प.बंगाल में भाजपा की जीत के बाद अब विपक्ष में नए सिरे से एकजुटता बनती नजर आ रही है।
प.बंगाल में भाजपा की जीत के बाद अब विपक्ष में नए सिरे से एकजुटता बनती नजर आ रही है। 4 मई की रात राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि असम और बंगाल में भाजपा द्वारा चुनाव आयोग के समर्थन से चुनाव धांधली के स्पष्ट उदाहरण हैं। हम ममताजी से सहमत हैं। बंगाल में 100 से अधिक सीटें धांधली से जीती गईं। हमने पहले भी इस तरह की रणनीति देखी है: मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, लोकसभा 2024 आदि। चुनाव चोरी, संस्था चोरी- अब और चारा ही क्या है!
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पहली बार चुनाव चोरी, संवैधानिक संस्थाओं पर भाजपा के कब्जे की बात नहीं कही है, वे लगातार इस मुद्दे को संसद से सड़क तक उठाते रहे हैं। चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में कितनी गड़बड़ियां कीं, इसके सबूत कर्नाटक, महाराष्ट्र से लेकर हरियाणा चुनावों के बाद राहुल गांधी ने दिखाए। अब एक बार फिर राहुल गांधी इसी चुनाव चोरी, संस्था चोरी की बात कह रहे हैं। लेकिन उसके बाद जब वे कहते हैं अब और चारा ही क्या है, तो यह उनकी निराशा नहीं है, बल्कि लोकतंत्र पर भाजपा के आखिरी प्रहार की गूंज है। अब कम से कम विपक्ष के बाकी दलों को सोचना चाहिए कि जब राहुल गांधी वोट चोरी पर बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करते थे और सैकड़ों पत्रकारों के सामने अकेले खड़े होकर उनके सवालों को लेने के लिए तैयार रहते थे, तब विपक्ष के बाकी दलों ने उनका उसी तरह साथ देने का जज्बा क्यों नहीं दिखाया।
बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने जब वोटर अधिकार यात्रा निकाली तब टीएमसी की तरफ से ममता बनर्जी या अभिषेक बनर्जी भी उनके साथ उतरते तो क्या इसके बाद बंगाल में बिहार की तरह खेल संभव हो पाता?
बहरहाल, पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद अब ऐसे किंतु-परंतु वाले कई सवाल विपक्ष के सामने खड़े हो चुके हैं और इनका सामना करने में ही समझदारी है। अच्छी बात यह है कि खुद ममता बनर्जी इस बात को समझ रही हैं। मंगलवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में ममता बनर्जी ने कहा कि इंडिया गठबंधन के सभी नेताओं ने उन्हें फोन किया और अब वे विपक्षी एकजुटता को मजबूत करेंगी। विपक्ष का साथ आना अब जरूरी भी है क्योंकि भाजपा अब पहले से कहीं ज्यादा अहंकार के साथ नजर आ रही है। नरेन्द्र मोदी ने भले अपने विजय भाषण में कहा कि बदला नहीं बदलाव की बात करनी है, लेकिन प.बंगाल में कल से टीएमसी दफ्तरों पर भाजपा कार्यकर्ताओं के हमले शुरु हो चुके हैं। आसनसोल, सिलीगुड़ी, जलपाईगुड़ी, फल्टा समेत कई जगहों पर टीएमसी के बूथों या कार्यालयों में भाजपा के लोगों ने उपद्रव मचाया है। एक जगह तो विजय जुलूस में एक पुरुष को ममता बनर्जी जैसी साड़ी में लपेट कर चप्पलों से पीटा जा रहा है, बांध कर घसीटा जा रहा है। ऐसे दृश्य बताते हैं कि भाजपा ने कितनी नफरत प.बंगाल में भर दी है।
