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सुरेखा सीकरी: सार्थक सिनेमा की दमदार अभिनेत्री ने ली आख़िरी सांस

जानी-मानी अभिनेत्री सुरेखा सीकरी का 75 साल की उम्र में शुक्रवार को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. सुरेखा कई महीनों से बीमार थीं. उन्होंने पिछले साल ब्रेन स्ट्रोक भी झेला था.

सुरेखा के मैनेजर ने निधन की सूचना देते हुए कहा है कि तीन बार की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता सुरेखा सीकरी ने शुक्रवार सुबह दिल का दौरा पड़ने के बाद आख़िरी सांस ली. उनके मैनेजर ने कहा है कि दो ब्रेन स्ट्रोक के बाद से वो कई तरह की दिक़्क़तों से जूझ रही थीं.

सुरेखा सीकरी ने 1978 में किस्सा कुर्सी से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी. सुरेखा सीकरी को तमस (1988), मम्मो (1995) और बधाई हो (2018) में सहायक अभिनेत्री के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.

सुरेखा सीकरी की आख़िरी छवि साल 2019 की याद आती है, जब वे उपराष्ट्रपति एम. वैंकया नायडू से सहायक भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय अवार्ड ले रही थीं.

उन्हें यह सम्मान अमित शर्मा निर्देशित और 2018 में प्रदर्शित हिट फ़िल्म ‘बधाई हो’ के लिए मिल रहा था. यह फ़िल्म अधेड़ उम्र में गर्भ धारण करने और इसे लेकर एक दंपती के जीवन और सामाजिक दायरे पर पड़ने वाले असर को बताने वाली थी.

व्हील चेयर पर बैठी और शारीरिक रूप से अशक्त होने के बाद भी आत्मा में जीवंत और उत्साही सुरेखा सीकरी जब सम्मान ले रही थीं तो सभी लोग खड़े होकर तालियां बजा रहे थे. यह तेज़ जुबान वाली दादी अम्मा के किरदार के लिए सम्मान मिला था जो यौन संबंधों को लेकर अप्रत्याशित रूप से प्रगतिशील सोच रखती हैं.

हमेशा अपनी बहू से मनमुटाव रखने वाली अम्मा एक अहम मौक़े पर बहू के बचाव में उठ खड़ी होती हैं जब नज़दीकी रिश्तेदार बहू की आलोचना इस बात के लिए कर रहे होते हैं कि ढलती उम्र में वह माँ बनने जा रही हैं. अम्मा के क़िरदार में सुरेखा सीकरी ने तब कहा, “उसकी मर्ज़ी है वो सैक्सी करे.” डायलॉग में उन्होंने सेक्स का सही उच्चारण भले ना किया हो लेकिन यह ज़रूर कहा कि सेक्स किसी एक दंपती की अपनी चाहत है और इसको किसी सामाजिक स्वीकृति की ज़रूरत नहीं है.

इस एक सीक्वेंस में अपनी समझदार और संवदेनशील बातों से अम्मा ना केवल नैतिकता का मर्म पकड़ती हैं बल्कि वह वैसा दर्पण भी बन जाती हैं जिसमें यौन संबंधों को लेकर समाज के मिडिल क्लास का पाखंड झलकने लगता है.

इसमें कोई अचरज़ नहीं है कि अम्मा की ईमानदारी और स्पष्टता को जिस अंदाज़ में वरिष्ठ अदाकारा सीकरी ने निभाया उसे ना केवल बढ़ती उम्र के लोगों ने पसंद किया बल्कि युवाओं ने भी ख़ूब पसंद किया.

सीकरी के हाल के किरदारों में अम्मा जैसी ही लोकप्रियता मासा/दादीसा की भूमिका में मिली थी. कलर्स टीवी पर लंबे समय तक चले टीवी धारावाहिक बालिका वधू की इस भूमिका में सीकरी ने परिवार के कठोर मगर मुख्य स्तंभ की भूमिका निभायी थी.

2008 से 2016 के दौरान सीकरी हिंदी पट्टी में टीवी देखने वालों के लिविंग रूम में नियमित तौर पर परिवार के बड़े सदस्य के तौर पर मौजूद रहीं. इस धारावाहिक को तमिल, तेलुगू और मलयालम के अलावा कई अन्य भाषाओं में डब किया गया, जिसके चलते सीकरी की लोकप्रियता का दायरा उत्तर भारत के परे भी पहुँच गया था.

