Presidential Reference: राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों को लेकर बहस छिड़ी हुई है. केरल, तमिलनाडु और पंजाब के गवर्नर की ओर से पूर्व में उठाए गए कदमों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया था. शीर्ष अदालत का यह फैसला खासतौर पर तमिलनाडु से जुड़ा था. कोर्ट के फैसले के बाद एक और नया संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया.
- राज्यपाल के कदम के खिलाफ तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी याचिका
- दो जजों की पीठ ने दिया था बड़ा फैसला, अब प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर होगी सुनवाई
- राष्ट्रपति और राज्यपाल के संवैधानिक अधिकारों और शक्तियों से जुड़ा है यह मामला
विधेयक को स्वीकार करने का क्या है संवैधानिक प्रावधान?
पांच जजों की संविधान पीठ ही क्यों कर रही सुनवाई?
राष्ट्रपति की ओर से प्रेसिडेंशियल रेफरेंस मांगे जाने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ इसपर 22 जुलाई 2025 को विचार करेगी. अन्य फैसलों की तरह इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई राय बाध्यकारी नहीं होगी. संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत किए गए प्रावधान के अनुसार, प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर पांच जजों की संविधान पीठ ही सुनवाई कर सकती है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट मेजोरिटी ओपिनयन के साथ प्रेसिडेंशियल रेफरेंस को वापस लौटा देगा. संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सहायता और सलाह पर कार्य करता है. सलाहकारी अधिकार क्षेत्र उसे कुछ संवैधानिक मामलों पर कार्य करने के लिए स्वतंत्र सलाह लेने का अधिकार देता है. राष्ट्रपति ने 1950 से अब तक कम से कम 15 मौकों पर इस शक्ति का प्रयोग किया है.
