इस शादी को खत्म करना जरूरी है क्योंकि… ये कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दे द‍िया पत‍ि-पत्‍नी को तलाक, डाइवोर्स केस में अहम है ये फैसला

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SC Divorce Order: सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल से अलग रह रहे डॉक्टर दंपती को तलाक दिया, कहा बार बार शारीरिक संबंध से इंकार मानसिक क्रूरता है, अनुच्छेद 142 के तहत शादी खत्म की. सुप्रीम कोर्ट ने पत्‍नी की याच‍िका को खार‍िज करते हुए वैवा‍ह‍िक संबंधों को लेकर कई ट‍िप्‍पण‍ियां भी की है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले में क्‍या-क्‍या बातें कही गईं है जानने के ल‍िए पढ़ें …

 

नई दिल्ली.
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि मैरिटल मुकदमों को सालों तक लंबित रखने से सिर्फ कागजों पर शादी बनी रहती है जबकि हकीकत में रिश्ता खत्म हो चुका होता है. सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले में की जिसमें पति-पत्नी पिछले 15 साल से अलग-अलग रह रहे थे. इसी के साथ अदालत ने उनकी शादी को खत्म करते हुए तलाक दे दिया.

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें पति के पक्ष में तलाक दिया गया था. हाईकोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए कई आधारों पर तलाक मंजूर किया था, जिनमें मुख्य रूप से पत्नी द्वारा कई बार पति को वैवाहिक संबंध (सेक्सुअल रिलेशन) से इंकार करना और वैवाहिक कर्तव्यों का पालन न करना शामिल था.
शारीरिक संबंधों से मना करना मानसिक क्रूरता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत के अदालतों ने बार-बार यह स्थापित किया है कि वैवाहिक संबंधों से लगातार इंकार करना गंभीर भावनात्मक आघात पहुँचाता है और यह शादी की बुनियाद को कमजोर करता है. कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक अधिकार से इनकार और बिना किसी उचित कारण के बार-बार शारीरिक संबंधों से मना करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक का वैध आधार है.
पत‍ि-पत्‍नी ने डॉक्‍टर
यह दंपती दिसंबर 2007 में शादी के बंधन में बंधा था. दोनों ही डॉक्टर हैं और क्रमशः गुजरात और राजस्थान में सरकारी सेवा में कार्यरत हैं. अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि दोनों पिछले 15 साल से अलग रह रहे हैं, उनकी कोई संतान नहीं है और निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, कई बार सुलह-सफाई की कोशिशों के बावजूद कोई मेल-मिलाप नहीं हो पाया.
अनुच्‍छेद 142 का क‍िया इस्‍तेमाल
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि यह शादी अब सिर्फ नाम मात्र की रह गई है और यह साफ तौर पर अप्रत्यावर्तनीय रूप से टूट चुकी शादी का मामला है, इसलिए इसे खत्म करना ही न्यायसंगत है.
व‍ि‍वाह अध‍िकारों का कोई कॉन्‍ट्रेक्‍ट नहीं…
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विवाह केवल अधिकारों का कोई कॉन्‍ट्रेक्‍ट नहीं है न ही इसे सिर्फ वैवाह‍िक अध‍िकारों की याचिका के छोटे नजरिये से देखा जा सकता है. यह एक गहरा व्यक्तिगत और सामाजिक साझेदारी है जो आपसी सम्मान, साझा अपेक्षाओं और बराबर जिम्मेदारियों पर आधारित होती है. जब दो लोग शादी करते हैं तो वे परस्पर निर्भरता की एक ऐसी बुनावट तैयार करते हैं जिसमें दोनों को लगातार संतुलन बनाए रखना होता है.
बेंच ने कहा कि वैवाहिक दायित्वों के बिना अधूरे हैं. यदि कोई व्यक्ति अपने वैवाहिक दायित्वों को निभाए बिना केवल अधिकारों की मांग करे, तो यह विवाह संस्था के मूल सिद्धांतों को ही कमजोर करता है. अदालत ने यह भी कहा कि वैवाहिक जीवन के बुनियादी पहलुओं से लगातार दूरी बनाना, मानसिक क्रूरता के आरोपों का आकलन करते समय कानूनी रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है.
‘वैवाह‍िक दाय‍ित्‍वों का पालन नहीं क‍िया’
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में पति-पत्नी ने थोड़े समय के साथ रहने के दौरान भी अपने वैवाहिक दायित्वों का पालन नहीं किया. बेंच ने यह स्पष्ट किया कि सामान्यतः अदालतों का रुझान शादी को बचाने का होता है और केवल किसी एक पक्ष की साधारण मांग पर शादी खत्म करने में वे हिचकिचाती हैं. लेकिन इस मामले में दोनों इतने लंबे समय से अलग रह रहे हैं कि शादी की कोई पवित्रता या वास्तविकता नहीं बची है.
पत्‍नी के दावे को क‍िया खार‍िज
पत्नी ने यह दावा किया था कि वह गुजरात की नौकरी छोड़कर राजस्थान में पति के साथ रहने लगी थी, लेकिन अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है. उलटे यह तथ्य सामने आया कि वह आज भी गुजरात में ही अपनी सरकारी नौकरी कर रही है. बेंच ने टिप्पणी की कि “कर्म शब्दों से ज्यादा बोलते हैं” और इससे स्पष्ट है कि पत्नी की पति के साथ रहने की वास्तविक इच्छा नहीं दिखती.