दवाओं की एमआरपी और उनकी असल कीमत के बीच भारी अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अहम सवाल पूछा है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने उदाहरण देते हुए बताया कि करीब 27000 रुपये एमआरपी वाली एक कैंसर की दवा का पीटीआर यानी खुदरा विक्रेता मूल्य 2700 रुपये है. अदालत ने पूछा कि क्या दवाओं की कीमत तय करने को लेकर का कोई समान नियम बनाया जा सकता है.
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में दवाओं का खर्च पहले ही मरीजों और उनके परिवारों के लिए बड़ी चिंता होता है. ऐसे में अगर किसी दवा की कीमत और उसकी MRP के बीच कई गुना का अंतर हो, तो सवाल उठना लाजिमी है. यही सवाल अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के सामने रखा है. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने दवाओं की कीमतों के नियमन, जेनेरिक दवाओं की अनिवार्य प्रिस्क्रिप्शन और मेडिकल डिवाइस की कीमतों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दवाओं की एमआरपी यानी अधिकतम मूल्य और PTR यानी खुदरा दुकानवरों के लिए कीमत के बीच भारी अंतर पर गंभीर चिंता जताई. अदालत ने पूछा कि क्या दवाओं और मेडिकल डिवाइस की MRP को पीटीआर से अधिकतम 16 प्रतिशत तक रखने का कोई समान नियम बनाया जा सकता है.
2700 की दवा, MRP 27000 रुपये
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने कैंसर की एक ऐसी दवा का उदाहरण आया, जिसकी कीमत खुदरा विक्रेता के लिए करीब 2700 रुपये बताई गई, जबकि उसकी एमआरपी 27,000 रुपये थी. यानी दोनों कीमतों के बीच करीब 10 गुना का अंतर.
जस्टिस संदीप मेहता ने इसी अंतर पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब दवा इतनी कम कीमत पर रिटेलर तक पहुंच रही है तो उसकी MRP इतनी ज्यादा रखने की जरूरत आखिर क्यों है? अदालत पहले भी इस तरह के भारी अंतर को लेकर कड़ी टिप्पणी कर चुकी है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की कीमत व्यवस्था के असर को मरीजों की जेब से जोड़ते हुए कहा कि गंभीर बीमारियों के इलाज में दवाओं की कीमत का सीधा असर परिवारों पर पड़ता है. अदालत ने यह भी चिंता जताई कि इलाज का खर्च उठाने के लिए कई परिवारों को अपनी संपत्ति और गहने तक बेचने पड़ सकते हैं.
16% की एक समान सीमा क्यों नहीं?
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई के दौरान एक और अहम सवाल उठाया. अदालत ने पूछा कि क्या दवाओं और मेडिकल डिवाइस के मामले में एमआरपी और पीटीआर के बीच अधिकतम 16 प्रतिशत का एक समान अंतर तय नहीं किया जा सकता?
यानी अगर किसी दवा का PTR 1,000 है तो उसकी MRP एक तय सीमा से ज्यादा न हो. अदालत का सवाल मौजूदा मूल्य निर्धारण व्यवस्था में एमआरपी और वास्तविक खरीद कीमत के बीच बड़े अंतर को नियंत्रित करने की संभावना से जुड़ा है.
मामला ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 के तहत दवाओं की कीमतों के नियमन से संबंधित है. मौजूदा व्यवस्था में सभी दवाएं एक जैसी कीमत नियंत्रण व्यवस्था के दायरे में नहीं आतीं.
जरूरी और गैरजरूरी दवाओं पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच किए गए अंतर पर भी सवाल उठाया. अदालत ने पूछा कि अगर कोई दवा मरीजों के लिए जरूरी है तो उसे कीमत नियंत्रण की व्यवस्था से बाहर रखने का आधार क्या है?
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि बाजार में बड़ी संख्या में ऐसी दवाएं हैं जो निर्धारित दवाओं की सूची में नहीं आतीं. इनके लिए शुरुआती कीमत तय करने में कंपनियों को अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्रता रहती है.
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि अनिर्धारित दवाओं की संख्या और बाजार मूल्य के लिहाज से हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत या उससे ज्यादा हो सकती है. ऐसे में केवल Scheduled दवाओं पर मूल्य नियंत्रण का असर सीमित रह सकता है.
अस्पतालों की दवा दुकानों पर भी सवाल
इस दौरान अदालत ने बड़े अस्पतालों की दवा बिक्री व्यवस्था पर भी सवाल उठाए. पीठ ने कहा कि कई अस्पताल मरीजों को अपनी ही दवा दुकानों से दवाएं खरीदने के लिए कहते हैं. ऐसी स्थिति में अगर अस्पताल की फार्मेसी पर दवा ऊंची MRP पर मिलती है, तो मरीज के पास सस्ता विकल्प चुनने की गुंजाइश कम हो सकती है. अदालत ने खास तौर पर सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत होने वाले भुगतान को लेकर भी चिंता जताई.
सुप्रीम कोर्ट ने पहले की सुनवाई में कहा था कि अगर किसी सरकारी योजना के तहत अस्पताल महंगी कीमत पर दवा खरीदकर उसका पेमेंट सरकार से लेते हैं, तो आखिरकार इसका भार सार्वजनिक धन यानी टैक्स देने वालों पर पड़ता है.
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस मुद्दे पर संतुलित समाधान तलाशने की जरूरत है. उन्होंने संकेत दिया कि याचिकाकर्ताओं की चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन ऐसी व्यवस्था भी बनानी होगी जिसमें दवा उद्योग और अन्य संबंधित पक्षों के हितों का ध्यान रखा जा सके.
याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट किशन चंद जैन समेत अन्य ने दलील दी कि मौजूदा व्यवस्था में Non-Scheduled दवाओं की कीमत तय करने की प्रक्रिया मरीजों के लिए महंगी पड़ सकती है. उनके मुताबिक अलग-अलग ब्रांड की एक ही दवा की कीमतों में बड़ा अंतर होने से मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है.
मरीजों पर पड़ता है भारी आर्थिक बोझ
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के कारण अलग-अलग ब्रांड की दवाओं की खुदरा कीमतों में बड़ा अंतर पैदा हो सकता है, जिसका सीधा असर मरीजों पर पड़ता है. दलील दी गई कि महंगे इलाज का खर्च उठाने के लिए कई मरीजों को अपनी संपत्ति और गहने तक बेचने की स्थिति का सामना करना पड़ता है. वहीं, सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत ऐसी दवाओं की कीमत की भरपाई होने पर इसका बोझ सार्वजनिक धन पर भी पड़ सकता है.
12 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर के लिए तय की है.इसी खंडपीठ ने पिछले सप्ताह भी दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर टिप्पणी की थी. उस दौरान अदालत ने कीमतों के अंतर को लेकर कड़ी चिंता जताई थी और नियामक व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए थे.
