Train Delay Compensation: झारखंड के एक यात्री के लिए ट्रेन की 8 घंटे 48 मिनट की देरी रेलवे पर भारी पड़ गई. टाटानगर से संबलपुर जा रहे संजय कुमार की इस्पात एक्सप्रेस तय समय से 528 मिनट देर से पहुंची. यात्री ने शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानी का हवाला देते हुए रेलवे से 4.5 लाख रुपये मुआवजा मांगा था. जिला उपभोक्ता आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए रेलवे को 30 हजार रुपये मुआवजा और 5 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के तौर पर देने का आदेश दिया.
ट्रेन लेट होने की शिकायत अक्सर यात्रियों के लिए रोजमर्रा की परेशानी बन जाती है, लेकिन झारखंड में एक यात्री की करीब 9 घंटे की देरी रेलवे पर भारी पड़ गई. टाटानगर से संबलपुर जा रहे एक यात्री को ट्रेन के 8 घंटे 48 मिनट देर से पहुंचने के मामले में जिला उपभोक्ता आयोग ने रेलवे को मुआवजा देने का आदेश दिया है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने रेलवे को यात्री को 30 हजार रुपये मुआवजे के तौर पर देने के साथ-साथ 5 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में भी भुगतान करने का निर्देश दिया है. यानी यात्री को कुल 35 हजार रुपये मिलेंगे. यह आदेश 2 सितंबर 2026 को सुनाया गया.
5 घंटे का सफर, लेकिन लग गए करीब 14 घंटे!
मामला संजय कुमार का है, जिन्होंने 23 सितंबर 2024 को टाटानगर से संबलपुर जाने के लिए इस्पात एक्सप्रेस में स्लीपर क्लास की दो टिकट बुक की थीं. ट्रेन को टाटानगर से सुबह 10 बजकर 18 मिनट पर रवाना होना था और दोपहर 3 बजकर 50 मिनट तक संबलपुर पहुंचना था.
लेकिन ट्रेन अपने तय समय पर नहीं चली. जब ट्रेन संबलपुर पहुंची तो वह निर्धारित समय से 528 मिनट यानी 8 घंटे 48 मिनट देर कर चुकी थी.
यात्री ने आरोप लगाया कि इस देरी की वजह से उसे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ी. इसके लिए उसने रेलवे से 4.5 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी.
‘उपभोक्ता आयोग को सुनवाई का अधिकार नहीं’
मामला उपभोक्ता आयोग पहुंचा तो रेलवे ने शिकायत का विरोध किया. रेलवे की ओर से कहा गया कि इस तरह के मामले की सुनवाई रेलवे दावा न्यायाधिकरण कानून के तहत होनी चाहिए, इसलिए उपभोक्ता आयोग को इस पर सुनवाई का अधिकार नहीं है.
रेलवे ने यह भी दलील दी कि IRCTC और खड़गपुर मंडल को मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया है. इसके अलावा रेलवे ने जरूरी नोटिस प्रक्रिया का पालन नहीं होने और देरी से हुए आर्थिक नुकसान के पर्याप्त सबूत नहीं होने की बात भी कही. रेलवे ने सेवा में किसी तरह की कमी से भी इनकार किया.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बदल दिया मामले का रुख
जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह और सदस्य प्रदीप कुमार मिश्रा व संजू शाही की पीठ ने सबसे पहले रेलवे की ओर से उठाए गए अधिकार क्षेत्र के सवाल पर विचार किया. आयोग ने ट्रेन की देरी और यात्रियों को मिलने वाले मुआवजे से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उपभोक्ता आयोग इस शिकायत पर सुनवाई कर सकता है.
इसके बाद आयोग ने रेलवे से पूछा कि आखिर ट्रेन इतनी देर से क्यों पहुंची और क्या यह देरी ऐसी परिस्थितियों के कारण हुई थी, जो रेलवे के नियंत्रण से बाहर थीं. आयोग के मुताबिक, रेलवे यह साबित नहीं कर पाया कि ट्रेन की देरी उसके नियंत्रण से बाहर की वजह से हुई थी.
यात्री का समय भी कीमती है
आयोग ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि यात्रियों का समय बेहद महत्वपूर्ण है. रेलवे को सिर्फ यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि ट्रेन लेट हो गई, बल्कि उसे देरी की वजह भी बतानी होगी और यह साबित करना होगा कि देरी उसके नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण हुई.
आयोग ने माना कि संजय कुमार ने टिकट और अन्य दस्तावेजों के जरिए अपनी शिकायत को साबित किया है. आयोग के मुताबिक, ट्रेन की लंबी देरी के कारण यात्री को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानी हुई. इसी आधार पर आयोग ने रेलवे की सेवा में कमी मानी और यात्री को मुआवजा देने का आदेश दिया.
4.5 लाख की मांग, मिला 30 हजार का मुआवजा
संजय कुमार ने अपनी परेशानी के लिए रेलवे से 4.5 लाख रुपये मुआवजा मांगा था. हालांकि, आयोग ने उनकी शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 30 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. इसके अलावा रेलवे को 5 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के तौर पर भी देने होंगे.
आयोग ने रेलवे को आदेश की तारीख से 45 दिनों के भीतर रकम का भुगतान करने को कहा है. अगर तय समय में भुगतान नहीं किया जाता है तो पूरी रकम पर 12 प्रतिशत सालाना ब्याज लगेगा और भुगतान होने तक यह ब्याज जारी रहेगा.
