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इस्लामिक नाटो की निकल गई हवा, सऊदी-पाकिस्तान को ‘सुल्‍तान’ ने ही दिया धोखा, क्या ट्रंप से डर गए ‘खलीफा’?

Turkey Out of Islamic NATO: पाकिस्तान भारत से ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पिटने के बाद एक ऐसे गठबंधन की उम्मीद कर रहा था, जो उसकी सुरक्षा की गारंटी दे सके. हालांकि अब उसके सबसे पक्के दोस्त बने तुर्की ने ही इससे कदम पीछे खींच लिए हैं, जिसके बाद इस्लामिक नाटो की हवा निकलती दिख रही है.

 

Turkey Not Joining Islamic NATO: तुर्की अब सऊदी अरब और पाकिस्तान के उस गोल से बाहर निकल गया है जिसके बल पर इस्लामिक नाटो का सपना देखा जा रहा था. अब इस संगठन की हवा निकलती हुई दिख रही है क्योंकि तुर्की ने खुद को इस डिफेंस पैक्ट से बाहर कर लिया है. इससे पहले भी ऐसी अटकलें थीं कि इस समझौते को लेकर तुर्की से भी बातचीत हो चुकी है लेकिन अब कुछ और ही मामला सामने आ रहा है. समाचार एजेंसी AFP से बात करने वाले सूत्रों ने साफ कर दिया है कि तुर्की इस गठजोड़ का हिस्सा नहीं बनेगा.

सऊदी सेना से जुड़े एक करीबी सूत्र ने शनिवार को AFP को बताया कि तुर्की के इस रक्षा समझौते में शामिल होने की खबरें गलत हैं. उन्होंने साफ किया कि ‘तुर्की, पाकिस्तान के साथ होने वाले रक्षा समझौते में शामिल नहीं होगा. यह समझौता सिर्फ सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच है और आगे भी ऐसा ही रहेगा’. यह पाकिस्तान की उस पहल को बड़ा झटका है, जिसके जरिये वो इस्लामिक वर्ल्ड का रक्षक बन रहा था.

इस्लामिक नाटो की कोशिश नाकाम

खाड़ी देश के एक अधिकारी ने भी इस बात की पुष्टि की और कहा कि सऊदी अरब के तुर्की के साथ अलग रक्षा समझौते जरूर हैं, लेकिन पाकिस्तान के साथ किया गया समझौता पूरी तरह द्विपक्षीय है. अधिकारी ने साफ किया – ‘यह पाकिस्तान के साथ एक अलग और सीमित रक्षा संबंध है. तुर्की के साथ हमारे अपने समझौते हैं, लेकिन पाकिस्तान वाला समझौता केवल दो देशों के बीच ही रहेगा.’
आपको बता दें –
  1. हाल के महीनों में पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया में बढ़े तनावों के चलते तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच किसी त्रिपक्षीय सुरक्षा गठबंधन की अटकलें तेज हो गई थीं.
  2. ये चर्चाएं उस समय शुरू हुईं जब गर्मियों में इजरायल ने दोहा में हमास से जुड़े ठिकानों पर हवाई हमले किए और इसके बाद ईरान ने कतर में एक अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हमला किया.
  3. इन घटनाओं के बाद यह कयास लगाए जाने लगे कि तीनों देश किसी बड़े सुरक्षा गठजोड़ की दिशा में बढ़ रहे हैं. हालांकि सऊदी और खाड़ी देशों के अधिकारियों ने इन अटकलों को खारिज कर दिया है.

पाकिस्तान खेल रहा था ‘न्यूक्लियर’ वाला खेल

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए रक्षा समझौते को लेकर कई सवाल भी उठे हैं, खासकर इसलिए क्योंकि पाकिस्तान एक परमाणु हथियार संपन्न देश है. दुनिया में पाकिस्तान ही ऐसा इस्लामिक देश है, जिसके पास परमाणु हथियार है. इस समझौते के न्यूक्लियर इम्पैक्ट को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशीलता बनी हुई है. दरअसल भारत-पाकिस्तान के सैन्य टकराव के तुरंत बाद ये डिफेंस पैक्ट सामने आया था, जिसे लेकर सवाल ये उठने लगे थे कि भारत पर इसका कितना प्रभाव होगा.
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तुर्की निकला पाकिस्तान-सऊदी के डिफेंस पैक्ट से.
एफपी की रिपोर्ट के मुताबिक मई में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए टकराव को शांत कराने में सऊदी अरब भी भूमिका निभाई. रियाद के भारत के साथ भी अच्छे संबंध हैं, जबकि वह पाकिस्तान की आर्मी को अपनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करने के लिए उससे डिफेंस पैक्ट कर चुका है. इसके साथ ही ये तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि सऊदी अरब, भारत का तीसरा सबसे बड़ा पेट्रोलियम आपूर्ति करने वाला देश है. ऐसे में पाकिस्तान ये निश्चिंतता नहीं ला सकता है कि कभी भी सैन्य टकराव की स्थिति में सऊदी सीधा-सीधा उसके साथ खड़ा होगा.

क्या अमेरिका के दबाव में आ गया तुर्की?

हालांकि तुर्की ने पाकिस्तान के साथ खड़े होने की प्रतिबद्धता दिखाई है. ऐसे में उसकी इस्लामिक नाटो बनाने की कोशिश थी, जिससे डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में तुर्की पीछे हट गया है. तुर्की नाटो देशों में शामिल है, इसके अलावा अमेरिकी फाइटर जेट एफ-35 की डील भी वो करना चाहता है. अब तक ये डील अटकी हुई है, ऐसे में तुर्की ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहता, जिससे अमेरिका किसी भी तरह से नाराज हो.

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