क्या सऊदी अरब में MBS की सत्ता पर मंडरा रहा खतरा? हूती तो बस शुरुआत हैं, आने वाला है नया संकट

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सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों का हमला क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के लिए मुसीबत बन रहा है. ये हमला सीधे तौर पर उनकी सत्ता के लिए मुसीबत बन सकता है. हूती विद्रोहियों ने एयरपोर्ट से लेकर सऊदी के तेल ठिकानों को निशाना बनाया है. तेल ठिकानों और अहम बुनियादी ढांचे की सुरक्षा, ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष का असर, विदेशी निवेश में गिरावट और बढ़ता बजट घाटा उनकी आर्थिक योजनाओं पर दबाव डाल रहे हैं. उनके लिए जनता का समर्थन हासिल कर पाना मुश्किल हो सकता है.

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के सामने चुनौती अब सिर्फ यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों को रोकने की नहीं है. जिस सऊदी अरब को वह सुरक्षित, आधुनिक और निवेश के लिए दुनिया की पसंदीदा जगह बनाना चाहते हैं, उसी की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सुधारों पर दबाव बढ़ रहा है. ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद सऊदी अरब भी निशाने पर आया. अब हूतियों के हमलों ने राजधानी रियाद के हवाई अड्डे से लेकर तेल कंपनी सऊदी अरामको के मुख्यालय तक खतरा बढ़ा दिया है. ऐसे में सवाल है कि क्या मोहम्मद बिन सलमान अपने देश को सुरक्षा और समृद्धि देने का वादा पूरा कर पाएंगे?

सऊदी अरब पर शासन करना आसान नहीं है. देश की औसत उम्र करीब 25 साल है. बड़ी संख्या में युवा बेहतर नौकरी, अच्छी जिंदगी और आगे बढ़ने के मौके चाहते हैं. बिन सलमान ने जनता के सामने एक तरह का वादा रखा है कि देश में स्थिरता और वफादारी बनाए रखिए, बदले में सरकार सुरक्षा, समृद्धि और सुधार देगी. लेकिन जब देश के प्रमुख ठिकानों पर हमले होने लगें, तो इस वादे को निभाना मुश्किल हो जाता है. अगर वादा टूटा तो सत्ता में बने रहना मुश्किल हो जाएगा.

सऊदी अरब की सुरक्षा पर उठे सवाल

साल 2015 में रक्षा मंत्री रहते हुए बिन सलमान ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान का नेतृत्व किया था. यह उनके नेतृत्व में सऊदी अरब की नई ताकत दिखाने की कोशिश भी थी. ऐसे में रियाद के मुख्य हवाई अड्डे पर हूतियों का हमला उनके लिए बड़ा झटका माना जा सकता है. एयरपोर्ट पर हमले के बाद घबराए यात्रियों के वीडियो पूरी दुनिया में फैले हैं. रियाद के अलावा देश के पूर्वी हिस्से में स्थित दम्माम हवाई अड्डे को भी निशाना बनाए जाने की बात कही गई है. पिछले सप्ताह सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको के मुख्यालय पर भी एक मिसाइल गिरी. बुधवार को एक बार फिर सऊदी अरामको पर हमला हुआ.
सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े हथियार खरीदने वाले देशों में शामिल है. वह अपने GDP का 6.5 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करता है. इसके बावजूद देश की सुरक्षा करना कठिन है. इसकी वजह है कि तेल के ठिकाने, हवाई अड्डे और दूसरी जरूरी सुविधाएं विशाल क्षेत्र में फैली हुई हैं. ईरान और उसके सहयोगी अलग-अलग दिशाओं से हमले कर सकते हैं.
एक और बड़ी समस्या ड्रोन और मिसाइलों की लागत है. हूती विद्रोहियों और ईरान की ओर से इस्तेमाल किए जाने वाले कई ड्रोन बेहद सस्ते होते हैं, जबकि उन्हें हवा में रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली पश्चिमी देशों की मिसाइलें महंगी हैं. यानी सऊदी अरब को कई बार सस्ते हमलों को रोकने के लिए कहीं ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ सकता है.