तमस और मम्मो की भूमिकाएं

सीकरी के ये दो क़िरदार मज़बूती से यादाश्त में आते हैं लेकिन एक अभिनेत्री के तौर पर उनका दायरा बहुत बड़ा था.

जहाँ तक फ़िल्मों की बात है, उनकी दो अन्य भूमिकाएं बेहतरीन मानी जाती रही हैं, जिसके लिए उन्हें काफ़ी प्रशंसाएं और सम्मान मिला.

ये भूमिकाएं थी गोविंद निहलानी की दूरदर्शन की सिरीज़ ‘तमस’ (1988) जिसे बाद में फ़िल्म में तब्दील किया गया और श्याम बेनेगल की ‘मम्मो’ (1994). तमस भीष्म साहनी के हिंदी उपन्यास ‘तमस’ पर आधारित फ़िल्म थी.

इसमें सीकरी ने मुस्लिम महिला राजो का क़िरदार निभाया, जिसका पति और बेटा गाँव वालों के साथ दंगे के लिए बाहर निकला है लेकिन वह अपने घर में एक बुजुर्ग सिख दंपती को शरण देती हैं.

वहीं मम्मो फ़िल्म में उन्होंने मुख्य किरदार मम्मो की विधवा बहन फैय्याज़ी की भूमिका निभाई. फैय्याज़ी एक भारतीय नागरिक हैं जबकि मम्मो पाकिस्तानी नागरिक. मम्मो अस्थायी वीज़ा के सहारे मुंबई में रहती हैं जिसकी मियाद समय समय पर बढ़ती रहती है लेकिन यह कब तक संभव होता?

आख़िर में मम्मो को वापस लौटना होता है उसका भावनात्मक असर ना केवल मम्मो पर होता है बल्कि फैय्याज़ी और उनके युवा पोते रियाज़ पर भी होता है. दोनों ही फ़िल्में एक तरह से विभाजन की त्रासदी को दिखाने वाली हैं कि किस तरह से आम लोग, उनके आपसी संबंध और उनके परिवारों का ताना बाना बंटवारे के दौरान बिखर गया.

हालांकि इन दोनों फिल्मों में यह भी ज़ाहिर होता है कि सिकरी के निभाए किरदार राजो और फैय्याज़ी जैसे आम लोगों में मौजूद मानवीय अच्छाइयों की बदौलत ही जीवन में नई शुरुआत होती है.

इन दोनों भूमिकाओं को सीकरी ने बेहद गरिमा, दृढ़ता, संजीदगी और गर्मजोशी से निभाया. सिनेमाई पर्दे पर वह आदमक़द नजर आती रहीं तो इसकी वजह उनकी कदकाठी ना होकर उनके किरदार की आंतरिक शक्ति थी जो उनके चेहरे से झलकती थी.

इन दोनों फ़िल्मों के लिए ‘बधाई हो’ की तरह ही सीकरी को सहायक भूमिका के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. ‘सहायक भूमिका’ कहने से इन भूमिकाओं की अहमियत का अंदाज़ा नहीं होता.

दरअसल फ़िल्म के हीरो और हीरोइन के अलावा यह वह कलाकार होता है जो अपने दमदार अभिनय से कथानक के लिए बेहद अहम बना रहता है.

ये कलाकार फ़िल्मों में इंसानी गुण लाते हैं. वे अलग नजर नहीं आते हैं बल्कि वे फ़िल्म के अपने कैरेक्टर में रच बस जाते हैं. सीकरी के लिए यह गुण पूरी तरह सटीक बैठता है.

अपने दौर की दूसरी बेमिसाल अभिनेताओं की तरह ही सीकरी नाटकों के माध्यम से बड़े पर्दे तक पहुंचीं. वह वह 70, 80 और 90 के दशक के समानांतर सिनेमा में नज़र आती रहीं. सीकरी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 1971 बैच की कलाकार हैं जो मुंबई में शिफ्ट होने से एनसीडी के रंगमंडल में काम करती थीं.

सुरेखा सिकरी

इमेज स्रोत,HINDUSTAN TIMES

1978 में अमृत नाहटा की फ़िल्म ‘किस्सा कुर्सी कथित तौर पर इंदिरा गांधी पर बनाई गई कटाक्ष फ़िल्म मानी जाती है और संजय गांधी ने आपातकाल के दौरान यानी 1975-1977 तक इस पर पाबंदी लगा दी थी.

