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CEC News: भारत के पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन ने 1951-52 में देश का पहला आम चुनाव सफलतापूर्वक कराने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी. उस समय देश में निरक्षरता, मतदाता सूची तैयार करने और करोड़ों लोगों तक मतदान की व्यवस्था पहुंचाने जैसी बड़ी चुनौतियां थीं. महिलाओं की स्वतंत्र पहचान से लेकर चुनाव चिह्नों की व्यवस्था तक, सेन के फैसलों ने भारतीय चुनाव प्रणाली की मजबूत नींव रखी. इसके बावजूद उन्हें वह पहचान नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे. जानिए, कैसे सुकुमार सेन ने भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को जमीन पर उतारकर लोकतंत्र के इतिहास में अमिट छाप छोड़ी.
अगर आम लोगों से देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्तों के नाम बताने को कहा जाए तो उनके जेहन में संभवत: दो नाम ही प्रमुखता से आएंगे. एक टीएन शेषन और दूसरे, ज्ञानेश कुमार. टीएन शेषन का नाम जहां चुनाव प्रक्रिया में सुधार और सख्त चुनावी प्रबंधन की वजहों से इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया, वहीं ज्ञानेश कुमार विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर हुए विवाद जैसी नकारात्मक वजहों से सुर्खियों में आ रहे हैं. इस समय उनके इस्तीफे की मांग को लेकर पूरे विपक्ष ने मोर्चा खोल रखा है. लेकिन यहां उस एक शख्स को भी याद करना मुनासिब होगा, जिसने स्वतंत्र भारत में उस प्रणाली की बुनियाद का पहला पत्थर रखा, जिसके बल पर आज हम स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहते हैं.
यह शख्स थे सुकुमार सेन. भारत के पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त. मार्च 1950 में जब सुकुमार सेन को नवगठित निर्वाचन आयोगकी कमान सौंपी गई तो उनके समक्ष पहली और सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष आम चुनाव का संचालन करना था, जिसमें देश का प्रत्येक वयस्क नागरिक धन, शिक्षा या लिंग के भेदभाव से परे अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सके. देश आजाद होकर एक पूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदल चुका है, देशवासियों को इसके एहसास के लिए भी सार्वभौमिक मताधिकार की व्यवस्था जरूरी थी. इसके पहले ब्रिटिश भारत में भी कुछ चुनाव हुए थे, लेकिन तब सीमित मताधिकार वाली व्यवस्था थी. 1951-52 के पहले आम चुनाव सीमित मताधिकार वाली औपनिवेशिक चुनावी व्यवस्था से सार्वभौमिक मताधिकार वाले लोकतंत्र में छलांग लगाने का एक एतिहासिक अवसर था.
लेकिन इसे ऐतिहासिक अवसर में बदलना कोई आसान काम नहीं था. बड़ी चुनौती ऐसी मतदाता सूचियां तैयार करना थी, जिसमें हर वयस्क व्यक्ति का नाम शामिल हो सके. जब मतदाता सूचियां तैयार की जा रही थीं, तब सेन और उनकी टीम ने देखा कि बड़ी संख्या में पंजीकृत महिला मतदाताओं के असल नाम दर्ज ही नहीं थे. दरअसल, उस वक्त उत्तर और मध्य भारत के कई राज्यों में स्थानीय परंपराएं महिलाओं को किसी बाहरी व्यक्ति के सामने अपना नाम बताने से रोकती थी. इसलिए उनकी पहचान पुरुषों के साथ उनके संबंधों के आधार पर लिखी गई थी (जैसे ‘अ’ की मां, ‘ब’ की पत्नी या ‘स’ की बेटी).
सुकुमार सेन ने तुरंत देशभर के गणनाकारों को निर्देश दिए कि मतदाता सूची में मतदाता का वास्तविक नाम ही शामिल किया जाए. जो महिला अपना सही नाम देने से इनकार करे, उसे मतदाता के रूप में पंजीकृत न किया जाए और यदि बिना नाम के पंजीकरण हो चुका है तो उसे हटा दिया जाए. इस सख्त आदेश का दुखद पहलू यह रहा कि देश की लगभग 8 करोड़ महिला मतदाताओं में से करीब 28 लाख महिलाएं अपना सही नाम दर्ज नहीं करा सकने की वजह से वोट डालने का अवसर गंवा बैठीं. इसमें बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की महिलाओं को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा. हालांकि इसका एक सकारात्मक परिणाम यह माना जा सकता है कि इससे बाद में महिलाओं को अपनी स्वतंत्र पहचान की महत्ता समझ में आई और बाद के वर्षों में पुरुषों के साथ संबंधों पर आधारित पहचान का रुझान कम हुआ.
निरक्षरता एक अलग चुनौती थी…
देश की आजादी के समय 70 फीसदी से भी अधिक मतदाता पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे, इसलिए समस्या यह थी कि मतदाताओं के समक्ष उम्मीदवारों की पहचान कैसे सुनिश्चित की जाए. इसके समाधान के तौर पर उम्मीदवारों की पहचान के लिए प्रत्येक प्रमुख दल और निर्दलीय प्रत्याशी को चुनाव चिह्न आवंटित किए गए. इन चिह्नों को मतपत्र-पेटी पर लगा दिया गया. मतदाताओं को चुनाव आयोग द्वारा दिए गए मतपत्र बस अपने पसंदीदा उम्मीदवार के चिह्न लगी पेटी में ही डालना होता था. (1962 में हुए तीसरे लोकसभा चुनावों के समय इस व्यवस्था में बदलाव करके मतपत्रों में ही उम्मीदवारों के नाम के साथ चिह्न छापने का प्रावधान किया गया.)
