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जस्टिस चंद्रचूड़ की छपवाई गाइडलाइंस से जज थे नाराज, सीजेआई सूर्यकांत ने बदला फैसला, अब आएगी नई किताब

सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने जजों के बीच संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए नई गाइडलाइंस तैयार कराने की प्रक्रिया शुरू की है. यह पहल खास तौर पर यौन अपराध और कमजोर वर्गों से जुड़े मामलों की सुनवाई में न्यायिक दृष्टिकोण को बेहतर बनाने के उद्देश्य से की जा रही है. इससे पहले वर्ष 2023 में तत्कालीन सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की पहल पर एक गाइड बुक छपी थी, लेकिन उसमें लिखी बातों पर कई जजों ने आपत्ति जताई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता और संतुलित दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए नई पहल शुरू की है. अदालत अब जजों के लिए ऐसे नई गाइडलाइंस तैयार करवाने की दिशा में काम कर रही है, जिनका मकसद खास तौर से यौन अपराध और संवेदनशील मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायिक दृष्टिकोण को अधिक जिम्मेदार और समझदार बनाना है.
सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत (CJI Surya Kant) की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के निदेशक और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अनिरुद्ध बोस से विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने को कहा है. इस बेंच में सीजेआई सूर्यकांत के अलावा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया में शामिल थे. उन्होंने 10 फरवरी को दिए आदेश में एक्सपर्ट समिति को एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा है, जिसके आधार पर नए दिशानिर्देश तैयार किए जाएंगे.
पहले भी जारी हो चुका है हैंडबुक
इससे पहले वर्ष 2023 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की पहल पर ‘लैंगिक रूढ़िवादिता का मुकाबला करने पर हैंडबुक’ नाम से एक पुस्तिका जारी की गई थी. इस हैंडबुक का उद्देश्य न्यायाधीशों और कानूनी समुदाय को महिलाओं से जुड़े लैंगिक पूर्वाग्रहों को पहचानने और उन्हें दूर करने में मदद देना था. इसमें कई ऐसे शब्दों और अभिव्यक्तियों की सूची भी दी गई थी जिन्हें लैंगिक दृष्टि से अनुचित माना गया और उनके स्थान पर इस्तेमाल किए जाने वाले वैकल्पिक शब्द सुझाए गए थे.
हैंडबुक की भाषा से कई जज नाराज
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश में संकेत दिया गया है कि इस हैंडबुक की भाषा आम लोगों के लिए काफी जटिल है और इसे समझना आसान नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में उच्च स्तरीय सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि कुछ न्यायाधीशों ने इस हैंडबुक को तैयार करने और जारी करने की प्रक्रिया पर भी असहमति जताई थी. उनका मानना था कि इस तरह के दस्तावेज को जारी करने से पहले सभी न्यायाधीशों से व्यापक चर्चा की जानी चाहिए थी और इसे ‘फुल कोर्ट’ के सामने रखा जाना चाहिए था.
किताब की कुछ बातों पर भी आपत्ति
सूत्रों के अनुसार, हैंडबुक के कुछ हिस्सों को लेकर भी आपत्ति सामने आई थी. उदाहरण के तौर पर इसमें लैंगिक और सामाजिक पूर्वाग्रहों को समझाने के लिए कुछ उदाहरण दिए गए थे.
इनमें एक उदाहरण यह भी था कि समाज में यह धारणा होती है कि ऊंची जाति के पुरुष निचली जाति की महिलाओं के साथ यौन संबंध नहीं बनाना चाहते, इसलिए ऐसे मामलों में यौन उत्पीड़न के आरोप झूठे हो सकते हैं. हैंडबुक में इस सोच को गलत बताते हुए कहा गया था कि इतिहास में यौन हिंसा को सामाजिक नियंत्रण और जातीय वर्चस्व बनाए रखने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया है.
कुछ न्यायाधीशों का मानना था कि इस तरह के व्यापक और सामान्यीकृत कथनों से पूरे समुदायों को एक खास नजरिए से देखने का खतरा पैदा हो सकता है.
सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि न्यायपालिका के सदस्यों के दृष्टिकोण और अदालत की प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता और समझ विकसित करने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है. अदालत ने यह भी माना कि इस दिशा में पहले भी कई प्रयास किए गए हैं, लेकिन अपेक्षित परिणाम अभी तक पूरी तरह सामने नहीं आए हैं.
इसी वजह से अदालत ने कहा कि नए दिशानिर्देश तैयार करने से पहले पिछले प्रयासों और अनुभवों का गहराई से अध्ययन किया जाएगा, ताकि भविष्य में अधिक प्रभावी और व्यावहारिक मार्गदर्शिका तैयार की जा सके.
आम लोगों के लिए आसान होगी भाषा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नए दिशानिर्देश ऐसे होने चाहिए जिन्हें आम लोग भी आसानी से समझ सकें. इनमें जटिल विदेशी शब्दों या कानूनी शब्दावली का अनावश्यक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.




