OPINION: मीम से शुरू हुई सीजेपी ने वो कर दिखाया जो 12 साल में पूरा विपक्ष मिलकर भी नहीं कर पाया

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नीट-यूजी पेपर लीक मामले में छात्रों के भारी विरोध के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है. इस मूवमेंट को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और सोनम वांगचुक ने लीड किया. मीम से शुरू हुई इस पार्टी ने 12 साल में वो कर दिखाया जो विपक्ष नहीं कर सका. यह इस्तीफा विपक्षी पार्टियों के लिए भी एक बड़ा सबक है कि युवा उनके पीछे क्यों नहीं खड़े होते.

‘झुकती है दुनिया, बस झुकाने वाला चाहिए.’ यह डायलॉग कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दिपके का है. उन्होंने यह बात शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा देने के बाद कही. नीट-यूजी परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का भारी विरोध चल रहा था. इसी दबाव में शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी. यह एक मीम से उठ खड़ी हुई पार्टी की बड़ी जीत है. सिर्फ दो महीने पुरानी सीजेपी ने वो कर दिखाया जो 12 साल में विपक्ष नहीं कर सका. अभिजीत ने कहा, ‘हमने यह कर दिखाया है. धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस बात का सबूत है. अगर आप सरकार से नहीं डरते तो किसी का भी इस्तीफा ले सकते हैं.’ यह विरोध और इस्तीफा देश की राजनीति में एक नया चैप्टर है. इससे विपक्ष को भी बहुत कुछ सीखने की जरुरत है.
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की अहमियत समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. आपको ललित मोदी विवाद के वक्त राजनाथ सिंह का वह बयान शायद याद होगा. कांग्रेस उस वक्त बीजेपी के कुछ बड़े नेताओं का इस्तीफा मांग रही थी. तब राजनाथ सिंह ने कहा था, ‘हमारे यहां मंत्री इस्तीफा नहीं देते. यह यूपीए नहीं बल्कि एनडीए है.’ यह बात काफी हद तक सच भी साबित हुई थी.
साल 2004 से 2014 तक कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी. उस दौरान कई बड़े मंत्रियों को भ्रष्‍टाचार या प्रशासनिक असफलता के कारण इस्तीफा देना पड़ा था. लेकिन 2014 के बाद से हालात बिल्कुल अलग रहे हैं. पिछले 12 सालों में कई विवाद हुईं और बड़े विरोध भी देखे गए. इसके बावजूद कोई भी विरोध इतना मजबूत नहीं था कि मंत्री का इस्तीफा ले सके.
क्या मोदी कैबिनेट में पहले भी हुए हैं मंत्रियों के इस्तीफे या ये नया है?
साल 2014 के बाद से कई बड़े केंद्रीय मंत्रियों को हटाया गया है. लेकिन उनमें से किसी को भी किसी विरोध के दबाव में कुर्सी नहीं छोड़नी पड़ी. प्रधानमंत्री पर शायद एक ही बार अपनी कैबिनेट बदलने का दबाव दिखा था. साल 2021 में कोविड संकट के दौरान स्वास्थ्‍य मंत्री हर्षवर्धन को हटना पड़ा था. लेकिन उनका जाना बड़े कैबिनेट रिशफल का हिस्सा था.
उस वक्त 12 मंत्रियों ने मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दिया था. रविशंकर प्रसाद और प्रकाश जावड़ेकर का जाना भी हैरान करने वाला था. लेकिन इनमें से कोई भी इस्तीफा किसी बड़े पब्लिक विरोध का नतीजा नहीं था. इस लिहाज से अभिजीत दिपके और उनके आंदोलन ने एक बड़ी सफलता हासिल की है. उन्होंने हाल के समय में नामुमकिन सी लगने वाली चीज को संभव कर दिखाया है.
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल ने बदल दी जंतर-मंतर विरोध की कहानी
अभिजीत दिपके को छात्रों को एकजुट करने का पूरा क्रेडिट मिलता है. लेकिन उनकी यह सफलता शायद सोनम वांगचुक के बिना पॉसिबल नहीं थी. वांगचुक एक मशहूर क्लाइमेट एक्टिविस्ट हैं. उनकी 26 दिन की भूख हड़ताल ने जंतर-मंतर विरोध का पूरा डायनामिक्स बदल दिया. जब सरकार प्रदर्शनकारियों की बात नहीं सुन रही थी तब वांगचुक वहां पहुंचे. उनके हाथ में एक गुलाब का फूल था.
वांगचुक की एंट्री से आंदोलन को सबसे बड़ा बूस्ट मिला. उनकी हंगर स्ट्राइक ने यह तय किया कि मीडिया और देश का फोकस विरोध पर बना रहे. हालांकि गुरुवार रात को वांगचुक के अनशन खत्म होने पर कुछ सवाल भी उठे. अनशन खत्म होते वक्त हॉस्पिटल में दो बड़े केंद्रीय मंत्री मौजूद थे. लेकिन वहां सीजेपी का कोई भी प्रतिनिधि उनके साथ नहीं था. इससे केंद्र के साथ डील की अफवाहें उड़ने लगीं.
सीजेपी ने वांगचुक के अनशन खत्म होने का स्वागत जरूर किया. लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि उनका विरोध जारी रहेगा. इससे आगे के रास्ते पर दोनों के बीच मतभेद के संकेत मिले. आलोचना हुई तो सोनम वांगचुक को एक वीडियो मैसेज जारी करना पड़ा. वांगचुक ने अपने आलोचकों को जवाब दिया और अपनी बात साफ की. इसलिए धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को कई लोग सीजेपी की जीत मान रहे हैं.
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धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: विपक्ष के लिए सीजेपी के प्रोटेस्ट में क्या है सबक? (Photo : PTI)

