सिब्बल सुप्रीम कोर्ट से नाउम्मीद, CJP को सरकारी फैसला नामंजूर, सरकार और CEC विपक्ष के ठेंगे पर…क्या ऐसे ही होगी संविधान की रक्षा

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लोकतंत्र में आम निर्वाचन के जरिए जन समर्थन से सरकारें बनती हैं. इसमें कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को रिगिंग दिखाई पड़ती है. निष्पक्ष निर्वाचन के लिए बने चुनाव आयोग को विपक्ष चोर साबित करने पर आमादा है. कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा नहीं रहा. राष्ट्रपति को राजनीति में घसीटने से राहुल गांधी बाज नहीं आए. संविधान की व्यवस्था में विधायिका, कार्यपालिका और न्यापालिका ही सर्वोच्च हैं. जब विपक्ष का इनसे ही भरोसा उठने लगा है तो संविधान की रक्षा के संकल्प के क्या मायने रहने जाते हैं.

 

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) प्रमुख अभिजीत दीपके के धरना-प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर की जगह की जिद निर्वाचित सरकार के फैसले को चुनौती देती है. छात्रों-युवाओं के मुद्दे के साथ मैदान में उतरी सीजेपी की अब राजनीति में रुचि जाग गई है. सीजेपी के दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की सफलता के बाद अब वे मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी दलों की जमात में शामिल हो गए हैं. धरना-प्रदर्शन के लिए सरकार की ओर से चिह्नित दूसरी जगहें उन्हें पसंद नहीं. सरकार की मनाही के बावजूद जंतर-मंतर पर ही सीजेपी के जुटान को उन्होंने चेतावनी दी है. अब सीजेपी अपने को छात्रों-युवाओं के मुद्दे तक ही सीमित नहीं रहना चाहती है.

कानून के बड़े जानकार और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल को सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद अब नहीं दिखती. वे सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त पर वोट चोरी की अपनी दलीलें रख-रखकर थक चुके होने की बात कहते हैं. राहुल गांधी के साथ विपक्षी गठबंधन ने पहले मुख्य न्यायाधीश (CJI) से मुलाकात का वक्त न मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालकर अपनी ताकत का अहसास कराया. आखिरकार उन्हें सहयोगी 10 दलों के साथ उसी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करनी पड़ी है, जिससे सिब्बल साहब नाउम्मीदी जाहिर कर चुके हैं.
विपक्ष की कवायद से साफ हो चुका है कि इंडिया ब्लाक के नेताओं की असल मंशा नरेंद्र मोदी सरकार के तख्ता पलट की है. चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार तो महज बहाना हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बांग्लादेश में भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग हो रही है. विदेशी मीडिया से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए हो रहे आंदोलन पर टीका-टिप्पणी हो रही है. आश्चर्य यह कि संविधान रक्षा का संकल्प बार-बार दोहराने वाला मौजूदा विपक्ष संवैधानिक व्यवस्था के तहत बनी संस्थाओं को ही संदिग्ध साबित करने में जुटा है.

सिब्बल को सुप्रीम कोर्ट से नाउम्मीदी

कांग्रेस नेता और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने 10 अक्टूबर 2026 को स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के मुद्दे पर दिल्ली में प्रेस कान्फ्रेंस किया. प्रेस कान्फ्रेंस में उनकी टिप्पणी की सबसे चर्चित पंक्ति थी थी- ‘सुप्रीम कोर्ट से अब कोई उम्मीद नहीं बची, भरोसा खो चुका हूं.’ उन्होंने अपनी इस मर्मांतक पीड़ा को विस्तार से बताया भी. उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट में गलत तरीके से नाम हटाने और जोड़ने के खिलाफ वे महीनों से सुप्रीम कोर्ट में दलीलें दे रहे हैं, लेकिन वहां से कोई राहत नहीं मिली. उनकी पीड़ा इस बात में भी झलकी कि- ‘मैं बार-बार सुप्रीम कोर्ट जाकर थक गया हूं. मुझे नहीं लगता कि अब सुप्रीम कोर्ट जाने का कोई फायदा है, मैंने अपना भरोसा खो दिया है.’ सिब्बल जैसे सीनियर वकील और कद्दावर राजनीतिक व्यक्ति का सप्रीम कोर्ट से भरोसा टूटने की पीड़ा का सीधा और सपाट अर्थ तो यही निकलता है कि उन्हें भारतीय न्याय व्यवस्था पर अब भरोसा नहीं रह गया है. कानून की बारीक समझ रखने वाले कपिल सिब्बल ने न्याय व्यवस्था की आलोचना में अवमानना से बचाव की जरूर गुंजाइश बचा रखी होगी, लेकिन आम आदमी की समझ से तो यह अदालत की अवमानना का स्पष्ट संदेश है. आम आदमी को न्याय की आखिरी उम्मीद सर्वोच्च न्यायालय ही तो होता है.

