गुंडों-बदमाशों को टिकट नफरती भाषण दिए जाएंगे, तो चुनावी हिंसा रोकने में तंत्र नाकाम आयोग !

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प. बंगाल चुनाव के दूसरे और आखिरी दौर के मतदान से पहले भाजपा और चुनाव आयोग पर नए सवाल खड़े हो गए हैं

प. बंगाल चुनाव के दूसरे और आखिरी दौर के मतदान से पहले भाजपा और चुनाव आयोग पर नए सवाल खड़े हो गए हैं। दरअसल दूसरे चरण से पहले चुनाव आयोग ने उत्तरप्रदेश के आईपीएस अधिकारी और काउंटर स्पेशलिस्ट माने जाने वाले अजय पाल शर्मा को दक्षिण 24 परगना जिले का नया पुलिस निरीक्षक नियुक्त किया है। इस नियुक्ति के फौरन बाद अजय पाल शर्मा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो में वे फाल्टा क्षेत्र के तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार जहांगीर के घर के पास खड़े हुए हैं और कहते हैं ‘जहांगीर के घर वाले खड़े हैं, उसको बता देना कि कायदे से रहे… यह बार-बार जो खबर आ रही है कि जहांगीर के लोग धमका रहे हैं, तो फिर अच्छे से खबर लेंगे, फिर बाद में रोना और पछताना मत…।’

अजय पाल शर्मा की इस भाषा और धमकी पर तो सवाल उठ ही रहे हैं, कुछ पूर्व पुलिस अधिकारियों का कहना है कि चुनाव निरीक्षक का काम चुनाव आयोग की आंख और कान की तरह काम करना है, लेकिन उसमें मुंह बंद रखना होता है। यानी ऐसे सरेआम किसी का नाम लेकर धमकाना सही नहीं है। अजय पाल शर्मा की नियुक्ति पर एक तरफ टीएमसी ने सवाल उठाए, तो वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें संभल और रामपुर में भाजपा का परखा हुआ एजेंट कहकर बता दिया है कि इस नियुक्ति के पीछे राजनैतिक दबाव काम कर रहा है। अगर ऐसा नहीं है तो चुनाव आयोग को इस पर फौरन सफाई देनी चाहिए। क्योंकि लगातार प.बंगाल में आयोग की कामकाज की शैली पर सवाल उठ रहे हैं। जैसे चुनाव आयोग ने सोमवार, 27 अप्रैल को ही ‘उपद्रवियों’ की एक नई सूची जारी की थी, जिसमें दूसरे दौर की 142 विधानसभा सीटों में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हज़ारों लोगों के नाम शामिल हैं। इन सभी सीटों पर बुधवार को मतदान होना है। चुनाव आयोग द्वारा जारी इस सूची को एहतियाती कार्रवाई या हिरासत में लेने के अनुरोध के साथ जारी किया गया है। इसी तरह इस बार के चुनाव को शांतिपूर्ण निपटाने के लिए चुनाव आयोग ने केन्द्रीय बलों की 2400 कंपनियां यानी करीब 2.4 लाख जवानों को तैनात किया है, जबकि लोकसभा चुनाव के लिए सभी 543 सीटों पर 3400 कंपनियां तैनात की गईं थी। इसके बावजूद राज्य में हिंसा की घटनाएं रुक नहीं रही हैं। सोमवार को टीएमसी की महिला और अनुसूचित जाति से आने वाली सांसद मिताली बाग की कार पर हमला हुआ। पत्थर बरसा कर उनकी कांच के शीशे तोड़े गए, जिसमें वो और उनका ड्राइवर दोनों घायल हुए हैं। टीएमसी का आरोप है कि हमला भाजपा के लोगों ने करवाया। एक पोस्ट में टीएमसी ने लिखा भी कि अमित शाह ने कहा था कि टीएमसी के लोगों को उल्टा लटका देंगे और अब ये हमला हुआ है। टीएमसी का ये भी आरोप है कि सुरक्षा के नाम पर तैनात जवान और पुलिस निरीक्षक आधी रात को छापे मार रहे हैं, रात के सन्नाटे में आम नागरिकों और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के घरों में ज़बरदस्ती घुस रहे हैं; वे परिवारों को आतंकित कर रहे हैं, मतदाताओं को डरा-धमका रहे हैं।