 

कई लोग इसे वांगचुक के लंबे अनशन के नतीजे से कम आंक रहे हैं. लेकिन सच यह है कि आंदोलन के ज्यादातर हिस्से में दोनों ने एक-दूसरे को सराहा. वांगचुक ने एक्स पर पोस्ट करके इस्तीफे का वेलकम किया. वांगचुक ने कहा, ‘यह डेमोक्रेसी की जीत है. सीधी सड़कों से आई डायरेक्ट डेमोक्रेसी की विक्ट्री. यह शांति और धैर्य की जीत है.’ उन्होंने युवा को डर छोड़ने के लिए बधाई दी.
सीजेपी के जन्म की कहानी भी काफी दिलचस्प है. इस साल 15 मई को चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कमेंट किया था. रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने कहा था कि कुछ बेरोजगार युवा जर्नलिस्ट या सोशल मीडिया यूजर बन जाते हैं. वे सबको टारगेट करना शुरू कर देते हैं. बाद में सीजेआई ने सफाई दी कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया.
सीजेआई ने कहा कि वह फेक डिग्री वाले प्रोफेशनल्स की बात कर रहे थे. लेकिन तब तक शायद काफी देर हो चुकी थी. अगले ही दिन 16 मई को अभिजीत दिपके ने कॉकरोच जनता पार्टी लॉन्च कर दी. दिपके पहले आम आदमी पार्टी के साथ कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजिस्ट के तौर पर काम कर चुके थे. उन्होंने एक सटायर आंदोलन के रूप में इसकी शुरुआत की. उन्होंने एक वेबसाइट बनाई जिसकी टैगलाइन बहुत कैची थी.
वेबसाइट की टैगलाइन थी- आलसी और बेरोजगारों की आवाज. दिपके ने इसे सभी कॉकरोच के लिए एक प्लेटफॉर्म बताया. इसमें शामिल होने की योग्यता बेरोजगार और ऑनलाइन रहना तय की गई. नीट-यूजी पेपर लीक पर गुस्सा बढ़ा तो यह सटायर आंदोलन तेजी से पॉपुलर हुआ. दिपके जून की शुरुआत में भारत लौट आए और जंतर-मंतर पर विरोध को लीड किया. उनकी वापसी को कई लोग शक की नजर से देख रहे थे.
दिपके के लिए सबसे बड़ा चैलेंज अपनी ऑनलाइन फॉलोइंग को ऑफलाइन सपोर्ट में बदलना था. लेकिन उन्हें कई अन्य सोशल एक्टिविस्ट और वांगचुक का सपोर्ट मिला. 25 जुलाई को दिपके और उनके आंदोलन को पहली बड़ी सफलता मिली. छात्रों के विरोध के कारण धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा. दिपके ने सीधे सीजेआई को मैसेज दिया. उन्होंने कहा, ‘हमें कॉकरोच कहने के लिए थैंक्स. अगर आप ऐसा नहीं कहते तो यह इस्तीफा नहीं होता.’
छात्रों के इस सफल विरोध से देश की विपक्षी पार्टियों को क्या सीखना चाहिए?
