सुप्रीम कोर्ट न्यायिक प्रक्रिया को लेकर काफी सतर्क और सजग रहता है. न्यायपालिका पर देश के लोगों का भरोसा कायम रहे, इसके लिए समय-समय पर कदम उठाए जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान इसको लेकर बड़ी बात कही है.
नई दिल्ली.
सुप्रीम कोर्ट ने अदालत के आदेशों का पालन न करने और अवमानना याचिका दायर होने पर देरी से अपील दाखिल करने की प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी जताई है. अदालत ने कहा है कि यदि ऐसे मामलों में सख्ती नहीं बरती गई तो न्यायपालिका में आम लोगों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है. जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि अदालत के आदेशों का लंबे समय तक पालन नहीं किया जाता और जब अवमानना याचिका दायर होती है तो उसके बाद अत्यधिक देरी के साथ अपील या पुनर्विचार याचिका दाखिल की जाती है. अदालत ने कहा कि अपील में देरी अपवाद होनी चाहिए, लेकिन अब यह लगभग नियम बनती जा रही है.
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस तरह की प्रवृत्ति को स्वीकार नहीं किया जा सकता. अदालत के अनुसार, जब कोई पक्ष जानबूझकर अदालत के आदेशों का पालन नहीं करता, तो इससे न्यायपालिका की गरिमा और कानून के शासन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. ऐसे मामलों में यह आचरण कई बार आपराधिक अवमानना की सीमा तक पहुंच सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट्स को ऐसे अनैतिक और लापरवाह याचिकाकर्ताओं से सख्ती से निपटना चाहिए, खासकर तब जब वे संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ या उससे जुड़े निकाय हों. अदालत ने कहा कि यदि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इन मामलों में दृढ़ता नहीं दिखाते, तो देश के आम नागरिकों का न्यायपालिका में अटूट विश्वास कमजोर पड़ने का खतरा पैदा हो सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने तय किया बेंचमार्क
शीर्ष अदालत की दो जजों की बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक बाधाओं या आदेश को लागू करने में कथित असंभवता का बहाना अवमानना कार्यवाही में स्वीकार नहीं किया जाएगा, यदि संबंधित पक्ष ने निर्धारित समय सीमा के भीतर अदालत को इन कठिनाइयों के बारे में अवगत नहीं कराया है. अदालत के अनुसार, आदेश की जानकारी होने के बावजूद यदि कोई पक्ष जानबूझकर उसका पालन नहीं करता, तो वह अवमानना के दायरे में आएगा. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अवमानना की कार्यवाही केवल अदालत में पक्षकार रहे व्यक्तियों तक सीमित नहीं होगी. यदि निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े तीसरे पक्ष या अन्य अधिकारी भी आदेश के क्रियान्वयन में बाधा डालते हैं, तो वे भी अवमानना के लिए जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं.
अदालत ने यह टिप्पणी छत्तीसगढ़ सरकार के अधिकारियों के खिलाफ दायर अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान की. मामला कर्मचारियों की सेवाओं के नियमितीकरण से जुड़े आदेश के पालन न करने से संबंधित था. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के अधिकारियों को आदेश लागू करने के लिए अंतिम अवसर देते हुए 15 दिन का समय दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था में करुणा और उदारता का स्थान जरूर है, लेकिन यदि कोई पक्ष अदालत के आदेशों की अवहेलना करता है, तो ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाना आवश्यक है ताकि न्यायपालिका की गरिमा और कानून के शासन की रक्षा की जा सके.