क्या किसी को जमानत मिलने के बाद अगर उस पर कोई नया केस दर्ज हो जाए, तो क्या उसकी बेल रद्द हो जाएगी? सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को पलट दिया है। लेकिन वजह कुछ और निकली, आखिर कोर्ट ने ऐसा क्यों किया और नए कानून की धारा 480(3) क्या कहती है? जानिए इस फैसले की पूरी कहानी।
नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अक्सर यह देखा जाता है कि जमानत पर बाहर आए व्यक्ति पर कोई नया केस दर्ज होते ही उसकी पुरानी बेल रद्द कर दी जाती है।
हालांकि अब अदालत ने साफ कर दिया है कि सिर्फ दूसरी एफआईआर (FIR) दर्ज होना बेल रद्द करने का मुख्य आधार नहीं हो सकता है। अदालत के इस फैसले से उन लोगों को बड़ी राहत मिलेगी, जिनकी जमानत पुलिस सिर्फ अगले केस का हवाला देकर रद्द करवा देती थी।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला क्यों पलटा?
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- यह पूरा मामला मध्य प्रदेश के देवास जिले का है, जहां नारायण नाम के व्यक्ति को आबकारी एक्ट (शराब से जुड़े मामले) में नवंबर 2024 में जमानत मिली थी।
- जमानत मिलने के बाद पुलिस ने हाईकोर्ट में शिकायत की कि आरोपी ने बाहर आकर फिर से अपराध किया है।
- पुलिस की इस शिकायत के आधार पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नारायण की जमानत को तुरंत रद्द कर दिया था।
- इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की बेंच ने सुनवाई की।
- सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को गलत माना और नारायण की जमानत को फिर से बहाल कर दिया है।
अदालत ने जमानत रद्द करने से क्यों किया इनकार?
सुप्रीम कोर्ट ने नए कानून BNSS की धारा 480(3) का हवाला देते हुए इस पूरे मामले को बहुत ही आसान भाषा में समझाया। अदालत ने कहा कि बेल रद्द करने के कड़े नियम हर छोटे-मोटे मामले में लागू नहीं किए जा सकते हैं। यह नियम (धारा 480(3)) केवल उन गंभीर अपराधों में लागू होता है, जिनमें 7 साल या उससे ज्यादा की सजा का प्रावधान हो। नारायण के मामले में जो नया अपराध दर्ज हुआ था, उसमें सजा 5 साल से कम थी। इसलिए, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 5 साल से कम सजा वाले मामले में सिर्फ नई एफआईआर के आधार पर पुरानी जमानत नहीं छीनी जा सकती।
क्या आरोपी को मिल गई है पूरी छूट?
सुप्रीम कोर्ट ने नारायण की जमानत जरूर बहाल की है, लेकिन उसे पूरी तरह से खुली छूट नहीं दी है। जजों की बेंच ने आरोपी को सख्त चेतावनी दी है कि वह भविष्य में किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होगा। अगर वह दोबारा कोई ऐसा अपराध करता है जो गंभीर है, तो पुलिस उसकी जमानत रद्द करने की मांग कर सकती है। अगर ऐसा हुआ तो राज्य सरकार को कानून के अनुसार नए सिरे से बेल रद्द कराने का पूरा अधिकार होगा। यह फैसला पुलिस और निचली अदालतों के लिए एक बड़ा संदेश है कि बिना ठोस कानूनी आधार के किसी की आजादी नहीं छीनी जा सकती है।
