‘मंदिर की जमीन देवता की है, सरकार की नहीं’, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

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सरकार का दायित्व ऐसी संपत्तियों का संरक्षण करना है, न कि प्रशासनिक अधिकारों के आधार पर उन्हें अपनी संपत्ति मान लेना। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जमीन की आवश्यकता होना अपने आप में मंदिर की संपत्ति को मुफ्त में सरकार को…

नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर की संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मंदिर की जमीन का प्रशासन और प्रबंधन करने से सरकार उसकी मालिक नहीं बन जाती। अदालत ने कहा कि देवता को दान में दी गई संपत्ति उसी में निहित रहती है और उसका इस्तेमाल धार्मिक उद्देश्यों के हित में किया जाना चाहिए। इसी के साथ शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु के एक मंदिर की जमीन राज्य सरकार को उपहार में देने संबंधी गिफ्ट डीड को अमान्य करार दिया है। हालांकि, अदालत ने जमीन पर पहले से बने सरकारी कार्यालय को हटाने के बजाय सरकार को किराया देकर वहां बने रहने की अनुमति दी है।

मंदिर की संपत्ति देवता की, ट्रस्टी केवल संरक्षक
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि देवता को समर्पित संपत्ति दानदाता, पुजारी, ट्रस्टी या राज्य सरकार की निजी संपत्ति नहीं बन जाती। ऐसी संपत्ति का कानूनी स्वामित्व देवता में निहित रहता है, जबकि उसकी देखरेख करने वाले व्यक्तियों की जिम्मेदारी उसे सुरक्षित रखना और मंदिर के हित में उसका उपयोग करना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मंदिर की संपत्ति का प्रबंधन करने वाला ट्रस्टी उसका मालिक नहीं होता। वह अपने पद का इस्तेमाल कर संपत्ति को मनमाने तरीके से किसी अन्य व्यक्ति या सरकार को हस्तांतरित नहीं कर सकता।

सरकार प्रशासन कर सकती है, लेकिन मालिक नहीं बन सकती
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिर की संपत्तियों के प्रशासन और नियमन की जिम्मेदारी निभाने से सरकार को उनके मालिकाना हक का अधिकार नहीं मिल जाता। सरकार का दायित्व ऐसी संपत्तियों का संरक्षण करना है, न कि प्रशासनिक अधिकारों के आधार पर उन्हें अपनी संपत्ति मान लेना। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जमीन की आवश्यकता होना अपने आप में मंदिर की संपत्ति को मुफ्त में सरकार को हस्तांतरित करने का वैध आधार नहीं है। सरकारी कार्यालय बनाने की जरूरत के नाम पर कानून के विपरीत किए गए हस्तांतरण को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला तमिलनाडु के इरोड जिले के कोडुमुडी गांव स्थित नागापलायम मरियम्मन-पोननाचियम्मन मंदिर की लगभग एक एकड़ और 10 सेंट इनाम भूमि से जुड़ा है। अगस्त 2017 में मंदिर के एक अस्थायी ट्रस्टी ने तालुक कार्यालय के निर्माण के लिए यह जमीन तमिलनाडु सरकार को उपहार में दे दी थी। राजस्व अधिकारियों ने भी जमीन के हस्तांतरण को स्वीकार कर लिया था। इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई, लेकिन मद्रास हाईकोर्ट ने मार्च 2019 में याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित कर दिया।

सरकारी कार्यालय नहीं हटेगा, सरकार को देना होगा किराया
सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड रद्द करने के बावजूद जमीन पर पहले से बने तालुक कार्यालय को हटाने का आदेश नहीं दिया। अदालत ने राज्य सरकार को पट्टे के आधार पर जमीन का इस्तेमाल जारी रखने की अनुमति दी है, लेकिन इसके लिए मंदिर को किराया देना होगा। पीठ ने राज्य सरकार को 8 मार्च 2019 से 31,000 रुपये प्रतिमाह की दर से किराया देने का निर्देश दिया। इसके अलावा, सरकार को मंदिर को एक लाख रुपये का हर्जाना भी अदा करना होगा। अदालत ने किराये की राशि की हर तीन साल में समीक्षा करने का भी निर्देश दिया। इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि मंदिर की संपत्ति का संरक्षण और प्रबंधन करने का अधिकार उसे मनमाने ढंग से हस्तांतरित करने या उस पर मालिकाना हक जताने का अधिकार नहीं देता।