‘झोंपड़ी में दीपक जलाने वाला उतना ही हिन्‍दू, जितना मंदिर जाने वाला’, CJI सूर्यकांत

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सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले पर सुनवाई के दौरान कहा कि वह ‘हिंदुत्व एक जीवनशैली है’ संबंधी अपने तीन दशक पुराने फैसले पर पुनर्विचार नहीं करेगी. अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान और धार्मिक आस्था के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है. सुनवाई के दौरान पीठ ने विभिन्न धर्मों और परंपराओं से जुड़े मामलों पर भी व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर विचार किया. यह मामला देशभर में धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के अधिकारों को लेकर जारी बहस के केंद्र में बना हुआ है.

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की पीठ सुनवाई कर रही है. प्रधान न्‍यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत (CJI Justice Surya Kant) की अध्‍यक्षा वाली संविधान पीठ ने दोनों पक्षों की दलील सुनी. इस दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने अहम टिप्‍पणी की. उन्‍होंने कहा कि मंदिर में जाने वाला शख्‍स भी उतना ही हिन्‍दू है, जितना अपने छोटी से कुटिया में पूरी शांति और साइलेंट तरीके से दीपक जलाने वाला व्‍यक्ति. वहीं, संविधान पीठ में शामिल जज जस्टिस नागरत्‍ना ने कहा कि जहां तक हिन्‍दुत्‍व की बात है तो इस कोर्ट ने बहुत पहले ही इस बात को स्‍पष्‍ट कर दिया है कि हिन्‍दुइज्‍म जीने का तरीका है. अब हमें इसपर दोबारा से विचार करने की जरूरत नहीं है. सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भी कोर्ट में मौजूद थे. बता दें कि यह पूरा मामला सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष आयुवर्ग की महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा हुआ है.

सबरीमाला मंदिर से जुड़े हाईप्रोफाइल मामले की सुनवाई में सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बीवी नागरत्‍ना, जस्टिस एमएम सुंद्रेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्‍ला, जस्‍ट‍िस अरविंद कुमार, जस्टिस एजी मसीह, जस्टिस पीबी बराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जे. बागची शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक स्वतंत्रता, संप्रदायों के अधिकार और असहमति के दायरे को लेकर बुधवार को अहम बहस देखने को मिली. सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट जी. मोहन गोपाल ने अदालत से कहा कि धार्मिक संप्रदायों के भीतर असहमत आवाजों के लिए भी जगह बनाई जानी चाहिए, ताकि धार्मिक प्रथाओं में सुधार की संभावना बनी रहे. उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया दब रही है और अदालत को इस दिशा में संवैधानिक संतुलन स्थापित करना चाहिए.

अनुच्‍छेद 25 और 26 का जिक्र

‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ के अनुसार, वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता गोपाल ने कहा कि अदालत संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संबंधों की व्याख्या कर रही है. अनुच्छेद 25 व्यक्ति को धार्मिक स्‍वतंत्रता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों के संचालन का अधिकार प्रदान करता है. उनका कहना था कि धार्मिक संस्थाओं के भीतर सुधारवादी विचार रखने वालों को पर्याप्त स्थान नहीं मिल पा रहा है. हालांकि, संविधान पीठ ने इस तर्क से असहमति जताई. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने टिप्पणी की कि कोई व्यक्ति मंदिर में पूजा करने जाए या न जाए, इससे उसके हिंदू होने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. वहीं, CJI जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हिंदू धर्म अत्यंत लचीला है और इसमें पूजा के अनेक रूप स्वीकार किए जाते हैं. उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति मंदिर जाता है, वह भी उतना ही हिंदू है जितना वह व्यक्ति जो अपने छोटे से झोंपड़े में शांतिपूर्वक दीप जलाकर प्रार्थना करता है.

‘सुप्रीम कोर्ट सुपर-स्पिरिचुअल लीडर नहीं’

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट कोई ‘सुपर-स्पिरिचुअल लीडर’ नहीं है, जो धार्मिक प्रथाओं की व्याख्या करे. उन्होंने कहा कि धार्मिक सुधार का मुख्य दायित्व विधायिका का है, न कि न्यायपालिका का. सुनवाई के दौरान ‘हिंदुवाद एक जीवन शैली’ संबंधी सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी उल्लेख हुआ. यह फैसला उस मामले में आया था जिसमें बॉम्बे हाई कोर्ट ने शिवसेना उम्मीदवार रमेश यशवंत प्रभु का चुनाव रद्द कर दिया था. आरोप था कि चुनाव प्रचार के दौरान बाल ठाकरे ने धर्म के नाम पर वोट मांगे थे. जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस समय कहा था कि हिन्‍दुवाद और हिंदू धर्म को केवल संकीर्ण धार्मिक अर्थों तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि यह भारतीय जीवन शैली और सांस्कृतिक स्थिति का भी प्रतिनिधित्व करता है.

SG तुषार मेहता की आपत्ति

 

सीनियर एडवोकेट गोपाल ने दलील को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ईश्वर में आस्था की जगह धीरे-धीरे धार्मिक नेतृत्व में अंधविश्वास बढ़ रहा है. उन्होंने संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा अगस्त 1947 में दिए गए प्रस्ताव का हवाला देते हुए धर्म परिवर्तन के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने की बात कही. इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आपत्ति जताते हुए कहा कि संविधान सभा में बहस के बाद इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था. वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने अदालत को सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा कि न्यायालय संविधान में निहित अधिकारों की व्यापक व्याख्या तो कर सकता है, लेकिन व्याख्या के माध्यम से अतिरिक्त प्रतिबंध नहीं जोड़ सकता. उन्होंने धार्मिक और संप्रदायगत अधिकारों की पहचान तथा उद्देश्य को बनाए रखने के लिए संतुलित और सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाने की वकालत की.