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हेल्थ कार्ड की मोदी शाशनमें कई चुनौतियां ?

देश ने हाल में मोदी शाशनमें एक ऐसा स्वास्थ्य आपातकाल सहा है, जिससे उबरने में न जाने कितने बरस लगेंगे। कोरोना की पहली लहर में सरकार के उठाए कदम इस तरह नाकाम साबित हुए कि दूसरी लहर में देश खुले श्मशान की तरह बन गया

देश ने हाल में एक ऐसा स्वास्थ्य आपातकाल सहा है, जिससे उबरने में न जाने कितने बरस लगेंगे। कोरोना की पहली लहर में सरकार के उठाए कदम इस तरह नाकाम साबित हुए कि दूसरी लहर में देश खुले श्मशान की तरह बन गया। अस्पतालों के बाहर लंबी लाइनें, बड़े से बड़े अस्पताल में भी सुविधाओं के अभाव के कारण एक साथ 10-20 मरीजों का दम तोड़ना, रोजाना सैकड़ों मौतों की खबर और देर रात तक चिताओं का जलना, ये कोई सामान्य बातें नहीं हैं, जिन्हें भुलाया जाना चाहिए। खासकर सरकार को इन बातों को एक कड़वे सबक की तरह याद करके, उन तमाम भूलों को दुरुस्त करना चाहिए, जिससे आइंदा ऐसी नौबत न आए।

लेकिन मोदी सरकार का मौजूदा रवैया देखकर ऐसा लगता नहीं कि उसने कोरोना में तड़प कर मरते अपने नागरिकों को देखकर कोई सुधारवादी कदम उठाया हो। उस वक्त मीडिया में एक ही बात सुर्खियों में रहती थी कि कैसे आक्सीजन की कमी देश के लिए जानलेवा साबित हुई। मगर सरकार ने संसद में यह कहा कि आक्सीजन की कमी से कोई मौत ही नहीं हुई। सरकार अब भी ऐसा कोई कदम उठाती नहीं दिख रही, जिससे आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल जाएं। गांवों-कस्बों में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर करने, डाक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के लिए काम का बेहतर माहौल बनाने, सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारने और गरीब, असहाय लोगों के लिए भी बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं देने की जगह सरकार नयी-नयी योजनाओं का शिगूफा छोड़ रही है।

इस हफ्ते की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन की शुरुआत की। इसके तहत अब भारत के नागरिकों को एक डिजिटल हेल्थ आईडी दिया जाएगा। ये एक डिजिटल हेल्थ कार्ड होगा जिसमें लोगों की स्वास्थ्य से संबंधित जानकारियां डिजिटली सुरक्षित रहेंगी। आधार कार्ड की तरह यह भी ये एक यूनीक आईडी कार्ड होगा जिसमें आपकी बीमारी, इलाज और मेडिकल टेस्ट से जुड़ी सभी जानकारियां दर्ज होंगी। इस कार्ड पर आपको 14 अंकों का एक नंबर मिलेगा। इसी नंबर से स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यक्ति की पहचान होगी। ये एक तरह से नागरिकों के स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों का खाता होगा। ये डिजिटल हेल्थ कार्ड आधार कार्ड या मोबाइल नंबर के जरिए बनाया जा सकता है। जिसके लिए एनएडीएचएम की वेबसाइट पर जाना होगा। जिसमें हेल्थ कार्ड बनाने के विकल्प पर जाने से आपको आधार के जरिए या मोबाइल फोन से हेल्थ कार्ड बनाने का विकल्प मिलेगा। आधार नंबर या फोन नंबर डालने पर एक ओटीपी यानी वनटाइम पासवर्ड प्राप्त होगा। उसके बाद आपके सामने एक फॉर्म खुलेगा जिसमें आपको अपनी फोटो, जन्म तिथि और पता समेत कुछ और जानकारियां देनी होंगी।

सारी जानकारियां भरते ही एक हेल्थ आर्ड डी कार्ड बनकर आ जाएगा जिसमें आपसे जुड़ी जानकारियां, फोटो और एक क्यूआर कोड होगा। जो लोग हेल्थ कार्ड खुद से बनाने में सक्षम नहीं हैं वो सरकारी अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, या नेशनल हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर रजिस्ट्री से जुड़े ऐसे हेल्थकेयर प्रोवाइडर से अपना हेल्थ कार्ड बनवा सकते हैं। इसके बाद आप चाहे किसी भी शहर में इलाज कराएं डॉक्टर यूनीक आईडी के जरिए आपकी पिछली स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को देख पाएगा। आपको हर बार अपने पिछले इलाज के सारे कागजात रखने की जरूरत नहीं होगी। ये हेल्थ आईडी निशुल्क है और अब तक ये अनिवार्य नहीं है, पर सरकार की कोशिश है कि हर कोई इस व्यवस्था का हिस्सा बने। हालांकि भारत के गरीब, तकनीकी सुविधाओं से वंचित, ग्रामीण तबके के लोग इस कार्ड को बनाने के लिए कितनी जद्दोजहद करेंगे, इस बारे में सरकार को विचार कर लेना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने इस योजना की शुरुआत करते हुए कहा कि  ‘बीते सात वर्षों में देश की स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने का जो अभियान चल रहा है, वह आज से एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है। आज एक ऐसे मिशन की शुरुआत हो रही है, जिसमें भारत की स्वास्थ्य सुविधाओं में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की बहुत बड़ी ताकत है।’ मोदीजी के इन शब्दों में हमेशा की तरह जनता को प्रभावित करने की क्षमता है। यह योजना ऊपरी तौर पर वाकई बहुत सुविधाजनक और लुभावनी लगती है, मोदी सरकार की बाकी तमाम योजनाओं की तरह। लेकिन इससे जो क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का दावा किया जा रहा है, उसमें थोड़ा संदेह है। सरकार अगर सचमुच सभी नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देना चाहती है तो फिर इस बार के बजट में स्वास्थ्य पर खर्च घटाया क्यों गया। 2021-22 के बजट में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को 71269 करोड़ रुपये का आबंटन किया गया है।

जबकि 2020-21 में 82,928.30 करोड़ रुपये आबंटित थे। स्वास्थ्य बजट में 10.8 प्रतिशत कम करने के पीछे सरकार तर्क दे सकती है कि मुफ्त टीकाकरण की व्यवस्था इस बचत से की गई। लेकिन कोरोना के बाद जिस तरह भारत का दम फूल गया है, उसमें ऐसी बचत देश की सेहत के लिए घातक हो सकती है। वैसे सरकारी बजट में स्वास्थ्य को दी गई प्राथमिकता के लिहाज से देखा जाए तो 189 देशों में से भारत 179वें पायदान पर है। क्या सरकार के आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन से ऐसी क्रांति संभव है कि भारत इस पायदान में ऊपर चढ़ सके।

इस योजना में साइबर अपराध की आशंका भी एक बड़ी चुनौती है। कहने को तो आधार कार्ड भी सुरक्षित है, लेकिन हैकर्स उसमें भी सेंधमारी कर चुके हैं और अब यही खतरा हेल्थ कार्ड से जुड़ा है। स्वास्थ्य से जुड़ा डाटा अगर साइबर अपराधियों के हाथ लगा, तो इसका कैसे और कितना दुरुपयोग हो सकता है, इस बारे में सरकार को विचार कर लेना चाहिए। आखिर दुनिया में हथियारों और दवाओं का कारोबार ही हमेशा मुनाफे में रहता है।

 

 

 

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