सुप्रीम कोर्ट ने कहा, विवाह के इच्छुक जोड़े रिश्तेदारों, दोस्तों या अन्य व्यक्तियों की उपस्थिति में विवाह कर सकते हैं और विवाह में शामिल दोनों पक्ष को उनके समझने योग्य भाषा में यह घोषणा करनी चाहिए कि वे एक-दूसरे को पति या पत्नी मानते हैं।
, नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति वाले विवाह (सामान्यत: प्रेम विवाह) के लिए सार्वजनिक अनुष्ठान या घोषणा की जरूरत नहीं है। कोई भी जोड़ा एक-दूसरे को माला पहनाकर या अंगूठी पहनाने के साधारण समारोह के जरिये वकीलों के चैंबर में शादी कर सकता है। हालांकि, वकील अदालत के अधिकारी की पेशेवर हैसियत से नहीं, बल्कि जोड़े के मित्र, रिश्तेदार या सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से हिंदू विवाह अधिनियम (तमिलनाडु राज्य संशोधन) की धारा 7(ए) के तहत विवाह करा सकते हैं।
जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के निर्णय को पलटते हुए सोमवार को यह फैसला सुनाया। पीठ ने किसी व्यक्ति के जीवनसाथी चुनने के मौलिक अधिकार को बरकरार रखा। मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कुछ अजनबियों की उपस्थिति में गोपनीयता से किया गया विवाह हिंदू विवाह अधिनियम-1955 के अनुसार वैध नहीं है। मामले से जुड़े वकील ए वेलन के अनुसार, शीर्ष अदालत ने बालकृष्ण पांडियन बनाम पुलिस अधीक्षक (2014) मामले में मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें यह माना गया था कि वकीलों के जरिये कराई जाने वाली शादी मान्य नहीं हैं और सुयम्मरियाथाई विवाह (आपसी सहमति विवाह) को गुप्त रूप से संपन्न नहीं किया जा सकता है।
एक-दूसरे को पति-पत्नी मानने की घोषणा करनी होगी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, विवाह के इच्छुक जोड़े रिश्तेदारों, दोस्तों या अन्य व्यक्तियों की उपस्थिति में विवाह कर सकते हैं और विवाह में शामिल दोनों पक्ष को उनके समझने योग्य भाषा में यह घोषणा करनी चाहिए कि वे एक-दूसरे को पति या पत्नी मानते हैं।















