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सऊदी की टेंशन इस देश ने बढ़ाई! इजरायल नहीं तो असली दुश्मन कौन? प्रिंस सलमान ने क्यों की डिफेंस डील

पाकिस्तान और सऊदी अरब ने 17 सितंबर 2025 को स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस अग्रीमेंट साइन किया, जो मुख्यतः ईरान के खिलाफ बैलेंस बनाने का प्रयास है. इजरायल की कतर एयरस्ट्राइक के बाद यह डील हुई. ऐतिहासिक संबंध मजबूत हैं, अमेरिका की मंजूरी है, लेकिन क्षेत्रीय तनाव बढ़ा है.
Pakistan Saudi Arabia Deal: सऊदी में बुधवार को हुए एक बड़े समझौते ने पूरी दुनिया को चौंका दिया. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, आर्मी चीफ फील्ड मार्शल असीम मुनीर और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की मौजूदगी में दोनों देशों ने ‘स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट’ पर दस्तखत किए. यह समझौता ऐसे वक्त हुआ जब 9 सितंबर को इजरायल ने कतर पर एयरस्ट्राइक की थी. माना जा रहा है कि सऊदी अरब की भी यह चिंता है. लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि असल चिंता इजरायल नहीं, बल्कि ईरान है. किंग्स कॉलेज लंदन के डिपार्टमेंट ऑफ वॉर स्टडीज में सीनियर फेलो आयेशा सिद्दीका का मानना है कि यह डील सऊदी अरब के लिए ‘ईरान से बैलेंस बनाने की कोशिश’ है. द प्रिंट में उन्होंने इससे जुड़ा एक लेख लिखा.
सऊदी का भरोसा पाकिस्तान पर क्यों?
सऊदी अरब और पाकिस्तान का रिश्ता नया नहीं है. 1960 के दशक से पाकिस्तानी फौज सऊदी राजशाही की सुरक्षा करती रही है. मक्का की घेराबंदी (1979) के बाद से सऊदी की राजशाही को हमेशा डर बना रहा है, और पाकिस्तान उसके लिए सबसे भरोसेमंद साथी साबित हुआ. कई बार मतभेद हुए- जैसे 1991 में इराक पर अमेरिका के हमले में पाकिस्तान ने सीधे युद्ध में हिस्सा नहीं लिया. 1991 में उस समय के आर्मी चीफ जनरल असलम बेग ने कुवैत पर हमले के बाद अमेरिका की इराक के खिलाफ जंग में पाकिस्तानी सैनिक भेजने से मना कर दिया था. वहीं 2015 में यमन युद्ध में पाकिस्तानी संसद ने सेना भेजने से मना कर दिया. लेकिन फिर भी रिश्ते कभी टूटे नहीं.
असली निशाना ईरान?
कागज पर यह समझौता ‘इजरायल’ के खिलाफ जैसा दिखता है, लेकिन असल मकसद ईरान है. हाल ही में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को निशाना बनाया. इसके बाद सऊदी अरब को डर है कि ईरान जवाबी कदम उठा सकता है. ऐसे में सऊदी अरब पाकिस्तान की न्यूक्लियर क्षमता और सैन्य ताकत को अपने साथ जोड़ना चाहता है. ऐसी डील सीधे लड़ाई से ज्यादा इशारा करती हैं. वहीं इस डील के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने साफ कहा, ‘जो हमारे पास है, वो (सऊदी अरब) के लिए उपलब्ध होगा.’ इसका मतलब यह भी निकाला जा रहा है कि पाकिस्तान अपने स्ट्रैटेजिक हथियारों का कुछ हिस्सा सऊदी में तैनात कर सकता है.
अमेरिका की ‘खामोश मंजूरी’
इस समझौते से पाकिस्तान और सऊदी ट्रंप को आंख नहीं दिखा रहे. न ही सऊदी की अमेरिका से दूरी को दिखाता है. बल्कि माना तो ये जा रहा है कि अमेरिका से बातचीत के बाद ही यह डील हुई. एक्सपर्ट्स के मुताबिक अमेरिका सऊदी की सुरक्षा का बोझ पाकिस्तान पर डालना चाहता है ठीक वैसे ही जैसे 1947 के बाद ब्रिटेन ने किया था. हालांकि यह भी सच है कि हाल ही में कतर पर हमले के बाद पश्चिमी देशों में इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की ‘लापरवाह नीतियों’ को लेकर नाराजगी बढ़ी है.
पाकिस्तान-सऊदी क्या मैसेज दे रहे?
इस समझौते ने ईरान के लिए नए सवाल खड़े कर दिए हैं. चीन, जो ईरान और सऊदी दोनों का करीबी है, इस बढ़ते तनाव को लेकर परेशान हो सकता है. इस डिफेंस डील से पाकिस्तान को मुस्लिम दुनिया में अपना कद बढ़ाने का मौका मिल रहा है. वहीं सऊदी अरब अपने लोगों को दिखा रहा है कि वह ईरान से पीछे नहीं है. लेकिन हकीकत यह है कि इससे पूरे मध्य-पूर्व का पावर बैलेंस और जटिल हो गया है.




