आपातकाल से जुड़ा है आर्टिकल-358, जिसका सुप्रीम कोर्ट में किया गया जिक्र, क्‍या इससे छिन जाती है बोलने की आजादी?

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CJP protest case: दिल्ली में बुलाए गए सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस की कार्रवाई और मेट्रो सेवा बाधित किए जाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की. इस दौरान वकील मेनका गुरुस्वामी ने नागरिक अधिकारों का सवाल उठाते हुए आर्टिकल 358 का जिक्र किया. उन्होंने पूछा क्या ये अघोषित इमरजेंसी है? ऐसे में समझते हैं कि आखिर आर्टिकल-358 क्या है और ये नागरिक अधिकारों पर कैसे प्रभाव डालता है?

CJP प्रोटेस्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई के दौरान आर्टिकल-358 का जिक्र किया गया है. संविधान का ये आर्टिकल आपातकाल से जुड़ा है. शीर्ष अदालत में अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने सवाल उठाया कि आखिर सरकार ने मेट्रो स्टेशन क्यों बंद किए, इंटरनेट क्यों बाधित किया. 7 हजार से ज्यादा लोगों को हिरासत में क्यों लिया गया? उन्होंने तर्क दिया कि संविधान में अनुच्छेद-19 के तहत मिले अधिकार तभी निलंबित होते हैं जब अनुच्छेद 358 लागू हो. क्या राज्य में अघोषित आपातकाल लागू है?

सवाल जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की विशेष पीठ के सामने उठा. रविवार को विशेष पीठ CJP प्रोटेस्ट के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्रवाई, मेट्रो और इंटरनेट बंद करने के मामले की सुनवाई कर रही थी. कोर्ट में प्रदर्शनकारियों की ओर से कपिल सिब्बल, मेनका गुरुस्वामी, शैलेंद्र मणि त्रिपाठी, चांद कुरैशी और इंदिरा जय सिंह समेत अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता थे, जबकि सरकार की ओर से सॉलिस्टर जनरल तुषार मेहता थे. कोर्ट में सॉलिस्टिर जनरल तुषार मेहता ने लगाए गए आरोपों को गलत बताया. उन्होंने कहा कि ये याचिकाएं केंद्र सरकार को उपलब्ध नहीं कराई गईं थीं, इसीलिए सरकार को इन पर जवाब देने का समय चाहिए.

क्या है संविधान का आर्टिकल-358

संविधान का आर्टिकल-358 आपातकाल से संबंधित है. हालांकि यह हर तरह के आपातकाल पर लागू नहीं होता. यह तब लागू होता है जब देश किसी युद्ध या बाहरी आक्रमण से गुजर रहा हो. इसके लागू होते ही संविधान में नागरिक अधिकारों की संरक्षा करने वाला अनुच्छेद-19 अपने आप निलंबित हो जाता है. इसके लिए राष्ट्रपति की ओर से अलग से कोई घोषणा नहीं करनी होती है. आर्टिकल-358 के लागू रहने के दौरान राज्य कोई भी नियम या कानून बनाने में सक्षम है, लेकिन ये कानून तब तक ही माने जाएंगे जब तक अनुच्छेद 358 लागू रहता है. इसके समाप्त होते ही नए नियम भी रद्द हो जाते हैं.
संविधान का आर्टिकल-19 नागरिकों के मौलिक अधिकार से संबंधित है. जो लोगों को अपनी बात कहने, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने, संगठन बनाने और देश में स्वतंत्र रूप से कहीं भी आने जाने की आजादी देता है. हालांकि ये हमेशा पूर्ण नहीं रहते. संविधान में लिखित अन्य अनुच्छेदों के आधार पर इन अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है. आर्टिकल-358 भी ऐसा ही एक अनुच्छेद है, हालांकि ये तभी हो सकता है जब देश में इमरजेंसी के हालात हों. अनुच्छेद-19 के तहत नागरिकों को निम्न अधिकार मिले हैं.
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, यानी अपनी बात कहने, विचार रखने और लिखने का अधिकार.
  • शांतिपूर्वक धरना या प्रदर्शन का अधिकार.
  • संगठन बनाने का अधिकार, जैसे यूनियन या एसोसिएशन.
  • भारत में स्वतंत्र रूप से कहीं भी घूमने का अधिकार.
  • भारत के किसी भी हिस्से में रहने और बसने का अधिकार.
  • पेशा, व्यापार और कारोबार करने का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने क्या दिए आदेश?

पक्ष और विपक्ष की दलीलों को सुनने के बाद शीष अदालत ने निर्देश दिए कि दिल्ली में जो भी बैरिकेड्स लगाए गए हैं उन्हें हटाया जाए और इंटरनेट सेवा बहाल की जाए. अदालत ने ट्रेन और मेट्रो सेवाओं को भी सामान्य समय करने को कहा. हालांकि कोर्ट ने ये कहा कि अगर सार्वजिनक व्यवस्था की स्थिति गंभीर होती है तो प्रशासन कानून के हिसाब से कदम उठा सकता है. मामले की सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं की ओर से कोर्ट के साथ वकीलों के साथ भी दुर्व्यवहार के बारे में बताया गया. इस पर कोर्ट ने स्प्ष्अ किया कि वकीलों को उनके पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा नहीं पहुंचाई जानी चाहिए. कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों को भी नसीहत दी कि अगर जनहित की चिंता है तो वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन का वचन दें.