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इंसाफ की मोदी राज में लंबी लड़ाई ?

लखीमपुर खीरी मामले में आखिरकार मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा को गिरफ्तार कर लिया गया

 

लखीमपुर खीरी मामले में आखिरकार मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा को गिरफ्तार कर लिया गया। ये काम आसान नहीं था, क्योंकि गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा को इससे पहले तक सरकार और प्रशासन की ओर से छूट पर छूट दी गई। पहले तो सरकार और गोदी मीडिया की ओर से यही कोशिश की गई कि इस मामले का सारा दोषारोपण किसानों पर कर दिया जाए। कुछेक अखबारों और चैनलों पर किसानों का उपद्रव जैसे शीर्षक का इस्तेमाल किया गया।

लेकिन जब इस घटना के एक के बाद एक कई वीडियो वायरल हुए, जिसमें साफ दिख रहा है कि शांतिपूर्ण तरीके से चल रहे किसानों को कैसे पीछे से तेज रफ्तार गाड़ी ने जबरदस्ती कुचल दिया। इसके बाद घटना का जिम्मेदार किसानों को ठहराना आसान नहीं रहा।  उप्र सरकार ने इस घटना पर दोषियों को न बख्शने का दावा किया, मुख्यमंत्री योगी ने भी न्याय दिलाने का भरोसा दिलाया। लेकिन इस भरोसे को पूरा करने के लिए न उप्र सरकार की ओर से न केंद्र सरकार की ओर से कोई ऐसे कदम उठाए गए, जिससे लगे कि सरकार पीड़ितों के पक्ष में है। राकेश टिकैत की मध्यस्थता के कारण मृतकों के परिजनों को मुआवजे की घोषणा तो हो गई, लेकिन जख्मों पर संवेदना के साथ राहत का जो मलहम लगाया जाना चाहिए उसकी भाजपा सरकार में भारी कमी देखी जा सकती है।

केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों को तब भी कोई फर्क नहीं पड़ा था, जब लाखों प्रवासी मजदूरों की जान लॉकडाउन जैसे फैसले के कारण जोखिम में फंस गई थी। इस सरकार को तब भी कोई फर्क नहीं पड़ा था, जब कोरोना में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव और सरकारी अनदेखी के कारण लाखों जानें चली गईं। अभी सरकार जो थोड़े बहुत कदम राहत देने के नाम पर उठा रही है, वो इसलिए क्योंकि सिर पर चुनाव हैं और भाजपा उप्र में अपनी सत्ता गंवाना नहीं चाहती। सत्ता के इस गणित में भाजपा को दलितों, पिछड़े वर्गों का भी साथ चाहिए और ब्राह्मणों का भी। सपा, बसपा जिस तरह ब्राह्मण वोटबैंक को अपने-अपने पाले में करने में जुटे हैं, उसी कोशिश में भाजपा भी लगी है।

जितिन प्रसाद को कांग्रेस से तोड़कर भाजपा में इसी उद्देश्य के साथ लाया गया था। लेकिन इस घटना ने योगी सरकार के सामने फिर दुविधा खड़ी कर दी है। बिकरू कांड के बाद विकास दुबे का एनकाउंटर पुलिस ने बड़ी आसानी से कर दिया, पुलिसवालों को अपने साथियों की मौत के जिम्मेदार को सजा देनी थी। मगर इससे ब्राह्मण समाज में भाजपा के खिलाफ संदेश गया। अब फिर वही मुश्किल भाजपा के सामने आ गई है। अजय मिश्रा पर किसी तरह की सख्ती दिखाने से ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी का खतरा है। वैसे भी इस घटना में मारे गए लोग किसान हैं, इसलिए पुलिस वाले भी आरोपी को बाहर घूमने की छूट देते रहे।

कांग्रेस ने इस मुद्दे पर जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाई, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले में उप्र सरकार को फटकार लगाई कि अगर अभियुक्त कोई आम आदमी होता तब भी क्या पुलिस का रवैया यही होता? अदालत ले जो सवाल किया, वही सवाल इस देश के सजग नागरिक भी कर रहे थे। इसका कोई सीधा जवाब तो सरकार की ओर से नहीं आया, बस ये हुआ कि एक समन के बाद भी पेश न होने वाला आरोपी आशीष मिश्रा, अगले दिन पुलिस के सामने पेश हो गया, वो भी सारी तैयारी के साथ। आशीष मिश्रा ने ये साबित करने की पूरी कोशिश की कि वो मौका ए वारदात पर मौजूद नहीं था। लेकिन 12 घंटे की लंबी पूछताछ में वो ये साबित नहीं कर सका जिस वक्त घटना घटी, उस दौरान यानी 3 अक्टूबर दोपहर ढाई बजे से लेकर 3.45 के बीच वो कहां था। इस सवाल का जवाब देने की तैयारी आरोपी के वकील किस तरह से करते हैं, ये अदालत में सुनवाई के दौरान पता चलेगा।

फिलहाल आशीष मिश्रा पुलिस की गिरफ्त में है, लेकिन उसके पिता गृहराज्य मंत्री इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भी मोदी सरकार का हिस्सा हैं। अजय मिश्रा को मोदीजी अपने मंत्रिपरिषद में रखकर एक तरह से सत्ता का अभिमान दिखला रहे हैं। जिससे लोगों के बीच यही संदेश जा रहा है कि इस देश में केवल मोदीजी के मन की बात ही चलेगी।

अजय मिश्रा जब तक मोदी सरकार में बने रहेंगे, तब तक किसानों को पूरा न्याय मिलने की उम्मीद अधूरी रहेगी। लेकिन इस बीच एक नया कुचक्र रचने की कोशिश लखीमपुर में हो रही है। मृतक किसानों के धर्म का परिचय अब भाजपा की ओर से दिया जाने लगा है। योगी सरकार के मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने पिछले दिनों संवाददाता सम्मेलन में कहा कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी यह भूल गए हैं कि सिख विरोधी दंगे कांग्रेस के शासनकाल में हुए थे और भाजपा उस पीड़ित समुदाय के साथ खड़ी थी। उन्होंने सीएए के जरिए कैसे अफगानिस्तान के सिखों की मदद हो रही है, इसकी याद भी दिलाई। जाहिर है इस मामले को सिख बनाम हिंदू विवाद में तब्दील करने की कोशिश हो रही है। जबकि ये घटना रसूखदार सत्ताधारियों बनाम गरीब जनता के संघर्ष की मिसाल है। जिसमें न्याय के लिए पीड़ितों को कठिन लड़ाई लड़नी पड़ रही है और जिस सत्ता पर शोषितों के साथ खड़े होने की जिम्मेदारी है, वो शोषक के साथ खड़ी नजर आ रही है।

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