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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बंधुआ मजदूरी पर संवैधानिक रोक सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रह सकती। अदालत ने केंद्र को छह महीने में देशभर में एक समान एसओपी लागू करने और मुक्त मजदूरों को रिहाई प्रमाणपत्र के सात दिनों के भीतर आर्थिक मदद देने का निर्देश दिया है। सुरेंद्र मांझी को सहायता मिलने में तीन साल लगे थे। आखिर मजदूरों के पुनर्वास के लिए क्या बदलेगा?
नई दिल्ली
बंधुआ मजदूरी से मुक्ति मिलने के बाद भी मजदूरों को अगर आर्थिक मदद और रोजगार का सहारा नहीं मिलता है तो वे दोबारा शोषण के जाल में फंस सकते हैं। इसी चिंता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बंधुआ मजदूरी खत्म करने से जुड़े कानून और पुनर्वास योजना को प्रभावी तरीके से लागू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि संविधान में बंधुआ मजदूरी पर रोक लगाने का प्रावधान सिर्फ कागजों पर लिखी बात बनकर नहीं रह सकता। मजदूरों को शोषण से मुक्त कराना ही सरकार की जिम्मेदारी पूरी होने के लिए काफी नहीं है, बल्कि उन्हें सम्मान से जीवन जीने के लिए जरूरी मदद भी देनी होगी। अदालत ने केंद्र को छह महीने के भीतर इस संबंध में एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू करने का आदेश दिया है।
पुनर्वास योजना में बदलाव के लिए केंद्र को कितना समय मिला?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पुनर्वास योजना में प्रस्तावित बदलावों पर तीन महीने के भीतर उचित फैसला लेने का निर्देश दिया। इन बदलावों में तत्काल आर्थिक सहायता की रकम बढ़ाना, पुनर्वास की प्रक्रिया आसान करना, अलग-अलग राज्यों से जुड़े मामलों में अधिकारियों की जिम्मेदारी स्पष्ट करना और पुनर्वास लाभ मिलने में देरी होने पर अंतरिम जीवन-यापन सहायता देने का प्रस्ताव शामिल है। अदालत ने कहा कि जब तक योजना में बदलाव लागू नहीं होते, तब तक मौजूदा योजना के तहत ही सहायता दी जाती रहेगी। इसके अलावा केंद्र को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) से सलाह लेकर तीन महीने के भीतर जरूरी अतिरिक्त दिशानिर्देश जारी करने को कहा गया है।
देशभर में बंधुआ मजदूरों की पहचान और रिहाई के लिए क्या व्यवस्था होगी?
अदालत ने केंद्र सरकार को छह महीने के भीतर पूरे देश में एक समान एसओपी लागू करने का निर्देश दिया है। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी आदेश के छह महीने के भीतर जरूरी कदम उठाने होंगे। एसओपी में बंधुआ मजदूरी की शिकायतों की तुरंत जांच और मजदूरों को बचाने की प्रक्रिया तय होगी। अदालत ने कहा कि ऐसी शिकायतों का सत्यापन आमतौर पर 24 घंटे के भीतर किया जाना चाहिए और जरूरत पड़ने पर जल्द बचाव अभियान चलाया जाना चाहिए। केंद्र को रिहाई प्रमाणपत्र का एक समान प्रारूप भी तय करना होगा, जिसे सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश मान्यता देंगे। इससे दूसरे राज्य में मजदूरों को भेजने और उनके पुनर्वास के दौरान अलग-अलग प्रशासनिक नियमों के कारण होने वाली परेशानी दूर होगी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई सात महीने बाद तय की है, ताकि उसके निर्देशों के पालन की स्थिति की समीक्षा की जा सके।
