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जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदी क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से मांगा पाई-पाई का हिसाब

देश की जेलों में कैदियों की नारकीय स्थिति है। इस पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश आया है। शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि 18 मई 2026 तक किसी भी हाल में कैदियों की स्थिति बताएं। सुप्रीम कोर्ट की नजर अब जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों को रखने पर है।

 

नई दिल्ली

 देश की जेलों में कैदियों की नारकीय स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार किया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने एक बड़ा आदेश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे 18 मई तक अपनी जेलों का ब्यौरा पेश करें, यानी अदालत ने सभी राज्यों से पाई-पाई का हिसाब मांग लिया है।

 

शीर्ष अदालत ने साफ-साफ कहा है कि अब पुराने आंकड़ों से काम नहीं चलेगा। राज्यों को 1 मार्च 2026 तक की स्थिति के आधार पर यह बताना होगा कि उनकी जेलों में कुल कितने कैदी हैं। इतना ही नहीं, राज्यों को यह भी बताना होगा कि जेलों में कितने कैदी रह सकते हैं और अभी कितने कैदियों को रखा गया है।

 

सिर्फ आंकड़े नहीं, समाधान भी चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से केवल संख्या नहीं पूछी है, बल्कि यह भी पूछा है कि जेलों में बढ़ती भीड़ को कम करने के लिए प्रशासन ने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं? अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जेल-वार डेटा मांगा है। इससे यह पता चलेगा कि किस जेल में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं।

महिला कैदियों और बच्चों पर विशेष ध्यान
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में यह भी कहा है कि राज्य अपनी रिपोर्ट में बताएं कि महिला कैदियों के लिए उपलब्ध सुविधाएं कैसी हैं? इतना ही नहीं, कैदी मां के साथ जेल में रहने को मजबूर बच्चों के भविष्य और शिक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं? अदालत का कहना है कि इन बच्चों का स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा किसी भी हाल में प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

 

स्टाफ की कमी पर भी उठे सवाल
जेलों में बढ़ते अपराध के पीछे अक्सर सुरक्षाकर्मियों की कमी एक बड़ा कारण होती है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से जेल स्टाफ की संख्या और वर्तमान में खाली पड़े पदों का ब्यौरा भी मांगा है। राज्यों को यह भी बताना होगा कि इन रिक्तियों को भरने के लिए वे क्या प्रक्रिया अपना रहे हैं।

सुनवाई के दौरान न्याय मित्र गौरव अग्रवाल ने पीठ को बताया कि वर्तमान में शीर्ष अदालत के रिकॉर्ड में मौजूद आंकड़े 2023 के हैं। उन्होंने कहा कि न्याय के लिए ताजा डेटा का होना अनिवार्य है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गृह सचिवों को शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। बताते चलें कि अब इस मामले में 26 मई को अगली सुनवाई होगी। तब तक कोर्ट की रजिस्ट्री इन सभी हलफनामे को न्याय मित्र को सौंपेगी, जो इस डेटा का विश्लेषण कर एक विस्तृत नोट तैयार करेंगे।

 

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