सामानांतर सिनेमा में काम किया

इसके बाद सामानांतर सिनेमा के आंदोलन से जुड़े अधिकांश बड़े फ़िल्मकारों के साथ उन्होंने काम किया. श्याम बेनेगल के साथ मम्मो फ़िल्म के अलावा उन्होंने ‘सरदारी बेगम’ (1996), ‘हरिभरी’ (2000) और ‘ज़ुबैदा’ (2001) में काम किया.

इसके अलावा सईद मिर्जा के साथ ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’ (1989) और ‘नसीम’ (1995) और अपर्णा सेन के साथ ‘मिस्टर एंड मिसेज अय्यर’ (2003) में वे नजर आईं. इनमें से अधिकांश फ़िल्मों में उनका किरदार भावनात्मक मुश्किलों या फिर हिंसा का सामना करने वाली मुस्लिम महिला का रहा.

हालांकि बाद में उन्होंने छोटे पर्दे पर ज़्यादा काम किया. हाल फ़िलहाल की टीवी धारावाहिकों में ही नहीं बल्कि 90 के दशक में जब निजी टीवी चैनलों का दौर शुरू हो रहा था तब भी वह टीवी सीरियलों में लीडिंग भूमिकाएं कर रही थीं.

‘बनेगी अपनी बात’ में वह युवा बेटियों की मां की भूमिका में थीं जबकि ‘जस्ट मोहब्बत’ में उन्होंने मिसेज पंडित के रूप में चश्मा पहनने वाली स्कूली प्रिंसिपल का किरदार निभाया था जो बाहर से बेहद सख्त लेकिन अंदर से नरमदिल थीं.

मुंबई और टीवी-सिनेमाई पर्दे के काम के चलते सुरेखा सीकरी के पास नाटकों के लिए वक्त नहीं होता था इसके बावजूद यूरिडिस, द ट्रोजन वीमेन, अंतोन चेखोव की द चेरी आर्केड और जॉन ऑसबोर्न की लुक बैक इन एंगर जैसे क्लासिक नाटकों की भूमिका के चलते उन्हें 1989 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

हालांकि वे जिस तरह से दिल्ली के नाट्य गलियारे में सक्रिय थीं, उस तरह से मुंबई में नाटकों में कभी सक्रिय नहीं दिखीं.

सुरेखा सिकरी

इमेज स्रोत,MAIL TODAY/GETTY IMAGES

साल 2018 में महाबलेश्वर में एक शूट के दौरान उन्हें पहली बार ब्रेन स्ट्रोक हुआ, इसके बाद उनकी सक्रियता काफ़ी कम हो गई. उन्हें इसके चलते उन्हें कई फिल्मों के ऑफर ठुकराने पड़े. आठ सितंबर 2020 को उन्हें एक बार फिर से ब्रेन स्ट्रोक आया जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और इसके बाद वह पूरी तरह से रीकवर नहीं हो पायीं.

‘बधाई हो’ के अलावा उनकी आख़िरी फ़िल्मों में अमोल गुप्ते की ‘स्निफ’ रहीं जिसमें उन्होंने मुख्य भूमिका निभाने वाले बेबे की दादी की भूमिका अदा की थी.

जोया अख़्तर के नेटफिलिक्स हॉरर घोस्ट सिरीज में बीमार और बिछावन पर लेटीं मिसेज मलिक के किरदार में भी उनको देखना शानदार था, इसमें उनकी देखभाल करने वाली की भूमिका जान्हवी कपूर ने निभाई है.

उन्होंने शहरी जीवन से अलग थलग पुराने दिनों के भयावहता को पर्दे पर साकार करने का काम ज़रूर किया है लेकिन वास्तविक जीवन में काफ़ी ख़ुशमिजाज़ और सकारात्मक ऊर्जा से भरी रहीं.

उनके होठों पर मुस्कान और आँखों में चमक हमेशा बनी रही. उन्होंने अपने आख़िरी साक्षात्कारों में से एकमें ‘फ़िल्मफेयर’ से कहा था, “मैं फिर से चलना चाहती हूँ.” हालांकि यह नहीं हो पाया.

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