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प्रवासी मजदूरों के हक में सर्वोच्च अदालत का फैसला शराहनीय !

पिछले साल कोरोना की पहली लहर में प्रधानमंत्री मोदी ने अचानक लॉकडाउन का फैसला लिया था। इस फैसले से एक झटके में लाखों लोगों के हाथों से रोजी-रोटी छिन गई थी

पिछले साल कोरोना की पहली लहर में प्रधानमंत्री मोदी ने अचानक लॉकडाउन का फैसला लिया था। इस फैसले से एक झटके में लाखों लोगों के हाथों से रोजी-रोटी छिन गई थी। भारत में मानवता को पीड़ित करने वाली तस्वीरों में अब लॉकडाउन के वक्त की वो तस्वीरें भी शामिल हो चुकी हैं, जिनमें हजारों लोग कड़ी धूप में पैदल अपने घरों की ओर निकल पड़े थे। कई लोगों ने इस लंबे सफर में दम तोड़ दिया था। भूखे-प्यासे, नंगे पैर, अपने बचे-खुचे सामान के साथ गांव-कस्बों की ओर लौटते लोगों का ये दर्द कब भर पाएगा, कहा नहीं जा सकता।

महामारी के इस कठिन दौर में कई समाजसेवी संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रवासी मजदूरों के लिए भोजन की व्यवस्था की थी। केंद्र सरकार ने भी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत 2019 में वन नेशन, वन राशन कार्ड योजना शुरु की थी। इस योजना की शुरुआत 4 राज्यों से हुई थी, लेकिन बाद में घोषणा की गई कि मार्च 2021 तक इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा। हालांकि अब भी कई राज्य ऐसे हैं, जहां यह योजना क्रियान्वित नहीं हो पाई है। और अब इस पर सर्वोच्च अदालत ने निर्देश दिया है कि 31 जुलाई 2021 तक इसे लागू किया जाए ताकि प्रवासी मजदूरों को देश के किसी भी हिस्से में राशन मिल सके।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत देश में 80 करोड़ से ज्यादा लोग सब्सिडी पर गेहूं,  चावल और कुछ दूसरे अन्न खरीदने के पात्र हैं। एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड में इसी को विस्तार दिया गया है। पहले की व्यवस्था में राशनकार्डधारी अगर अपना जिला, राज्य छोड़कर कहीं और चला जाता है, तो वो अपने पुराने राशन कार्ड से राशन नहीं ले सकता, लेकिन अगर यह योजना पूरे देश में लागू हो जाती है, तो कोई लाभार्थी एक जगह से दूसरी जगह जाता है तब भी वो खाद्य सुरक्षा योजना के तहत राशन पर सब्सिडी से वंचित न रहेगा।  इस योजना का उद्देश्य भुखमरी को रोकने के अलावा जनवितरण प्रणाली में हो रहे फर्जीवाड़े को रोकना और बिचौलियों पर लगाम कसना भी है। लेकिन इस योजना के राष्ट्रव्यापी स्तर पर लागू न होने से राशन वितरण में गड़बड़ियां जारी हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, हर्ष मंदर और जगदीप छोड़कर ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें कोरोना की दूसरी लहर के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों से दोबारा बुरी तरह प्रभावित हुए प्रवासी कामगारों के लिए खाद्य सुरक्षा, नकदी हस्तांतरण और अन्य कल्याणकारी उपाय सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई थी। जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने 11 जून को इस संबंध में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और मंगलवार को शीर्ष अदालत ने आदेश सुनाते हुए ‘एक राष्ट्र एक राशन कार्ड’ योजना को लागू करने के लिए 31 जुलाई, 2021 की समय-सीमा तय की है। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे प्रवासी श्रमिकों के लिए सूखा राशन प्रदान करें और महामारी जारी रहने तक सामुदायिक रसोई जारी रखें।

शीर्ष अदालत ने आदेश दिया कि केंद्र सरकार को एक पोर्टल तैयार करना चाहिए जिसमें असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले और प्रवासी मजदूर ख़ुद को रजिस्टर करा सकें और यह काम 31 जुलाई से पहले शुरू हो जाना चाहिए। इसके साथ ही श्रम एवं रोजगार मंत्रालय को डाटा भरने में देर होने पर फटकार लगाते हुए अदालत ने कहा कि उसका लापरवाही भरा रवैया माफ़ करने लायक नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से इस काम में देर होने से पता चलता है कि वह मजदूरों के लिए चिंतित नहीं है और इस बात को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है कि इससे पहले 24 मई को सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रवासी मजदूरों की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया काफी धीमी है। रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को निश्चित तौर पर तेज किया जाए ताकि कोविड के समय प्रवासी मजदूरों को योजनाओं का लाभ मिल सके। लेकिन महीने भर बाद भी अगर शीर्ष अदालत को प्रवासी मजदूरों के हितों की याद सरकार को दिलाना पड़े, तो समझना कठिन नहीं है कि सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं और किन कामों पर उसका कितना ध्यान है।

कोरोना काल में जनता ने लगातार सरकार से राहत की उम्मीदें लगाईं और उसे हर बार पहले से अधिक निराशा का सामना करना पड़ा। सरकार अपनी पीठ थपथपाने के लिए भले यह ढिंढोरा पीटे कि वह 80 करोड़ लोगों को अनाज मुहैया करा रही है, लेकिन सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि आखिर उसने कैसी नीतियां बनाई हैं कि 130 करोड़ की आबादी वाले देश में 80 करोड़ लोगों के लिए भोजन का इंतजाम उसे करना पड़ रहा है। और इस इंतजाम में भी अदालत को दखल देकर गरीबों का हित सुनिश्चित करना पड़ रहा है।

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