India Alliance Meeting: देश की राजधानी दिल्ली में विपक्षी दलों के संगठन इंडिया गठबंधन की बैठक में दो बातों का संदेश देखने को मिला. यह पहला मौका था जब पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वोट चोरी और एसआईआर में धांधली का मुद्दा उठाने का क्रेडिट राहुल गांधी को देती दिखीं. दूसरी बात यह है कि प्रेस ब्रीफिंग में अंतिम वक्ता के रूप में राहुल गांधी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि अब वह इंडिया गठबंधन के सर्वमान्य नेता बन चुके हैं.
नई दिल्ली
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की ओर से कराए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) में धांधली के आरोपों को लेकर विपक्षी दलों के संगठन इंडिया गठबंधन का 30 सितंबर को राजधानी नई दिल्ली में बैठक हुई. इंडिया गठबंधन की बैठक में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की गैरमौजूदगी चर्चा का विषय रही. हालांकि बैठक में करीब 14 छोटे बड़े राजनीतिक दलों की मौजूदगी ने सबका ध्यान खींचा. इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिन नेताओं को बोलने का मौका मिला, उन सबने एक सुर में वोटर चोरी, एसआईआर में गड़बड़ी और ईसीआई ज्ञानेश कुमार को उनके पद से उठाने के मुद्दे पर प्रमुखता से अपनी बात रखी. विपक्षी दलों की इस बैठक को संपूर्णता से देखें तो इसमें दो प्रमुख बातें गौर करने लायक है.
राहुल गांधी के सपोर्ट में पहली बार दिखीं ममता बनर्जी
ममता बनर्जी जब तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री रहीं तब तक उन्होंने राहुल गांधी को कतई तवज्जो नहीं दिया. वह राहुल गांधी को राजनीति सीखने की नसीहत तक देती दिखती थीं. 2026 विधानसभा चुनाव में पार्टी की बुरी हार और 15 साल की सत्ता हाथों से छिनने के बाद ममता बनर्जी के सुर बिलकुल ही 360 डिग्री बदले नजर आ रहे हैं. जिस ममता की नजर में राहुल गांधी गंभीर नजर नहीं आते थे, 30 सितंबर की मीटिंग के बाद उन्हें उनमें दूरगामी सोच के नेता नजर आने लगे हैं.
इंडिया गठबंधन की मीटिंग के बाद ममता बनर्जी ने राहुल गांधी के समर्थन में पहली बार कहा- ‘राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने पहली बार वोट चोरी के मुद्दे को उठाया. बीजेपी ने वोट चोरी करके 2026 में जीत दर्ज की. इससे पहले मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार में जीता और पश्चिम बंगाल में पूरा लूट किया.’ उन्होंने कहा कि मैं लोगों को लेकर यहां आई थी, चुनाव आयोग के पास गई थी. सुप्रीम कोर्ट में भी गई थी. सारे दरवाजे खटखटाए, लेकिन अब जाकर सारी बातें खुल गई है कि ‘ज्ञानेश कुमार चोर है, डाकू है, वोट चोरी किया, ईवीएम मशीन जला दिया, ईवीएम मशीन हाईजैकिंग किया, वोटों की गिनती में गड़बड़ी की, क्या नहीं किया है. इन सबके लिए उन्हें तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे देना चाहिए.’.
ममता बनर्जी ने कहा कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से ही लोकतंत्र बचेगा और लोगों का मताधिकार बचेगा. वोटिंग हमारा संवैधानिक अधिकार है, अगर वोटर वोट नहीं देगा, वोट लूटे और चुराए जाएंगे तो लोकतंत्र कहां बचेगा. ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा नहीं होता है यह आंदोलन मिट्टी से आसमान तक जाएगा. हम लोगों को एक साथ लड़कर देखना है.
प्रेस ब्रीफिंग के लिए अंत में क्यों आए राहुल गांधी?
इंडिया गठबंधन की बैठक में दूसरी गौर करने वाली बात यह रही कि प्रेस ब्रीफिंग के लिए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, बंगाल की पूर्व सीएम ममता बनर्जी आईं. अंत में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आए. इंडिया गठबंधन की अब तक जितनी भी बैठकें हुई हैं उसमें प्रेस ब्रीफिंग के लिए राहुल गांधी कभी भी नहीं आए. दूसरी बात किसी भी बैठक या सम्मेलन में मुख्य वक्ता को सबसे अंत में बुलाया जाता है. तो क्या 30 सितंबर को इंडिया गठबंधन की हुई बैठक के जरिए राहुल गांधी ने यह संदेश दे दिया है कि अब इस समूल के सर्वमान्य नेता वो ही हैं. इस दौरान राहुल गांधी ने कहा- ‘सभी विपक्षी नेता भारत के संविधान के सामूहिक रक्षक हैं और देश में बड़े बदलाव लाएंगे.’
