भक्ति की अनूठी मिसाल: जगन्नाथ पुरी में आज भी इस मुस्लिम भक्त की मजार पर रुकता है भगवान का रथ

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जगन्नाथ पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा अपनी भव्यता के साथ-साथ आपसी सौहार्द और अटूट भक्ति की कहानियों के लिए भी जानी जाती है। इस यात्रा की एक सदियों पुरानी अनोखी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है, जहाँ भगवान जगन्नाथ का विशाल रथ उनके…

पुरी 

जगन्नाथ पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा अपनी भव्यता के साथ-साथ आपसी सौहार्द और अटूट भक्ति की कहानियों के लिए भी जानी जाती है। इस यात्रा की एक सदियों पुरानी अनोखी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है, जहाँ भगवान जगन्नाथ का विशाल रथ उनके परम भक्त सालबेग की मजार पर कुछ देर के लिए अनिवार्य रूप से रुकता है।

कौन थे भक्त सालबेग?
इतिहास के अनुसार, सालबेग का जन्म एक मुगल सूबेदार पिता और हिंदू मां के घर हुआ था। युवावस्था में वे एक गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए थे, जिससे ठीक होने के बाद उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई। उन्होंने अपना शेष जीवन पूरी तरह से भगवान जगन्नाथ की भक्ति में समर्पित कर दिया।

मंदिर में प्रवेश न मिलने पर भी नहीं डिगी भक्ति
मुस्लिम समुदाय से संबंध रखने के कारण, उस समय के नियमों के तहत सालबेग को जगन्नाथ मंदिर के भीतर प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई थी। हालांकि, इस बाधा ने उनकी ईश्वर के प्रति आस्था को कम नहीं किया। उन्होंने मंदिर के बाहर रहकर ही भगवान की स्तुति में कई भजनों की रचना की। उनकी भक्ति की शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके द्वारा रचित एक भजन आज भी जगन्नाथ पुरी के गर्भगृह में गाया जाता है।

अटूट परंपरा
भगवान जगन्नाथ और उनके भक्त के बीच के इस प्रेम को सम्मान देने के लिए ही रथ यात्रा के दौरान रथ को सालबेग की मजार पर रोका जाता है। यह परंपरा न केवल सालबेग की भक्ति को नमन करती है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि ईश्वर के दरबार में भक्ति का स्थान किसी भी जाति या धर्म से ऊपर है।