उत्तर प्रदेश=किसी व्यक्ति को सिर्फ गैंगस्टर का लेबल लगा देने के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती:सुप्रीम कोर्ट

देश

Supreme Court: यूपी गैंगस्टर एक्ट पर अदालत की सख्त टिप्पणी, कहा- मनमानी कार्रवाई की इजाजत नहीं; और क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गैंगस्टर कानून के प्रावधानों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत का कहना है कि किसी व्यक्ति को केवल गैंगस्टर के रूप में चिन्हित करना अपने आप में दंड का आधार नहीं बन सकता। पीठ ने माना कि कानून की मौजूदा संरचना नागरिकों की स्वतंत्रता प्रभावित करने और लंबे समय तक बिना मुकदमे हिरासत की स्थिति पैदा करने का खतरा रखती है।

नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के दुरुपयोग की आशंका है। कोर्ट ने कहा कि 1986 का यह कानून शुरू से ही निष्प्रभावी (स्टिलबॉर्न) है, क्योंकि किसी व्यक्ति को सिर्फ गैंगस्टर का लेबल लगा देने के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि हिंसा और संगठित अपराध रोकने के लिए बनाया गया यह कानून अनजान नागरिकों के खिलाफ भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

क्या है स्टिलबॉर्न शब्द का अर्थ?
उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट एक विशेष राज्य कानून है। इसे संगठित अपराध गिरोहों, आपराधिक गैंग और आदतन असामाजिक तत्वों को निशाना बनाने, नियंत्रित करने और सजा देने के लिए बनाया गया था। “स्टिलबॉर्न” एक कानूनी शब्द है। इसका इस्तेमाल ऐसे कानून के लिए किया जाता है, जिसे शुरुआत से ही अमान्य या कानूनी रूप से निष्प्रभावी माना जाता है, क्योंकि वह किसी वैध अपराध को स्पष्ट रूप से तय नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट ने की क्या टिप्पणी?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कानून हिंसा रोकने के नाम पर नागरिकों के खिलाफ हिंसा को “बढ़ावा” देने की स्थिति पैदा कर सकता है। पीठ ने कहा, “गैंग की परिभाषा तय करने के बाद, जिसमें उप-खंड (क) से (25वें) में सूचीबद्ध अपराधों को करना शामिल है, और गैंगस्टर को गैंग के सदस्य, नेता या आयोजक के रूप में परिभाषित करने के बाद, बिना किसी अपराध को कानून के तहत बनाए गैंगस्टर के लिए सजा तय की गई है। यही इस दंड कानून को शुरू से ही निष्प्रभावी बनाता है।”

शीर्ष अदालत ने अंग्रेजी लेखक जॉर्ज ऑरवेल को उद्धृत करते हुए कहा, “जो लोग हिंसा से दूर रहते हैं, वे ऐसा केवल इसलिए कर सकते हैं क्योंकि दूसरे उनकी ओर से हिंसा कर रहे हैं।” शीर्ष अदालत ने कहा कि आपराधिक गिरोहों के खतरे पर रोक लगाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए अपनाए गए तरीके को सही नहीं ठहराया जा सकता। खासकर तब, जब ऐसा दंड कानून बनाया जा रहा हो जो नागरिकों की स्वतंत्रता में दखल देता है।

गैंगस्टर एक्ट पर क्या है सुप्रीम कोर्ट का रुख?
पीठ ने कहा, “अधिनियम के प्रावधान आरोपी को लंबे समय तक बिना मुकदमे के हिरासत में रखने की स्थिति पैदा कर सकते हैं, जो एक ऐसे कानून के समान है, जिसमें निवारक हिरासत का प्रावधान हो। हालांकि, अनुच्छेद 21 के बावजूद निवारक हिरासत को अनुमति दी गई है, लेकिन इसके साथ सुरक्षा उपाय जुड़े हैं। इन्हें महत्वपूर्ण माना गया है और प्रक्रिया में मामूली उल्लंघन भी हिरासत में लिए गए व्यक्ति की रिहाई का आधार बन सकता है।”

अदालत ने रद्द किए दो वकीलों के खिलाफ आपराधिक मामले
पीठ ने कहा, “सामाजिक खतरा कितना भी गंभीर और चिंताजनक क्यों न हो, उससे निपटने के लिए बनाया गया कोई भी दंड कानून किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ मनमानी और मनमौजी कार्रवाई की अनुमति नहीं दे सकता, जिस पर अपराध करने का आरोप लगाया गया हो।” सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 के तहत दो वकीलों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द करते हुए सुनाया।