वहीं मिताली बाग पर हुए हमले के बाद सागरिका घोष ने सवाल उठाया है कि क्या यही भाजपा की नारी शक्ति के सम्मान की हकीकत है। हालांकि ऐसा ही हमला गोगहाट में भाजपा प्रत्याशी प्रशांत दिगार की गाड़ी पर भी किए जाने का आरोप लगा है। उनकी कार के शीशे तोड़ दिए गए। भाजपा ने इस हमले के लिए तृणमूल कांग्रेस समर्थकों को जिम्मेदार ठहराया है। इससे तीन दिन पहले एक कांग्रेस कार्यकर्ता की हत्या भी हो गई। इन हालात में सवाल ये है कि चुनाव आयोग के दावों का क्या हुआ। याद रहे कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने स्पष्ट किया था कि इस बार चुनाव में न ‘छप्पा’ यानी फर्जी वोटिंग होगी और न ही ‘बूथ जैमिंग’ यानी बूथ पर कब्जा होने दिया जाएगा। आयोग का कहना है कि निष्पक्ष चुनाव ही लोकतंत्र की असली पहचान है और 2021 जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति किसी भी हाल में नहीं होने दी जाएगी। इस बार चुनाव आयोग की रणनीति पूरी तरह बदली हुई है। अब फोकस घटना होने के बाद कार्रवाई करने पर नहीं, बल्कि पहले से रोकथाम करने पर है। इसके लिए सुरक्षा बलों की पहले से तैनाती, संवेदनशील इलाकों की पहचान और अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर दी गई है। आयोग का साफ संदेश है कि चुनावी प्रक्रिया में डर, हिंसा और दबाव के लिए कोई जगह नहीं होगी। याद रहे कि चुनाव की घोषणा होते ही प.बंगाल में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक फेरबदल किए गए थे। लेकिन इतनी कवायद का क्या मतलब अगर सांसद या प्रत्याशी या किसी कार्यकर्ता पर हमले की घटनाएं रुके ही नहीं। पहले दौर के मतदान के दिन किस तरह सुवेंदु सरकार को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया था, वो नजारा भी जनता ने देखा है।

इन तमाम घटनाओं से साफ है कि प.बंगाल में इस बार भी बिना हिंसा के चुनाव कराने में चुनाव आयोग नाकाम रहा है। अब उसके लिए चाहे किसी भी दल पर दोष डालें उससे आयोग अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं हो सकता। वैसे केंद्र की सत्ता पर बैठे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जिम्मेदारी भी कम नहीं है, लेकिन वो खुद प.बंगाल में डेरा डालकर लगातार उकसाने वाले भाषण देते रहे। अमित शाह ने किस तरह अपनी सभा में एई बंगाल पुलिस कहा था, वो भी सबने देखा है। जब गृहमंत्री इस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल करेंगे तो फिर बाकियों से क्या उम्मीद की जाए। वैसे छंटे हुए गुंडों को टिकट देने में भी भाजपा ही सबसे आगे रही है, ये बात आंकड़ों से जाहिर होती है। दूसरे दौर में 142 सीटों में जो 1445 उम्मीदवार हैं, उनमें भाजपा के 101 आपराधिक और 92 गंभीर आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवार हैं, इसके बाद वामदलों के 51 आपराधिक और 42 गंभीर आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवार हैं, वहीं टीएमसी के गंभीर आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवार 42 हैं और 49 आपराधिक मामलों के उम्मीदवार हैं, जबकि कांग्रेस ने आपराधिक मामलों वाले 37 और गंभीर आपराधिक मामलों वाले 30 उम्मीदवारों को टिकट दी है। यानी भाजपा ने सबसे ज्यादा आपराधिक मुकदमे वाले उम्मीदवारों को खड़ा किया है। जब गुंडों-बदमाशों को टिकट मिलेगी और ऊपर से नफरती भाषण दिए जाएंगे, तो फिर शांति से मतदान की अपेक्षा करना आकाश से तारे तोड़ने जैसा असंभव काम है।