पश्चिम एशिया संकट से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर खतरा है. दुनिया में तेल की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित है. इससे तेल की कीमतें आसमान छू रही है. भारत भी इस असर से अछूता नहीं है. जाने माने सामरिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी के अनुसार वाशिंगटन के दबाव में भारत ने ईरान और रूस से दूरी बनाई और इसी कारण आज उसकी ऊर्जा सुरक्षा कमजोर हुई है.
Brahma Chellaney On India Oil Security And Donald Trump Pressure: पश्चिम एशिया का संकट भयावह होते जा रहा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल टैंकरों के गुजरने पर खतरा चरम पर है. इस कारण दुनिया में तेल की महंगाई से आम जनजीवन पर असर पड़ने लगा है. इससे भारत भी अछूता नहीं है. इस जंग से सीधे तौर पर भारत को कुछ लेना-देना नहीं है लेकिन, अमेरिका के कहने पर भारत ने बीते कुछ सालों में कई ऐसे कदम उठाए हैं जिससे उसकी ऊर्जा सुरक्षा पर संकट आ गया है. यह बता हम नहीं बल्कि जाने माने सामरिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने कही कही है.
इजरायल और अरब में अमेरिका के सहयोगी देशों पर ईरान के मिसाइल हमलों से हर तरफ कोहराम मचा हुआ है. दुनिया के किसी भी जानकार को ऐसी उम्मीद नहीं थी कि जंग में ईरान इतनी ताकत से पलटवार करेगा. जंग को तीन सप्ताह से अधिक का समय बीत चुका है. लेकिन, अभी भी इसके खत्म होने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है. यह दिन प्रति दिन और विकराल होते जा रहा है.
ब्रह्मा चेलानी का पोस्ट
एक्स पर एक पोस्ट में ब्रह्मा चेलानी लिखते है- वाशिंगटन के नियमों का खामियाजा: भारत फिर फंस गया. वह आगे विस्तार से लिखते हैं- पिछले महीने अमेरिका के साथ फ्रेमवर्क ट्रेड डील तय होने के तुरंत बाद, वाशिंगटन के कहने पर भारत ने तीन टैंकरों को जब्त कर लिया था. ये टैंकर अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में थे क्योंकि ये ईरान और रूस का तेल ले जा रहे थे. अब उसी अमेरिका ने चुपके से अपने उस फैसले में बदलाव कर दिया है. बढ़ते तेल के दामों और ईरान के खिलाफ छिड़े युद्ध के वैश्विक असर को कम करने के लिए वाशिंगटन ने शैडो फ्लीट टैंकरों पर लगे प्रतिबंध ढीले कर दिए हैं.
र्ष 2019 में जब अमेरिका ने ईरान के तेल निर्यात पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए, तब भारत ने पूरी तरह आज्ञाकारिता दिखाई. ईरान उस समय भारत का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर था. भारत ने अपना आयात शून्य कर दिया. वहीं चीन ने इन प्रतिबंधों की परवाह नहीं की और दुनिया के सबसे सस्ते तेल को खरीदता रहा. भारत का नुकसान सीधे चीन के फायदे में बदल गया. अब स्थिति फिर पलट गई है. तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. इन्हें काबू में करने के लिए अमेरिका ने ईरानी तेल पर लगे कुछ प्रतिबंधों में छूट दे दी है. भारत सात साल बाद पहली बार फिर ईरानी तेल खरीदने की कोशिश कर रहा है. लेकिन ईरान का जवाब साफ है- न तो समुद्र में कोई तेल बिक्री के लिए उपलब्ध है और न ही घर में अतिरिक्त स्टॉक. भले ही तेल उपलब्ध होता ईरान अब भारत को पहले वाले बड़े डिस्काउंट देने को तैयार नहीं दिख रहा.
रूस के साथ भी ऐसा ही हुआ
चेलानी लिखते हैं कि इसी तरह रूसी तेल के मामले में भी भारत पिछले कई महीनों से अमेरिकी दबाव में लगातार अपनी खरीद कम कर रहा था. अप्रैल 2022 के बाद सबसे कम स्तर पर आ गई थी रूसी तेल की आयात. लेकिन इस महीने वाशिंगटन ने भारत को 30 दिन की छूट दे दी कि वो समुद्र में पहले से मौजूद रूसी तेल खरीद सकता है.
नतीजा? भारत अब अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ज्यादा निर्भर हो गया है. ट्रंप प्रशासन के ईरान के खिलाफ युद्ध ने इस रणनीतिक कमजोरी को और बढ़ा दिया है. जब भी भारत वाशिंगटन के नियमों का पालन करने की कोशिश करता है, अंत में उसे नुकसान ही उठाना पड़ता है. चीन खुलेआम प्रतिबंध तोड़ता है और फायदा कमाता है, जबकि भारत आज्ञाकारी बनकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बार-बार खतरे में डालता है. वर्तमान में भारत ऊर्जा संकट की चपेट में है और इसकी एक बड़ी वजह खुद की वो नीति है जिसमें वह वाशिंगटन के इशारों पर बार-बार अपना रुख बदलता रहा.
