पितृपक्ष में पितरों को प्रसन्न करने के लिए कई तरह के नियम और मान्यताएं हैं. इनमें से एक है कद्दू की सब्जी बनाना. आखिर क्यों पितृपक्ष में कद्दू की सब्जी बनाना इतना महत्वपूर्ण माना जाता है? पितृपक्ष का क्या महत्व है और पितरों से जुड़ी सदियों पुरानी मान्यताएं क्या कहती हैं, आइए जानते हैं. यह परंपरा पितरों की आत्मा की शांति और परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़ी है.
धार्मिक और लोक मान्यताओं के अनुसार, पितरों के लिए तैयार किया जाने वाला भोजन सात्विक और शुद्ध होना चाहिए. कद्दू को भी सात्विक सब्जियों में गिना जाता है. यही वजह है कि श्राद्ध के भोजन में इसका इस्तेमाल कई जगहों पर विशेष रूप से किया जाता है. मान्यता है कि पितरों के निमित्त तैयार किए गए सात्विक भोजन से उन्हें तृप्ति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है.
कद्दू की एक खास बात यह भी है कि इसे बिना प्याज और लहसुन के आसानी से स्वादिष्ट बनाया जा सकता है. पितृपक्ष में तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है, इसलिए कद्दू की साधारण, सात्विक और हल्की सब्जी श्राद्ध की थाली का हिस्सा बन जाती है.
कद्दू को लेकर भारत के अलग-अलग हिस्सों में कई लोक मान्यताएं भी प्रचलित हैं. कुछ क्षेत्रों में इसे परिवार के बड़े बेटे का प्रतीक तक माना जाता है. इसी कारण कुछ परिवारों में महिलाएं कद्दू को सीधे काटने से परहेज करती हैं. पहले घर का कोई पुरुष कद्दू को दो हिस्सों में काटता है और इसके बाद महिलाएं सब्जी बनाने के लिए उसके छोटे टुकड़े करती हैं. कुछ जगहों पर कद्दू को अकेले काटने की भी परंपरा नहीं है. इसकी जोड़ी बनाने के लिए साथ में नींबू, मिर्च या कोई दूसरी सब्जी रख दी जाती है.
