पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) एस. वाई. कुरैशी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की जारी प्रक्रिया को लेकर निर्वाचन आयोग की तीखी आलोचना की और कहा कि मौजूदा प्रक्रिया मतदाताओं को शामिल करने के बजाय उन्हें ‘बाहर’ करने पर केन्द्रित है…
नेशनल डेस्क
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) एस. वाई. कुरैशी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की जारी प्रक्रिया को लेकर निर्वाचन आयोग की तीखी आलोचना की और कहा कि मौजूदा प्रक्रिया मतदाताओं को शामिल करने के बजाय उन्हें ‘बाहर’ करने पर केन्द्रित है जिससे ‘लोकतंत्र को भारी नुकसान पहुंचा है’ और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की व्यवस्था ‘प्रभावित’ हुई है। अपनी नयी पुस्तक ‘इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज़, नॉट ए मेमॉयर’ के विमोचन से पहले दिए गए एक विशेष साक्षात्कार में कुरैशी ने कहा कि वर्तमान एसआईआर प्रक्रिया में अधिक जोर इस बात पर है कि कितने लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं, मानो निर्वाचन आयोग को अधिक से अधिक लोगों को सूची से बाहर करने पर अच्छे अंक मिलेंगे।
एसआईआर प्रक्रिया का तरीका निष्पक्ष नहीं
कुरैशी ने अपने जीवन से जुड़े 100 महत्वपूर्ण अनुभवों का उल्लेख किया है। कुरैशी 30 जुलाई 2010 से 10 जून 2012 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। कुरैशी ने कहा कि मतदाता के रूप में पंजीकरण प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन ऐसी स्थिति पैदा की जा रही है मानो निर्वाचन आयोग लोगों पर कोई एहसान कर रहा हो। उन्होंने कहा कि वर्तमान एसआईआर प्रक्रिया जिस तरीके से की जा रही है, वह ‘निष्पक्ष नहीं’ है और इसका पूरा ध्यान मतदाताओं के नाम सूची से ‘बाहर’ करने पर केंद्रित है।
करोड़ों लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए
उन्होंने कहा, ”ऐसा लगता है कि पूरी कोशिश इस बात की है कि मतदाता सूची से कितने लोगों के नाम हटाए जा सकते हैं।” पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि उनके कार्यकाल में चुनाव कर्मियों को स्पष्ट निर्देश दिए जाते थे कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं को मतदाता बताता है और नाम की वर्तनी, उम्र या पते जैसी कोई छोटी-मोटी त्रुटि हो, लेकिन यह स्पष्ट हो कि वही सही व्यक्ति है, तो ऐसी गलतियों को नजरअंदाज किया जाए ताकि कोई मतदाता छूटे नहीं। कुरैशी ने आरोप लगाया कि अब स्थिति इसके विपरीत है और करोड़ों लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। उन्होंने विर्वाचन आयोग की आलोचना करते हुए कहा, ”मौजूदा प्रक्रिया में पूरा जोर इस बात पर है कि कितने लोगों को मतदाता सूची से बाहर किया जा सकता है, मानो अधिक से अधिक लोगों के नाम काटने पर आयोग को अच्छे अंक मिलेंगे। करोड़ों लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है।
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की प्रक्रिया प्रभावित हुई
उन्होंने कहा, ”इससे लोकतंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की प्रक्रिया प्रभावित हुई है। इस बात पर पूरे देश को चिंता होनी चाहिए और यही वजह है कि इतना विवाद हो रहा है।” कुरैशी ने कहा,” हम मूर्ख नहीं थे। हम भी अपने संवैधानिक दायित्व के अनुसार मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन करते थे और यह काम हर साल किया जाता था। वर्ष 2002-2003 में बिहार में पिछले गहन पुनरीक्षण के बाद यह निर्णय लिया गया कि अब गहन पुनरीक्षण की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मतदाता सूचियां कम्प्यूटरीकृत हो चुकी हैं।” उन्होंने कहा, ”यदि 99 प्रतिशत नाम पहले से सूची में हैं, तो फिर हर घर जाकर शुरुआत से यह पता लगाना कि वहां कौन रहता है, पूरी तरह अव्यावहारिक है।” उन्होंने कहा, ”इसका मतलब यह है कि अधिकारी किसी व्यक्ति के घर जाते हैं, मतदाता सूची दिखाते हैं, उसमें दर्ज मतदाताओं के नाम और उम्र की जांच करते हैं और यदि सब कुछ सही होता है तो वे अगले घर की ओर बढ़ जाते हैं।