छात्रों के इस सफल विरोध में विपक्ष के लिए एक कड़ा संदेश छिपा है. विपक्षी पार्टियों ने इस आंदोलन को हाईजैक करने और प्रभावित करने की पूरी कोशिश की. कई पार्टियों के नेता जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ जुड़ भी गए. मेन विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने लाइमलाइट बटोरने के लिए गुरिल्ला टैक्टिक्स का इस्तेमाल किया. वे इस विरोध को सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दरवाजे तक ले गए.
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि विपक्ष ने सरकार पर दबाव जरूर बनाया. संसद का मानसून सत्र चल रहा था और सभी बड़े विपक्षी नेता प्रदर्शनकारियों के इर्द-गिर्द नजर आ रहे थे. वे सब कैमरे की नजर में आना चाहते थे. लेकिन इस विरोध ने विपक्षी पार्टियों के लिए एक कड़वी सच्चाई सामने ला दी है. साल 2021 के किसान आंदोलन के बाद यह दूसरा सफल आंदोलन है.
किसान आंदोलन ने भी मोदी सरकार को बैकफुट पर ला दिया था. तब एनडीए सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने पड़े थे. दोनों ही आंदोलन में एक बात कॉमन थी. दोनों विरोध को सीधे उन स्टेकहोल्डर्स ने लीड किया जो इससे प्रभावित थे. विपक्षी पार्टियों को फ्रिंज पर ही रहने के लिए मजबूर होना पड़ा.
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कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष को इस आंदोलन से काफी कुछ सीखने की जरूरत है. (PTI Photo)

 

आज विपक्ष भले ही युवा की तारीफ कर रहा है. लेकिन विपक्ष को बहुत गहराई से सोचने की जरुरत है. उन्हें खुद से यह सवाल करना चाहिए कि यही युवा उनके पीछे क्यों नहीं खड़े होते. जब युवा अपनी लड़ाई खुद लड़ सकते हैं तो उन्हें राजनीति दलों की जरुरत क्यों महसूस होगी! धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसी बदलते राजनीतिक समीकरण का सबसे बड़ा सबूत है. छात्रों ने बता दिया है कि बिना राजनीतिक बैनर के भी बड़ी जीत हासिल की जा सकती है.
धर्मेंद्र प्रधान का हटना सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं है. यह इस बात का संकेत है कि देश का युवा अब अपने भविष्‍य के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेगा. नीट-यूजी जैसे एग्जाम्स में ट्रांसपेरेंसी बहुत जरुरी है. छात्रों का असली टारगेट देश के एजुकेशन सिस्टम में बड़े रिफॉर्म्स लाना है. वांगचुक ने भी अपने मैसेज में यही बात कही थी. उन्होंने कहा था कि अब अकाउंटेबिलिटी तय हो गई है और अब हमारा फोकस रिफॉर्म्स पर होना चाहिए.
मीम से शुरू हुई एक पार्टी ने सड़क पर उतरकर जो दबाव बनाया, वह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है. विपक्षी पार्टियों को भी अपनी रणनीति बदलने की जरुरत है.