‘न्याय का ये मतलब नहीं, जो मैं चाहूं, वैसा ही हो’,: बॉम्बे हाईकोर्ट

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‘न्याय का ये मतलब नहीं, जो मैं चाहूं, वैसा ही हो’, छात्रा की याचिका पर अदालत ने क्यों लगाई फटकार?

बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने कम उपस्थिति के कारण परीक्षा से वंचित की गई एक कानून छात्रा की याचिका खारिज करते हुए उसके दावों को गैर-जिम्मेदाराना और प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय का अर्थ व्यक्ति की इच्छा के अनुरूप फैसला मिलना नहीं है।

मुंबई

बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कानून की एक छात्रा को फटकार लगाई। छात्रा ने विश्वविद्यालय को लेकर लापरवाही भरे और गैर-जिम्मेदाराना बयान दिए थे। दरअसल, विश्वविद्यालय ने कम उपस्थिति के कारण उसे अंतिम परीक्षाओं में बैठने से रोक दिया गया था। अदालत ने कहा कि न्याय का अर्थ “जो मैं चाहूं, वैसा ही हो” नहीं है।

न्यायाधीश विभा कंकणवाडी और अजीत कडेठणकर की पीठ ने 23 वर्षीय छात्रा की याचिका खारिज करते हुए कहा कि अपनी गलतियों को छिपाने के लिए झूठे दावे करने के उसके प्रयास प्रक्रिया का दुरुपयोग थे, जो उसके कानूनी पेशे के करियर को खतरे में डाल सकते थे। अदालत ने अपने 18 जून के फैसले में कहा कि अदालतों के समक्ष उठाया गया कोई भी मामला सद्भावनापूर्ण होना चाहिए।

 

विश्वविद्यालय के खिलाफ छात्रा क्यों पहुंची थी हाईकोर्ट?
अदालत ने कहा, “किसी भी अदालत के समक्ष हर कार्यवाही न्याय मांगने के लिए होती है; लेकिन ‘न्याय’ की अवधारणा का अर्थ ‘जो मैं चाहूं और जैसे भी मैं चाहूं, वैसा ही हो’ नहीं है।” याचिकाकर्ता छत्रपति संभाजीनगर में स्थित महाराष्ट्र राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर छात्रा थी। उसने विश्वविद्यालय के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अनिवार्य 75 प्रतिशत उपस्थिति की शर्त पूरी न करने के कारण अंतिम सेमेस्टर की परीक्षाओं में बैठने से रोक दिया गया था।

एकल पीठ द्वारा अप्रैल में उसकी प्रारंभिक याचिका खारिज करने के बाद उसने विश्वविद्यालय से विशेष परीक्षा आयोजित करने का निर्देश देने की मांग करते हुए एक समीक्षा याचिका दायर की थी। छात्रा ने अपनी याचिका में दावा किया था कि उसकी उपस्थिति गणना में गलती थी। छात्रा ने आरोप लगाया कि कॉलेज ने मनमाने ढंग से कुछ छात्रों को अतिरिक्त उपस्थिति प्रदान की थी।

याचिका में छात्रा ने किए थे क्या दावे?
उसने आगे दावा किया कि विश्वविद्यालय ने उसकी वास्तविक चिकित्सीय परिस्थितियों पर विचार नहीं किया था। विश्वविद्यालय ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि याचिकाकर्ता की उपस्थिति केवल 45 प्रतिशत दर्ज की गई थी। अगर यह कम से कम 67 प्रतिशत होती, तो उचित विचार के बाद अतिरिक्त उपस्थिति प्रदान की जाती।

यह भी दावा किया गया कि याचिकाकर्ता ने शिकायत निवारण समिति की सुनवाई में भाग नहीं लिया था, जिसके समक्ष उसने अदालत जाने से पहले एक आवेदन दायर किया था। इसके बजाय, उसने समिति के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसे राहत देने से इनकार कर दिया गया था, और इसे मनमाना बताया।

हाईकोर्ट ने बीमारी की कहानी गढ़ने पर लगाई फटकार
अदालत ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि विश्वविद्यालय ने कुछ छात्रों को छूट दी थी, यह कहते हुए कि यह सुनी-सुनाई बात थी और इसका समर्थन करने के लिए कोई सबूत नहीं था। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने समीक्षा याचिका में अपनी बीमारी के बारे में एक नई कहानी गढ़ते हुए बिल्कुल “लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना” दावे किए थे, लेकिन कोई सहायक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया था।

अदालत ने कहा कि यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता ने अनिवार्य उपस्थिति के लिए आवश्यक सेमेस्टर व्याख्यानों में भाग नहीं लिया था, और उसने समीक्षा के लिए कोई मामला नहीं बनाया है। पीठ ने कानून स्नातक को फटकार लगाते हुए कहा कि वह न केवल उसकी धृष्टता से निराश थी, बल्कि चिंतित भी थी। अदालत ने नोट किया कि याचिकाकर्ता वकालत के अभ्यास और प्रक्रिया के बारे में सीखने की कोमल अवस्था में थी।

 

छात्रा पर क्यों नहीं लगाया हाईकोर्ट ने जुर्माना?
अदालत ने कहा, “पेशेवर करियर के ऐसे चरण में, अगर अदालतों के समक्ष उपस्थिति किसी भी अनुशासनहीन और अपमानजनक तरीके से की जाती है, तो हम इस महान क्षेत्र में आने वाले नए लोगों के पेशेवर करियर के बारे में गंभीर रूप से चिंतित हैं। यह उचित समय है कि हम ऐसी प्रथा की निंदा करें।” पीठ ने कहा कि हालांकि वह याचिकाकर्ता पर भारी जुर्माना लगाने के लिए गंभीर रूप से इच्छुक थी, लेकिन उसने छात्रा होने के नाते ऐसा करने से परहेज किया।