अमेरिका-इजरायल और ईरान के संघर्ष का असर

सऊदी अरब की मुश्किलें सिर्फ हूतियों तक सीमित नहीं हैं. ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई में सऊदी अरब समेत दूसरे देशों को भी निशाना बनाया. इससे सऊदी अरब के तेल ढांचे को नुकसान पहुंचा. इस नुकसान की कीमत कई अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है. यह स्थिति बिन सलमान की उस योजना के लिए चुनौती है, जिसके तहत वह सऊदी अरब को निवेश और पर्यटन के लिए सुरक्षित जगह के रूप में पेश करना चाहते हैं. अगर निवेशकों को लगे कि देश के हवाई अड्डे, तेल प्रतिष्ठान और दूसरे अहम ठिकाने खतरे में हैं, तो वे अपना पैसा लगाने से पहले दो बार सोचेंगे.
इसका असर आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ सकता है. कुछ स्कूलों की पढ़ाई ऑनलाइन करनी पड़ी और कुछ कंपनियों ने कर्मचारियों को घर से काम करने की सुविधा दी. इससे साफ है कि सुरक्षा का संकट सिर्फ सेना या सरकारी इमारतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोगों की पढ़ाई, नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी को भी प्रभावित करता है.

निवेश घटा तो प्लान पर पड़ेगा असर

सऊदी अरब लंबे समय से अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा है. इसके लिए विदेशी निवेश, पर्यटन और आधुनिक उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि दुनिया के निवेशकों को देश सुरक्षित और स्थिर दिखाई दे. रिपोर्ट्स के मुताबिक सऊदी अरब ने 2030 तक हर साल 100 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आकर्षित करने का लक्ष्य रखा है. पिछले साल निवेश में बढ़ोतरी हुई थी, लेकिन 2026 की दूसरी तिमाही में यह एक साल पहले की समान अवधि के मुकाबले 17 प्रतिशत घटकर 5.95 अरब डॉलर रह गया.
यह गिरावट ऐसे समय आई है, जब देश को युवाओं के लिए आधुनिक और अच्छे वेतन वाली नौकरियां पैदा करनी हैं. अगर निजी निवेश धीमा पड़ता है, तो नई कंपनियों, उद्योगों और रोजगार के अवसरों का विकास भी प्रभावित हो सकता है. सरकार के सामने खर्च का दबाव भी है. जापान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल सऊदी अरब का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के करीब 5 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं, सऊदी वित्त मंत्रालय के अनुमान के अनुसार, 2026 में देश की अर्थव्यवस्था 3.6 प्रतिशत सिकुड़ सकती है. इसके पीछे तेल क्षेत्र में 21.8 प्रतिशत गिरावट का अनुमान भी शामिल है. यानी सऊदी अरब को एक तरफ सुरक्षा पर भारी खर्च करना पड़ सकता है, तो दूसरी तरफ विकास और रोजगार के लिए भी पैसा चाहिए.

सुधारों का वादा भी बन सकता है चुनौती

बिन सलमान ने सऊदी अरब में कई सामाजिक बदलाव किए हैं. महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कुछ नियमों में ढील दी गई, महिलाओं के गाड़ी चलाने और कामकाजी जगहों पर उनकी भागीदारी बढ़ाने जैसे बदलाव हुए. आज इनमें से कई बदलाव सामान्य जीवन का हिस्सा बन चुके हैं. लेकिन सुधारों की राजनीति में भी जोखिम है. सऊदी शासक वर्ग लंबे समय से देश के भीतर के इस्लामी कट्टरपंथी समूहों को लेकर चिंतित रहा है. ऐसे में बिन सलमान के सुधार एक तरफ आधुनिक सऊदी अरब की पहचान हैं, तो दूसरी तरफ बदलाव से नाराज लोगों के लिए विरोध का मुद्दा भी बन सकते हैं. सऊदी अरब में लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सरकार को जनता की सहमति और भरोसे की जरूरत नहीं. बिन सलमान के लिए जरूरी है कि लोग यह मानते रहें कि उनके नेतृत्व में देश सुरक्षित, समृद्ध और आधुनिक बन रहा है.

असली परीक्षा सिर्फ हूतियों को रोकने की नहीं

मोहम्मद बिन सलमान के सामने चुनौती कई स्तरों पर है. उन्हें हूतियों और दूसरे हमलों से देश की सुरक्षा करनी है, निवेशकों का भरोसा बनाए रखना है, तेल से बाहर की अर्थव्यवस्था को बढ़ाना है और युवाओं के लिए रोजगार पैदा करने हैं. साथ ही, उन्हें उन सामाजिक सुधारों को भी आगे बढ़ाना है, जिनके जरिए वह सऊदी अरब को दुनिया के सामने एक आधुनिक देश के रूप में पेश करना चाहते हैं. इनमें से किसी एक मोर्चे पर नाकामी का असर बाकी क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है. सुरक्षा कमजोर हुई तो निवेश घट सकता है. निवेश घटा तो रोजगार और आर्थिक बदलाव की रफ्तार धीमी पड़ सकती है. और अगर युवाओं को बेहतर भविष्य की उम्मीद कमजोर लगी, तो सरकार के साथ उनका भरोसा भी दबाव में आ सकता है.