श्राद्ध के ब्राह्मण भोजन में कद्दू की सब्जी बनाना क्यों है अनिवार्य? जानिए इसके बिना क्यों अधूरा माना जाता है पितृपक्ष का भोज

धर्म

पितृपक्ष में पितरों को प्रसन्न करने के लिए कई तरह के नियम और मान्यताएं हैं. इनमें से एक है कद्दू की सब्जी बनाना. आखिर क्यों पितृपक्ष में कद्दू की सब्जी बनाना इतना महत्वपूर्ण माना जाता है? पितृपक्ष का क्या महत्व है और पितरों से जुड़ी सदियों पुरानी मान्यताएं क्या कहती हैं, आइए जानते हैं. यह परंपरा पितरों की आत्मा की शांति और परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़ी है.

 पितृपक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है. इस दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के साथ खान-पान से जुड़ी कई परंपराओं का भी पालन किया जाता है. इन्हीं में एक मान्यता पितृपक्ष में कद्दू की सब्जी बनाने को लेकर है. कई परिवारों में श्राद्ध के भोजन में कद्दू को सात्विक और शुद्ध सब्जी मानकर विशेष रूप से शामिल किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष में सात्विक भोजन पितरों को समर्पित करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है. कद्दू को लेकर क्षेत्रीय परंपराएं भी अलग-अलग हैं. आखिर पितृपक्ष में कद्दू की सब्जी को इतना महत्व क्यों दिया जाता है और इसके पीछे सदियों पुरानी मान्यता क्या है? जानिए…
अमेरिका में जन्मा कद्दू आज भारतीय किचन की शान है. इसे काशीफल, कुम्हड़ा और पेठा भी कहते हैं. इसे आयुर्वेद में औषधीय फल माना गया है. वहीं, पितृपक्ष में कद्दू का महत्व कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि इस दौरान कई घरों में खास तौर पर बिना प्याज-लहसुन के कद्दू की खट्टी-मीठी सब्जी बनाई जाती है.
दरअसल, पितृपक्ष में अपने पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने के साथ ही, ब्राह्मण भोज और पितरों के निमित्त सात्विक भोजन तैयार करने की भी परंपरा है. इस भोजन में कई ऐसी चीजें शामिल की जाती हैं, जिनका धार्मिक और पारंपरिक महत्व माना गया है. इन्हीं में से एक है कद्दू की सब्जी.
धार्मिक और लोक मान्यताओं के अनुसार, पितरों के लिए तैयार किया जाने वाला भोजन सात्विक और शुद्ध होना चाहिए. कद्दू को भी सात्विक सब्जियों में गिना जाता है. यही वजह है कि श्राद्ध के भोजन में इसका इस्तेमाल कई जगहों पर विशेष रूप से किया जाता है. मान्यता है कि पितरों के निमित्त तैयार किए गए सात्विक भोजन से उन्हें तृप्ति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है.
कद्दू की एक खास बात यह भी है कि इसे बिना प्याज और लहसुन के आसानी से स्वादिष्ट बनाया जा सकता है. पितृपक्ष में तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है, इसलिए कद्दू की साधारण, सात्विक और हल्की सब्जी श्राद्ध की थाली का हिस्सा बन जाती है.
कद्दू को लेकर भारत के अलग-अलग हिस्सों में कई लोक मान्यताएं भी प्रचलित हैं. कुछ क्षेत्रों में इसे परिवार के बड़े बेटे का प्रतीक तक माना जाता है. इसी कारण कुछ परिवारों में महिलाएं कद्दू को सीधे काटने से परहेज करती हैं. पहले घर का कोई पुरुष कद्दू को दो हिस्सों में काटता है और इसके बाद महिलाएं सब्जी बनाने के लिए उसके छोटे टुकड़े करती हैं. कुछ जगहों पर कद्दू को अकेले काटने की भी परंपरा नहीं है. इसकी जोड़ी बनाने के लिए साथ में नींबू, मिर्च या कोई दूसरी सब्जी रख दी जाती है.