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‘आप सुबह घर जाएं और कोर्ट का समन मिले तो दिन का खाना भूल जाइएगा’, जज ने लगाई फटकार, वकील साहब बस ताकते रह गए

कोर्ट की दहलीज पर कोई भी शख्स तब पहुंचता है, जब कोई मजबूरी हो. हर इंसान कोर्ट कचहरी से बचना चाहता है, क्योंकि देश में अदालत का चक्कर आसानी से छूटता नहीं है. नोटिस पर नोटिस जारी होते रहते हैं और फरियादी चक्कर काटते रहते हैं.
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की ओर से कई बार नोटिस जारी करने को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतने का निर्देश दिया गया है. इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट की ओर से अक्सर ही नोटिस जारी किए जाते हैं. नोटिस जारी करने से मामले से संबंधित लोगों की समस्याएं बढ़ जाती हैं. कोर्ट में अर्जी दाखिल करने वाले के साथ ही प्रतिवादी को भी कोर्ट का चक्कर लगाना पड़ता है. वकील करने पड़ते हैं. उनकी फीस देनी होती है. आर्थिक के अलावा मानसिक परेशानी अलग से होती है. ऐसे में कोर्ट नोटिस जारी में काफी सावधानी बरतते हैं. अदालती नोटिस को लेकर ऐसा ही एक मामला सामने आया है. सोशल मीडिया में वायरल एक वीडियो में जज साहब नोटिस जारी करने की मांग करने वाले एक वकील को फटकार लगाते हुए दिख रहे हैं. इस वीडियो को 40 हजार से ज्यादा लोग लाइक कर चुके हैं.
न्यायिक प्रक्रिया में नोटिस जारी करने की संवेदनशीलता को लेकर अदालत की सख्त टिप्पणी सामने आई है. अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के घर कोर्ट का समन या नोटिस पहुंचना एक बेहद गंभीर मामला होता है, जिसका सीधा असर उसकी निजी और सामाजिक जिंदगी पर पड़ता है. जज ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति घर लौटे और उसे कोर्ट का नोटिस मिले, तो वह दोपहर का खाना तक भूल जाएगा. यह एक ऐसा झटका होता है, जो इंसान को तुरंत चिंता और तनाव में डाल देता है.
जज साहब क्या बोले?
वायरल वीडियो में मामले की सुनवाई कर हरे जज ने कहा कि नोटिस मिलने के बाद व्यक्ति सबसे पहले वकील के पास दौड़ता है, कानूनी सलाह लेता है और वकील की फीस का इंतजाम करता है. कई बार लोगों को फीस जुटाने के लिए अपनी संपत्ति तक बेचनी पड़ जाती है. ऐसे में नोटिस जारी करना कोई सामान्य या हल्की प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए.
संयम बेहद जरूरी
जज ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालतें इस स्थिति से पूरी तरह वाकिफ हैं और इसी कारण नोटिस जारी करने से पहले बेहद संयम बरतना जरूरी है. उन्होंने बताया कि रोजाना वकील नोटिस जारी करने की मांग करते हैं, लेकिन अदालत का दायित्व है कि वह पहले यह देखे कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में नोटिस के योग्य है या नहीं और क्या उसके खिलाफ पर्याप्त सामग्री मौजूद है.
मानवीय पहलू
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि केवल औपचारिकता निभाने के लिए या बिना ठोस आधार के नोटिस जारी नहीं किया जा सकता. नोटिस जारी करने से पहले ‘फॉर्मिंग ऑफ ओपिनियन’ यानी अपनी राय बनाना जरूरी है, और यह राय उपलब्ध सामग्री और तथ्यों के आधार पर ही होनी चाहिए. अंत में अदालत ने आत्मसंयम की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि जब किसी मामले में पर्याप्त सामग्री ही मौजूद न हो, तो नोटिस जारी करना न्यायसंगत नहीं है. यह टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया में मानवीय पहलू और जिम्मेदारी की याद दिलाती है, ताकि आम लोगों को अनावश्यक मानसिक और आर्थिक परेशानी से बचाया जा सके.




