इस्लामाबाद
अमेरिका-ईरान के बीच शांति की कोशिशें चल रही हैं. इस बीच अब कूटनीति का खेल और दिलचस्प हो गया है. पाकिस्तान, जो खुद को इस पूरे विवाद में ‘मध्यस्थ’ के तौर पर पेश कर रहा था, अब अकेले नहीं चल पा रहा. इसी वजह से उसने चीन को इस खेल में उतार दिया है. CNN-न्यूज-18 के सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान ने बीजिंग से मदद मांगते हुए अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को पटरी पर लाने की कोशिश तेज कर दी है. दरअसल, ईरान को अब इस्लामाबाद पर भरोसा नहीं रहा और वह किसी मजबूत गारंटी की तलाश में है. यही वजह है कि चीन की एंट्री जरूरी हो गई है.
ईरान को पाकिस्तान पर विश्वास नहीं
ईरान में अब मुनीर को अमेरिका के डबल एजेंट के तौर पर देखा जा रहा है. ईरानी मीडिया में अब मुनीर की जमकर बुराई की जा रही है. बताया जा रहा है कि एक 6-पॉइंट फ्रेमवर्क तैयार किया गया है, जिसे चीन के साथ मिलकर डिजाइन किया गया है. इस फ्रेमवर्क में परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल, सुरक्षा गारंटी और भविष्य की आर्थिक साझेदारी जैसे बड़े मुद्दों को शामिल किया गया है. यानी अब यह सिर्फ हथियारों की बात नहीं, बल्कि रिश्तों को रीसेट करने की कोशिश भी है. इस प्रस्ताव में अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय तक चलने वाले समझौते की जमीन तैयार करने की कोशिश दिख रही है.
चीन को बातचीत में क्यों शामिल कर रहा पाकिस्तान?
सूत्रों का कहना है कि ईरान साफ तौर पर चाहता है कि जो भी डील हो, वह टिकाऊ हो और उसमें ठोस गारंटी हो. पाकिस्तान इस भरोसे को अकेले नहीं दिला पा रहा, इसलिए चीन को आगे लाया गया है. चीन की दिलचस्पी भी सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है. होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और अमेरिकी नाकेबंदी ने उसकी ऊर्जा सप्लाई पर असर डाला है. ऐसे में चीन चाहता है कि हालात जल्द सामान्य हों, ताकि तेल और गैस का प्रवाह बाधित न हो. इस बीच पाकिस्तान एक साथ कई मोर्चों पर बातचीत कर रहा है. वह ईरान, अमेरिका, चीन और सऊदी अरब से लगातार संपर्क में है. इस कोशिश में वह खुद को एक ‘कनेक्टिंग ब्रिज’ की तरह पेश कर रहा है.