सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों में ससुराल पक्ष के लोगों को आपराधिक मामलों में फंसाने की प्रवृत्ति गंभीर चिंता का विषय बन गई है। अदालत ने एक नाबालिग की बुआ के खिलाफ दर्ज पॉक्सो और आईपीसी की धाराओं वाला मामला रद्द करते हुए माना कि शिकायत प्रथम दृष्टया भरोसेमंद नहीं लगती। कोर्ट के अनुसार, एफआईआर पहले दर्ज एक अन्य मामले की जवाबी कार्रवाई जैसी प्रतीत होती है।
नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े मामलों में ससुराल पक्ष के लोगों को बदला लेने के लिए आपराधिक मामलों में घसीटे जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले अक्सर व्यक्तिगत रंजिश निकालने का जरिया बन जाते हैं, जिसमें मासूम लोगों को बेवजह फंसाया जाता है। अदालत ने एक नाबालिग की बुआ के खिलाफ दर्ज पॉक्सो मामला रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। बच्चे के माता-पिता के बीच लंबे समय से वैवाहिक विवाद चल रहा है।
23 जुलाई को दिए अपने आदेश में पीठ ने कहा, “वैवाहिक विवाद से जुड़े मामलों में हिसाब बराबर करने के लिए ससुराल पक्ष के लोगों को आपराधिक मामलों में घसीटना अब आम ही नहीं, बल्कि एक तरह से परंपरा बन गई है। अक्सर बच्चों का इस्तेमाल भी एक-दूसरे को बदनाम करने के लिए किया जाता है। लेकिन इस मामले में तलाकशुदा मां की ओर से लगाए गए ये आरोप चौंकाने वाले हैं कि उसके बेटे का उसकी बुआ लगातार यौन उत्पीड़न करती रही।”
पीठ ने कहा कि बच्चे फिलहाल पिता की अभिरक्षा में हैं और मां को उनसे मिलने का अधिकार दिया गया है। मां का आरोप था कि उसका बेटा तब भी यौन उत्पीड़न की शिकायत करता था, जब वह वैवाहिक घर में रह रही थी। उसने यह भी दावा किया कि उसने ऐसी एक घटना खुद देखी थी।
तलाक के कार्यवाही के दौरान क्यों नहीं लगा ये आरोप?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तलाक की कार्यवाही के दौरान ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया गया था और न ही 17 मार्च 2024 को दर्ज एफआईआर से पहले कभी कोई शिकायत की गई। यह एफआईआर पिता की ओर से दर्ज समान प्रकृति की एफआईआर के कुछ घंटे बाद दर्ज कराई गई थी। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया एफआईआर भरोसा पैदा नहीं करती।
अपीलकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता सना रईस खान ने दलील दी कि यह अभियोजन आपराधिक न्याय प्रणाली के दुरुपयोग का स्पष्ट उदाहरण है और इसे केवल बच्चों की अभिरक्षा को लेकर चल रहे विवाद में निजी रंजिश निकालने के लिए शुरू किया गया। उन्होंने कहा कि आरोप तभी सामने आए, जब पिता ने ननिहाल पक्ष के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। इससे स्पष्ट है कि शिकायत बाल यौन उत्पीड़न के वास्तविक खुलासे के बजाय प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराई गई।
खान ने यह भी कहा कि आरोप लगाने में असामान्य देरी हुई और वे न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज नाबालिग के बयान से भी मेल नहीं खाते। उन्होंने पीठ से कहा कि दोनों पक्षों की ओर से एफआईआर दर्ज होने का यह मतलब नहीं है कि अदालत किसी मामले में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र रूप से जांच करने के अपने दायित्व से पीछे हट जाए या यह न देखे कि क्या प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता है।
हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने की क्या टिप्पणी?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने शुरुआती चरण में रिकॉर्ड देखने के बाद कार्यवाही पर रोक लगाई थी। उस पीठ ने प्रथम दृष्टया माना था कि मां की ओर से दर्ज शिकायत में कोई दम नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा, “यह भी विशेष रूप से दर्ज किया गया था कि प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज पीड़ित बालक के बयान से यह संकेत मिलता है कि वास्तविक शिकायतकर्ता की ओर से बताए गए प्रकार का कोई हमला नहीं हुआ था।”
पीठ ने कहा कि बाद में मामले की सुनवाई करने वाली हाईकोर्ट की खंडपीठ को रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर गौर करना चाहिए था, खासकर तब जब दूसरी खंडपीठ अंतरिम आदेश में प्रथम दृष्टया यह कह चुकी थी कि आरोप टिक नहीं सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “मामले की समग्र परिस्थितियों को देखते हुए हमारा मानना है कि याचिकाकर्ता को मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर करने का कोई कारण नहीं है। साथ ही, नोटिस की तामील होने के बावजूद दूसरी प्रतिवादी यानी मां भी अदालत में पेश नहीं हुई।”
