न्यायपालिका पर जनता का भरोसा उसकी सबसे बड़ी ताकत है. लेकिन हाल के दिनों में सामने आए चार अलग-अलग मामलों ने इस भरोसे पर सवाल खड़े कर दिए हैं. कहीं एक जज पर रोड रेज में आम नागरिक से बदसलूकी और अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप लगे, तो कहीं पद पर रहते हुए गैस एजेंसी चलाने, अयोग्य ऑक्शनर की नियुक्ति और विभागीय कार्रवाई जैसे मामले सामने आए. कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी साफ कहा कि न्यायिक अधिकारी का आचरण अदालत के बाहर भी उतना ही महत्वपूर्ण है. आखिर इन चार मामलों ने न्यायपालिका के सामने कैसी चुनौती खड़ी कर दी है, पढ़िए पूरी रिपोर्ट.
नई दिल्ली:
न्यायपालिका को लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ कहा जाता है. आम आदमी अदालत की चौखट पर इसलिए जाता है क्योंकि उसे भरोसा होता है कि यहां कानून किसी व्यक्ति से बड़ा होता है. जज सिर्फ फैसले नहीं सुनाते बल्कि अपने आचरण से भी पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता तय करते हैं. लेकिन जब किसी जज का नाम ऐसे विवादों में आने लगे, जहां उन पर पद के दुरुपयोग, नियमों की अनदेखी या आम नागरिक के साथ अनुचित व्यवहार के आरोप लगें, तब सवाल सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं उठते. सवाल पूरी व्यवस्था पर उठने लगते हैं. पिछले कुछ दिनों में सामने आए चार मामलों ने यही चिंता बढ़ा दी है. इनमें कहीं रोड रेज में जज का गुस्सा दिखा, कहीं सरकारी सेवा के दौरान निजी कारोबार का आरोप लगा तो कहीं नियुक्तियों में नियमों की अनदेखी और विभागीय कार्रवाई की नौबत आ गई.
सबसे ताजा मामला कर्नाटक का है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार यहां एक सिविल जज पर आरोप है कि उन्होंने सड़क पर एक बाइक सवार दंपति का पीछा किया, उनसे बहस की और फिर पुलिस बुलाकर उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया. जब इस घटना का सीसीटीवी वीडियो सामने आया तो मामला हाईकोर्ट पहुंच गया. कोर्ट ने वीडियो देखने के बाद बेहद सख्त टिप्पणी की. दूसरी ओर दिल्ली में भी तीन अलग-अलग न्यायिक अधिकारियों से जुड़े विवाद सामने आए हैं. एक पर पद पर रहते हुए गैस एजेंसी चलाने का आरोप है. दूसरे जज को कथित रूप से अयोग्य कोर्ट ऑक्शनर नियुक्त करने के आरोप में निलंबित किया गया. तीसरी न्यायिक अधिकारी वीना रानी को विभागीय जांच लंबित रहने तक सस्पेंड कर दिया गया. इन सभी मामलों ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या न्यायपालिका में जवाबदेही के मानकों को और मजबूत करने की जरूरत है
चार मामले, एक बड़ा सवाल: क्या न्यायपालिका की साख पर असर पड़ रहा है?
- हाल के इन चार मामलों की प्रकृति अलग-अलग है, लेकिन एक बात समान है. हर मामले में सवाल न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति के आचरण को लेकर उठे हैं. यही वजह है कि इन घटनाओं को सिर्फ व्यक्तिगत विवाद मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. न्यायपालिका का आधार ही जनता का विश्वास है और उस विश्वास को बनाए रखना हर न्यायिक अधिकारी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.
- कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी इसी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारी का आचरण अदालत की चारदीवारी तक सीमित नहीं होता. सार्वजनिक जीवन में उनका व्यवहार भी उतना ही महत्वपूर्ण है. अदालत ने कहा कि अगर न्यायिक अधिकारी अपने पद का प्रभाव दिखाते हैं तो इससे जनता का भरोसा कमजोर पड़ सकता है.
पहला मामला: रोड रेज में महिला जज पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
- कर्नाटक की प्रधान सिविल जज गायत्री ने आरोप लगाया था कि 19 जुलाई को दो बाइक सवारों ने उनकी कार को ओवरटेक किया और एक व्यक्ति हेलमेट नहीं पहने था. इसके बाद पुलिस ने चालान काटा और बाद में दंपति को गिरफ्तार भी कर लिया. लेकिन वायरल सीसीटीवी फुटेज में जज को बाइक सवारों से बहस करते और पुलिस द्वारा युवक की पिटाई होती दिखाई दी.
- वीडियो देखने के बाद न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने कहा, ‘वीडियो स्पष्ट रूप से दिखाता है कि न्यायिक अधिकारी ने ऐसा व्यवहार किया जो उनके पद की गरिमा के बिल्कुल अनुरूप नहीं है. न्यायिक पद जनता के विश्वास का विस्तार है. यह केवल अदालत के भीतर तक सीमित नहीं है. अदालत के बाहर जनता के साथ उनका व्यवहार भी उतना ही महत्वपूर्ण है.’
- कोर्ट ने आगे कहा, ‘सिर्फ इसलिए कि शिकायतकर्ता एक न्यायिक अधिकारी हैं, इसका मतलब यह नहीं कि नागरिकों के साथ उनके कहने पर जैसा चाहें वैसा व्यवहार किया जाए. यदि इस घटना से न्यायिक अधिकारी का अहं आहत हुआ है, तो यह न्यायिक पद के दुरुपयोग का एक क्लासिक उदाहरण बन सकता है.’