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले बने इंडिया गठबंधन की बैठकों में खासतौर पर ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल विशेषतौर पर कांग्रेस को लेकर कुछ ऐसी बातें करते हुए देखे जाते रहे हैं जिसकी वजह से गठबंधन की एकता पर सवाल उठते रहे हैं. केजरीवाल अब इस गठबंधन में नहीं हैं. लेकिन ममता बनर्जी हैं, अब वह राहुल गांधी को इस बात की क्रेडिट देती दिखीं कि उन्होंने ही सबसे पहले वोट चोरी के मुद्दे को उठाया था.
जब यह गठबंधन बना था तो उस समय इसके घटक दलों के नेताओं में ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, एमके स्टालिन, हेमंत सोरेन और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे. यानी पांच पावर सेंटर थे. मौजूदा समय में नीतीश कुमार गठबंधन से पहले ही अलग हो चुके हैं. टीवीके की सरकार बनाने में कांग्रेस की ओर से मदद करने के चलते एमके स्टालिन भी इंडिया गठबंधन से अलग हो चुके हैं. ममता बनर्जी चुनाव हारकर सत्ता के साथ अपनी पार्टी भी गंवा चुकी हैं.
पूरे गठबंधन में केवल हेमंत सोरेन और उमर अब्दुल्ला ही ऐसे नेता बचे हैं जो इस समय मुख्यमंत्री हैं. गठबंधन में शामिल तमाम राजनीतिक दलों की अपने राज्यों में भी बेहद खराब हालत है. ऐसे में मौके का लाभ उठाते हुए कांग्रेस इंडिया गठबंधन को लीड करती नजर आ रही है. वहीं पूरे गठबंधन की स्टेयरिंग बिना कुछ कहे राहुल गांधी संभालते नजर आ रहे हैं.
संयोजक की कुर्सी को लेकर बिखरा था इंडिया गठबंधन
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने करीब छह महीने तक तमाम विपक्षी दलों के नेताओं के पास जाकर उन्हें एकजुट करने की कोशिश की. उनके इस प्रयास के बाद 23 जून 2023 को पटना में 17 विपक्षी दलों की पहली बैठक हुई. इसी बैठक के बाद चर्चा शुरू हुई कि नीतीश कुमार इसके संयोजक बनाए जाएंगे. विपक्षी पार्टियों की 17–18 जुलाई 2023 को बेंगलुरु (कर्नाटक) में हुई दूसरी बैठक के दौरान इसे इंडिया गठबंधन नाम दिया गया है. इस बैठक में भी नीतीश कुमार को संयोजक नहीं बनाया गया. बाद के दिनों में जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष ने बताया कि ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने दलित नेता को संयोजक बनाने की बात छेड़कर गठबंधन में दरार डालने का काम कीं. इसके बाद इंडिया गठबंधन की नींव रखने वाले नीतीश कुमार खुद इससे अलग होकर दोबारा एनडीए में आ गए, तब से वह वहीं हैं.
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान सबसे पहले ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को एक भी सीट देने को तैयार नहीं हुईं. अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में तो गठबंधन किया, लेकिन पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के उम्मीदवार आपस में भिड़ते दिखे. ठीक इसी तरह केरल में भी वामदलों के प्रत्याशियों के खिलाफ कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव लड़ते दिखे.
2024 के लोकसभा चुनाव का जब रिजल्ट आया तो पता चला कि इस इंडिया गठबंधन का असर केवल उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में देखने को मिली. यूपी में सपा के साथ गठबंधन में 43 सीटें जीते, वहीं महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे को 9, शरद पवार की पार्टी को 8 और कांग्रेस को 13 सीटें आईं. मुख्यरूप से इन्हीं दोनों राज्यों की वजह से बीजेपी अकेले दम पर बहुमत से दूर 240 सीटों पर सिमट गई. हालांकि बाद में उद्धव ठाकरे और शरद पवार की पार्टी के ज्यादातर सांसद टूटकर एनडीए में आ गए. वहीं ममता बनर्जी के भी 20 सांसद एनडीए खेमे में हैं.
