारी पर बल्कि उसके आश्रित परिवार पर भी बहुत गंभीर होता है।कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी का दंड केवल उन्हीं मामलों में होना चाहिए, जहां गलत आचरण अत्यंत गंभीर हो और जिसमें नरमी या वैकल्पिक दंड देना उचित न हो।
नई दिल्ली
महिला ने दायर की थी याचिका
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड की एक महिला कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। महिला को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। पीठ ने कहा कि जब कर्मचारी का व्यवहार ऐसा हो जो अनुशासन, भरोसे या संस्थागत कार्यप्रणाली के पूरी तरह खिलाफ हो, तभी बर्खास्तगी उचित मानी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार, रिश्वत, नैतिक पतन, वित्तीय गबन या बड़े आर्थिक नुकसान जैसे मामलों को अलग नजर से देखा जाता है। कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में भ्रष्टाचार या बड़ा नुकसान साबित नहीं होता और कर्मचारी का सेवा रिकॉर्ड लंबा व संतोषजनक रहा हो, वहां कम सख्त सजा पर विचार किया जाना चाहिए।
‘परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सजा तय करे अधिकारी’
इस मामले में कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी की सजा पूरी तरह असंगत है और सक्षम अधिकारी को चाहिए कि वह कर्मचारी की लंबी सेवा, उम्र, कार्य की प्रकृति और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कोई कम सजा तय करे। पीठ ने यह भी कहा कि कर्मचारी को फिर से बहाल नहीं किया जाएगा, क्योंकि वह पहले ही सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुकी है। लेकिन उसे मिलने वाले वेतन और अन्य लाभों का फैसला नए आदेश के आधार पर किया जाएगा।