देश की आजादी के समय 70 फीसदी से भी अधिक मतदाता पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे, इसलिए समस्या यह थी कि मतदाताओं के समक्ष उम्मीदवारों की पहचान कैसे सुनिश्चित की जाए. इसके समाधान के तौर पर उम्मीदवारों की पहचान के लिए प्रत्येक प्रमुख दल और निर्दलीय प्रत्याशी को चुनाव चिह्न आवंटित किए गए. इन चिह्नों को मतपत्र-पेटी पर लगा दिया गया. मतदाताओं को चुनाव आयोग द्वारा दिए गए मतपत्र बस अपने पसंदीदा उम्मीदवार के चिह्न लगी पेटी में ही डालना होता था. (1962 में हुए तीसरे लोकसभा चुनावों के समय इस व्यवस्था में बदलाव करके मतपत्रों में ही उम्मीदवारों के नाम के साथ चिह्न छापने का प्रावधान किया गया.)
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘इंडिया’ गठबंधन ने मोर्चा खोल दिया है. (पीटीआई)
25 अक्टूबर 1951 से 27 मार्च 1952 तक लगभग पांच महीने की अवधि में ये चुनाव सम्पन्न हुए. देशभर में 2 लाख 24 हजार से अधिक मतदान केंद्र बनाए गए थे, यानी लगभग प्रत्येक 1,000 मतदाताओं पर एक केंद्र. हालांकि इस पहले आम चुनाव में 45.7 फीसदी मतदान ही हुआ, लेकिन 17.3 करोड़ पुरुष और महिला मतदाताओं के लिए ऐसी व्यवस्थाएं करना ही अपने आप में एक बेहद दुष्कर कार्य था, जिसे सेन की अगुवाई वाले निर्वाचन आयोग ने सफलता के साथ पूरा किया.
गौरतलब है कि भारत का संविधान तैयार करने वाली संविधान सभा में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के मुद्दे पर गहन बहस हुई थी. आने वाली तमाम कठिनाइयों और चुनौतियों से अवगत होने के बावजूद संविधान सभा ने बिना किसी झिझक के वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को स्वीकार किया था. पहले आम चुनावों पर अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में सेन ने लिखा था कि ‘संविधान सभा के इस निर्णय ने एक ऐसे महान और ऐतिहासिक प्रयोग का सूत्रपात किया, जो अपने विशाल आकार और जटिलताओं के मामले में पूरी दुनिया में अनूठा था.’
सुकुमार सेन 21 मार्च 1950 को मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे.
मगर वो श्रेय न मिल जाया, जिसके हकदार थे सेन
इस महान प्रयोग को सफल बनाने का जितना श्रेय सेन को मिलना चाहिए था, वह न तो किसी ने दिया और न उन्होंने स्वयं भी लिया. जैसा कि लेखक और इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने लिखा है कि वो सेन ही थे, जिन्होंने भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सार्वभौमिक मताधिकार वाले आम चुनावों को संभव बनाया. वे सेन को भारतीय लोकतंत्र के गुमनाम नायक (अनसंग हीरो) के तौर पर परिभाषित करते हैं. वे लिखते हैं, ‘यह दुखद है कि हम सुकुमार सेन के बारे में इतना कम जानते हैं. उन्होंने कोई संस्मरण नहीं छोड़ा और ऐसा लगता है कि उनके कोई दस्तावेज भी नहीं बचे हैं.’ हालांकि पत्रकार और लेखक विकास लाथर के मुताबिक बंगाल के बर्धमान जिले में उनके नाम पर एक सड़क का नाम जरूर रखा गया है.
इस महान प्रयोग को सफल बनाने का जितना श्रेय सेन को मिलना चाहिए था, वह न तो किसी ने दिया और न उन्होंने स्वयं भी लिया. जैसा कि लेखक और इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने लिखा है कि वो सेन ही थे, जिन्होंने भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सार्वभौमिक मताधिकार वाले आम चुनावों को संभव बनाया. वे सेन को भारतीय लोकतंत्र के गुमनाम नायक (अनसंग हीरो) के तौर पर परिभाषित करते हैं. वे लिखते हैं, ‘यह दुखद है कि हम सुकुमार सेन के बारे में इतना कम जानते हैं. उन्होंने कोई संस्मरण नहीं छोड़ा और ऐसा लगता है कि उनके कोई दस्तावेज भी नहीं बचे हैं.’ हालांकि पत्रकार और लेखक विकास लाथर के मुताबिक बंगाल के बर्धमान जिले में उनके नाम पर एक सड़क का नाम जरूर रखा गया है.
कौन थे सेन?
सेन का जन्म 1899 में हुआ था और महज 22 साल की उम्र में यानी 1921 में आईसीएस (आज की आईएएस) के लिए चुने गए थे. मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनने से पहले उन्होंने वर्ष 1947 से 1950 के बीच बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्य के मुख्य सचिव का दायित्व निभाया. उन्होंने जज के रूप में भी सेवाएं दी थीं. बाद में सूडान ने भी सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के तहत आम चुनाव कराने के लिए सेन की सेवाएं मांगी थीं. वहां 1953 में आम चुनाव हुए थे.
सेन का जन्म 1899 में हुआ था और महज 22 साल की उम्र में यानी 1921 में आईसीएस (आज की आईएएस) के लिए चुने गए थे. मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनने से पहले उन्होंने वर्ष 1947 से 1950 के बीच बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्य के मुख्य सचिव का दायित्व निभाया. उन्होंने जज के रूप में भी सेवाएं दी थीं. बाद में सूडान ने भी सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के तहत आम चुनाव कराने के लिए सेन की सेवाएं मांगी थीं. वहां 1953 में आम चुनाव हुए थे.