राष्ट्रपति से मीटिंग पर भी सियासत

विपक्षी नेताओं को राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख राष्ट्पति की गरिमा की भी परवाह नहीं. उन्हें भी राहुल ने सियासी चर्चा का केंद्र बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. विपक्षियों का नेतृत्व करने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की ओर से वोट चोरी के आरोप के साथ प्रतिनिधिमंडल लेकर राष्ट्रपति से मुलाकात की. यहां तक तो बात ठीक थी. पर, मुलाकात के बाद उन्होंने जो किया, वह निहायत हास्यास्पद था. उन्होंने कहा कि जब राष्ट्रपति के सामने चुनाव चोरी और मतदाता सूची में गड़बड़ी का मुद्दा उठाया गया, तो राष्ट्रपति ने इस बात से इनकार नहीं किया.
उन्होंने हमारी चिंताओं को ध्यान से सुना. उनका यह दावा हास्यास्पद इसलिए लगता है कि बीजेपी की ओर से नामित, समर्थित और निर्वाचित राष्ट्रपति से क्या कभी ऐसा कह सकती हैं. किसी के आरोप को महज पड़ताल कराए क्या सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह की बात कह सकता है. हालांकि बाद में राहुल के दावे की असलियत उनके ही समर्थक नेताओं ने उजागर कर दी. ममता बनर्जी और मल्लिकार्जुन खरगे जैसे नेताओं ने बताया कि राष्ट्रपति ने विपक्ष के आरोपों पर ठोस सबूत मांगे हैं. राहुल ने भी तब खरगे और ममता की बातों की तस्दीक करते हुए कहा कि विपक्ष के पास इसके पर्याप्त सबूत हैं. जल्द ही वे इन्हें राष्ट्रपति को सौंपेंगे.
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बड़बोलापन है राहुल का बड़ा अस्त्र

राहुल का दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस वोट चोरी के शिल्पकार हैं. गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इसे अमली जामा पहना रहे हैं. सोमवार (12 अक्टूबर 2026) को सुप्रीम कोर्ट तक विपक्षी गठबंधन के मार्च के बाद राहुल गांधी ने कई और सनसनीखेज खुलासे किए. इनमें एक यह कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार उन्हें मैसेज भेजते हैं. हम जानते हैं कि वे रात को सो नहीं पा रहे हैं. हम उन्हें छोड़ेंगे नहीं. हालांकि वे मुख्य अपराधी नहीं हैं, उनसे गड़बड़ी करवाई गई है. उनके लिए सबसे सबसे आसान रास्ता यही है कि इस्तीफा दो और रास्ते से हट जाओ. अप्रूवर बन जाओ. राहुल का बड़बोलापन यहीं तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने कहा- ‘मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बताना चाहता हूं कि आपकी सरकार के 200 अधिकारी (ED, CBI, विदेश मंत्रालय वगैरह) हमारे संपर्क में हैं और हमें जानकारी दे रहे हैं.’

क्या ऐसे ही होगी संविधान की रक्षा

बीजेपी से संविधान पर खतरा बता कर विपक्ष ढोल पीटता रहा है. कहीं कोई सभा हो या आंदोलन, राहुल संविधान की लाल किताब साथ ले जाना नहीं भूलते. उनकी देखी-देखी अब कांग्रेस के अलावा इंडिया ब्लाक की पार्टियों के दूसरे नेता भी करने लगे हैं. विपक्ष के पिछले प्रदर्शन के दौरान रास्ते पर पसरी प्रियंका गांधी ने सीने पर संविधान की लाल किताब सीने पर रखी थीं. हालांकि बीते 12 वर्षों के शासन में भाजपा का कोई आचरण ऐसा नहीं दिखा, जिससे लगे कि संविधान खतरे में है और उसकी सुरक्षा के लिए विपक्ष की सत्ता परिवर्तन की मांग वाजिब है. संविधान में भारत लोकतांत्रिक राष्ट्र घोषित है. लोकतंत्र में आम निर्वाचन के जरिए जन समर्थन से सरकारें बनती हैं. तीसरी बार भाजपा को सरकार बनाने का जनादेश मिला तो इसमें कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को रिगिंग दिखाई पड़ती है.
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निष्पक्ष निर्वाचन कराने वाला चुनाव आयोग को विपक्ष चोर साबित करने पर आमादा है. कांग्रेसी कपिल सिब्बल का सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा नहीं रहा. राष्ट्रपति को राजनीति में घसीटने से राहुल गांधी बाज नहीं आते. संविधान की व्यवस्था में सर्वोच्च विधायिका, कार्यपालिका और न्यापालिका सर्वोच्च हैं. जब विपक्ष का इनसे ही भरोसा उठने लगा है तो संविधान की रक्षा के संकल्प के क्या मायने रहने जात हैं.