पुलिस से हुई यह चूक, तो अरेस्‍ट-रिमांड होगी अवैध! उन्‍नाव केस में SC की दो टूक, 10 लाख के मुआवजे पर फिलहाल रोक

देश

सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर एक अहम टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी के समय उसके खिलाफ कार्रवाई के लिखित आधार नहीं बताए जाते हैं तो गिरफ्तारी और उसके बाद की न्यायिक रिमांड दोनों अवैध मानी जाएंगी. यह टिप्पणी उन्नाव के एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई है.

 

नई दिल्ली
 सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी के समय उसके खिलाफ कार्रवाई के आधार नहीं बताए जाते हैं, तो ऐसी गिरफ्तारी और उसके बाद दी गई न्यायिक रिमांड दोनों अवैध मानी जाएंगी. यह मामला उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में दर्ज एक आपराधिक केस से जुड़ा है. मनोज कुमार नाम के एक शख्‍स ने सुप्रीम कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल कर अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी थी और रिहाई की मांग की थी.

मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी मेमो की जांच की. अदालत ने पाया कि दस्तावेज में केवल अपराध संख्या का उल्लेख था, लेकिन गिरफ्तारी के वास्तविक आधार नहीं बताए गए थे. हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ‘मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य’ और ‘डॉ. राजिंदर राजन बनाम भारत संघ’ का हवाला देते हुए कहा था कि गिरफ्तारी के आधार न बताना कानून और संविधान दोनों का उल्लंघन है. अदालत ने साफ कहा था कि ऐसी स्थिति में गिरफ्तारी और उसके बाद की न्यायिक रिमांड दोनों अवैध हो जाती हैं.
राज्य सरकार से मांगा था जवाब
हाईकोर्ट ने यह भी पूछा था कि मनोज कुमार को करीब तीन महीने तक कथित तौर पर अवैध हिरासत में रखने के लिए राज्य सरकार पर दंडात्मक लागत क्यों न लगाई जाए. सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) द्वारा दाखिल हलफनामे पर भी नाराजगी जताई थी. हाईकोर्ट ने कहा था कि हलफनामे में अदालत की चिंताओं का कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया. उसमें केवल यह कहा गया था कि विभिन्न अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी गई है और मामला विचाराधीन है. अदालत ने टिप्पणी की थी कि ऐसा लगता है कि अतिरिक्त मुख्य सचिव ने अदालत के पहले के आदेश का गंभीरता से अध्ययन तक नहीं किया.
हाईकोर्ट ने दिया था 10 लाख रुपये मुआवजा
इन परिस्थितियों को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को मनोज कुमार को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था. अदालत का मानना था कि व्यक्ति को तीन महीने से अधिक समय तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया. सोमवार को न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील पर नोटिस जारी किया. पीठ ने कहा कि अगली सुनवाई तक हाईकोर्ट द्वारा दिए गए 10 लाख रुपये के मुआवजे या लागत संबंधी आदेश पर रोक रहेगी और फिलहाल यथास्थिति बनाए रखी जाएगी.
यूपी सरकार ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश वकील ने एक महत्वपूर्ण बात स्वीकार की. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इस तथ्य से इनकार नहीं कर रही है कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराए गए थे. हालांकि, सरकार का कहना था कि वह केवल हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित 10 लाख रुपये के मुआवजे की राशि को चुनौती दे रही है. राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि मामले से जुड़े संबंधित एसएचओ को निलंबित कर दिया गया है.