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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौत की सजा को कम करने में कोर्ट की अत्यधिक नरमी के कारण देश में अपराध बढ़ रहे हैं और इस पर कहीं न कहीं रोक लगनी चाहिए। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ आजीवन कारावास के कैदी की समयपूर्व रिहाई की याचिका पर सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी की।
जस्टिस दत्ता ने कहा कि पहले हत्या के मामलों में सजा रेयर ऑफ द रेरेस्ट (सबसे दुर्लभ) सिद्धांत के आधार पर तय होती थी, लेकिन अब समय बदल गया है। हमारी माफ करने की प्रवृत्ति के कारण ही भारत इन समस्याओं का सामना कर रहा है। माफ करो, माफ करो…आपको कहीं तो एक सीमा तय करनी ही होगी। जस्टिस दत्ता ने एक झकझोर देने वाले मामले का जिक्र करते हुए बताया कि एक पिता ने अपनी बड़ी बेटी से दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या कर दी थी। पत्नी की गवाही पर उसे उम्रकैद हुई। कुछ साल बाद जब वह पैरोल पर बाहर आया तो उसने छोटी बेटी के सामने अपनी पत्नी की भी हत्या कर दी। इस मामले में उसे मौत की सजा मिली, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर उम्रकैद में बदल दिया कि उसने छोटी बेटी की हत्या नहीं की थी। जस्टिस दत्ता ने दो टूक कहा कि अदालत के इसी रवैये के चलते अब इस अति-उदारवादी और माफ करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने का समय आ गया है।
भगवंत मान के कार्यालय से जुड़े भ्रष्टाचार मामले में सुप्रीम कोर्ट के जज ने सुनवाई से खुद को किया अलग
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस शील नागू ने पंजाब सरकार की उस याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है, जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें मुख्यमंत्री भगवंत मान के कार्यालय से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए सीबीआई को आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
जस्टिस दत्ता ने कहा कि मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के पास भेजा जाना चाहिए, ताकि इसे किसी दूसरी पीठ को सौंपा जा सके। उन्होंने कहा कि मौजूदा पीठ में सुनवाई होने पर आपत्तियां उठ सकती हैं। जस्टिस दत्ता ने कहा, ‘हम बहुत कठिन समय में हैं। कोई नहीं जानता कि हमला कहां से होगा।” उन्होंने कहा कि 17 अन्य पीठ हैं और मामले को सीजेआई के पास भेजने के लिए आदेश पर हस्ताक्षर किए जाएंगे।
इससे पहले, पंजाब सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने पीठ को बताया था कि जस्टिस शील नागू ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए इससे जुड़े मामलों में कुछ आदेश पारित किए थे, हालांकि वे एक अलग मुद्दे पर थे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह यह तय करने से पहले उन आदेशों की जांच करेगा कि मौजूदा पीठ इस मामले की सुनवाई कर सकती है या नहीं।