ऐसा नहीं है कि भाजपा का असली चेहरा अभी लोगों को दिख रहा है। यह तो 2014 से ही नजर आ रहा था। उस समय भी गांधी परिवार से नफरत दिखाई गई, फिर धीरे-धीरे विपक्षी दलों को तोड़ने का काम किया गया। नोटबंदी, जीएसटी या लॉकडाउन जैसे फैसले तो लिए ही गए, जिनमें आम जनता के सामने पहली चुनौती अपने जान-माल की रक्षा की हो गई और वो उसमें इतनी उलझ गई कि सरकार असल में कैसे काम कर रही है, इस पर ध्यान ही नहीं गया। जो थोड़ी बहुत कसर रह गई उसे मंदिर और धर्म की राजनीति से पूरा कर दिया गया। नरेन्द्र मोदी के अलावा देश में कभी कोई ऐसा प्रधानमंत्री नहीं हुआ जो हर दूसरे महीने कभी त्रिशूल, कभी डमरू, कभी माथे पर तिलक लगाकर मंदिरों में पूजा-पाठ की रील बनवाता रहे। लेकिन अब लोगों ने इसे न्यू नॉर्मल मानकर इस पर भी सवाल उठाना छोड़ दिया है। नतीजा ये है कि संविधान बदलने और संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जे की जो कोशिश भाजपा शुरु से करती आई है, उसमें अब उसे सफलता मिल रही है। प.बंगाल में भाजपा की बड़ी जीत इसी दिशा में अब एक बड़ा कदम है। ऐसे में विपक्ष का फिर से साथ आना जरूरी हो गया है।
2024 के चुनाव के लिए 2023 में ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं की पहल पर ही विपक्षी एकजुटता की कोशिश शुरु हुई थी। तब राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा के कारण देश भर में अपना दम दिखा चुके थे, इसलिए कांग्रेस स्वाभाविक तौर पर इस गठबंधन में सबसे प्रभावशाली स्थिति में थी। लेकिन क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों को राहुल गांधी का नेतृत्व रास नहीं आया। नीतीश कुमार तो जल्दी ही पलटी मार गए। ममता बनर्जी नानुकुर के साथ इंडिया गठबंधन में रहीं, अरविंद केजरीवाल पर भरोसा किया ही नहीं जा सकता था। फिर भी संविधान बचाने के मुद्दे पर भाजपा को घेरने की कोशिश राहुल गांधी ने की, उनका साथ विपक्ष के नेताओं ने दिया और आखिर में भाजपा को 240 पर लोकसभा में रोकने में मदद मिल गई। ध्यान रहे कि पूरी तरह एकजुट न होने और महज एक साल के वक्त में यह कमाल इंडिया गठबंधन ने कर दिखाया था।
तो अब अगर निजी स्वार्थों को किनारे कर सारे दल फिर से एकजुटता दिखाएं और आने वाले दो-ढाई सालों में पूरे देश में जमकर काम करें, राहुल गांधी की तरह जमीन पर उतरें, जनता की नब्ज़ पकड़ें तो क्या माहौल बदला नहीं जा सकता।
माना कि यह बड़ी आदर्श कल्पना है और चुनावी राजनीति में आदर्श की बातें काम नहीं आती, लेकिन इसके अलावा विपक्ष के पास विकल्प भी नहीं है। इस समय पूर्व, उत्तर और पश्चिम भारत पर भाजपा का वर्चस्व कायम हो चुका है। पूरे देश में उसके 17 मुख्यमंत्री हैं। दक्षिण में कांग्रेस ने कमान संभाली है, लेकिन उसे अपना दायरा बढ़ाने के लिए अब बाकी क्षेत्रीय दलों की जरूरत है। उत्तर में पंजाब, हिमाचल प्रदेश, झारखंड और जम्मू-कश्मीर ही विपक्ष के पास बचे हैं। राज्यसभा में भाजपा की शक्ति बढ़ चुकी है और अब लोकसभा में भी विपक्ष की सीटें छीनने की कोशिश वह करेगी।
विपक्ष को असली मजबूती राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, उत्तराखंड, ओडिशा, आंध्रप्रदेश जैसे राज्यों में जीत हासिल करने से ही मिलेगी। इसके बाद ही राज्यसभा में अंकों के खेल में वह मुकाबले में आएगी या लोकसभा में मजबूती से सामना कर पाएगी। इन राज्यों को जीतने के लिए जरूरी है कि समूचा विपक्ष एक साथ आए। विपक्ष के दलों के लिए यह आत्ममंथन का वक्त है कि उन्हें लोकतंत्र के साथ अपना अस्तित्व बचाना है या फिर भाजपा के बिना विपक्ष वाली राजनीति और सत्ता के सपने को सच करना है।
