कलकत्ता हाई कोर्ट ने ट्रेनों में खाली बर्थ बेचने वाले टीटीई पर कडी टिप्पणी करते हुए कहा कि वे बर्थ को बाजार में सब्जियों की तरह बेचते हैं। अदालत ने रेलवे को ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ अधिकतम कार्रवाई करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने पुलिस जांच में गंभीर खामियां भी बताईं और कहा कि TTE की लापरवाही ही इस अपराध की मुख्य वजह बनी।
कोलकाता
कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि कुछ ट्रैवलिंग टिकट एग्जामिनर (टीटीई) ट्रेनों में खाली बर्थ को बाजार में सब्जियों की तरह बेचते हैं। कोर्ट ने देश के सभी रेलवे जोन के जनरल मैनेजरों को निर्देश दिया कि ऐसे दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। अदालत ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें नशीला पदार्थ देकर लूट का शिकार बने एक यात्री की मौत हो गई
जस्टिस राजशेखर मंथा और जस्टिस बिस्वरूप चौधरी की डिविजन बेंच ने कहा कि यह अदालत अपने इस फैसले की प्रति ईस्टर्न रेलवे और देश के सभी रेलवे जोन के जनरल मैनेजरों को भेजने के लिए बाध्य है, ताकि उन टीटीई के खिलाफ अधिकतम सजा सुनिश्चित की जा सके, जो ट्रेनों में खाली बर्थ को बाजार में सब्जियों की तरह बेचते हैं।’ कोर्ट ने कहा कि ऐसे गैरजिम्मेदाराना व्यवहार के कारण एक यात्री की जान चली गई, जबकि वह मूल रूप से केवल चोरी का शिकार हुआ था।
अदालत ने कहा कि इस तरह के कई मामले सामने ही नहीं आ पाते। छोटी चोरी के शिकार होने वाले यात्रियों को भी कई बार गंभीर चिकित्सकीय परिणाम भुगतने पड़ते हैं। ऐसे अपराधों की शुरुआत TTE के हाथों से होती है।
पुलिस जांच पर कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?
कोर्ट ने जांच और अभियोजन की प्रक्रिया में कई गंभीर कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया। अदालत ने पुलिस की आलोचना करते हुए कहा कि जांच अधिकारियों को अधिक ईमानदारी, मेहनत और समर्पण के साथ जांच करनी चाहिए, ताकि भारतीय रेलवे में यात्रा करने वाले लोगों का जीवन और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को क्या सजा सुनाई थी?
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आलोक घोष और गोपाल मिस्त्री को दोषी ठहराते हुए हत्या की धारा 302 के तहत उम्रकैद और धारा 328 के तहत नशीला पदार्थ देकर नुकसान पहुंचाने के अपराध में सात वर्ष की सजा सुनाई थी। इसके अलावा उन्हें चोरी और दूसरे यात्री की हत्या के प्रयास के मामले में भी दोषी ठहराया गया था। सभी सजाएं एक साथ चलनी थीं।
हाई कोर्ट ने सजा में क्या बदलाव किया?
डिविजन बेंच ने कहा कि अपीलकर्ताओं के खिलाफ अधिकतम धारा 328 का अपराध ही साबित होता है, जिसकी सजा सात वर्ष है। अदालत ने माना कि अन्य धाराओं के आरोप स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं हो सके। इसी आधार पर अदालत ने उनकी अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली।
रिहाई को लेकर कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
अदालत ने निर्देश दिया कि दोनों अपीलकर्ताओं को ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार बॉन्ड भरने के बाद रिहा किया जाए। यह बॉन्ड छह महीने तक प्रभावी रहेगा। घोष और मिस्त्री को 10 जुलाई 2017 को दोषी ठहराया गया था और अगले दिन सियालदह सेशंस कोर्ट ने उन्हें सजा सुनाई थी।
जांच में कौन सी बड़ी चूक सामने आई?
मामले की जांच को अपर्याप्त बताते हुए डिविजन बेंच ने कहा कि जांच अधिकारी ने मृतक के विसरा की फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) रिपोर्ट तक एकत्र नहीं की। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण भी नहीं है, जिससे यह साबित हो कि विसरा को FSL भेजा गया था। जांच अधिकारी की यह चूक किसी भी तरह माफ करने योग्य नहीं है।
डिविजन बेंच ने कहा कि बिना पूर्व रिजर्वेशन के दो यात्रियों को बर्थ आवंटित करना संबंधित TTE की गंभीर लापरवाही थी। इतना ही नहीं, न्यू जलपाईगुड़ी से सियालदह तक ड्यूटी पर तैनात अन्य टीटीई की भूमिका भी गंभीर चिंता का विषय है। अक्सर टीटीई यात्रियों के जोरदार अनुरोध पर उन्हें बर्थ दे देते हैं और बदले में पैसे भी ले लेते हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि भारतीय रेलवे में TTE की लापरवाही ही इस अपराध की मुख्य वजह बनी।
