दिल्ली

केवल जज ही कम नहीं हैं, ‘वकीलों की कमी’ के कारण निचली अदालतों में 63 लाख केस पेंडिंग, क्रिमिनल मामले सबसे ज्यादा

63 lakh cases pending in lower courts due to lack of counsel: देश की अदालतों में केवल जजों की कमी के कारण ही केस पेंडिंग नहीं पड़े हैं. राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid) के आंकड़े के मुताबिक निचली अदालतों में केवल वकीलों की कमी के कारण ही 63 लाख से ज्यादा मामले पेंडिंग पड़े हैं. ऐसे मामलों में सबसे ज्यादा संख्या क्रिमिनल केस की है और उत्तर प्रदेश इसमें सबसे ऊपर है.

नई दिल्ली.

देश की निचली अदालतों में पेंडिंग पड़े 4 करोड़ से ज्यादा मामलों में से लगभग 63 लाख मामले तो केवल वकील नहीं होने के कारण ही पेंडिंग हैं. राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid) के मुताबिक 20 जनवरी तक पेंडिंग पड़े ऐसे मामलों में 78 फीसद मामले क्रिमिनल और बाकी सिविल केस हैं. वकीलों की कमी के कारण पेंडिंग मामलों की संख्या सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में है. आंकड़ों से पता चलता है कि केवल वकीलों के न होने के कारण ऐसे हजारों मामले लंबित सूची में पड़े हैं. केवल दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, यूपी और बिहार को मिलाकर ही ऐसे 63 लाख मामलों में से 77.7 फीसद या 49 लाख से अधिक मामले पेंडिंग हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के मुताबिक अदालतों में पेंडिंग केस में वकील के नहीं होने के कई कारण हो सकते हैं. जिसमें मुकदमा लड़ रहे वकीलों की मौत, जब मामले चल रहे होते हैं तो वकीलों की व्यस्तता, अभियोजन द्वारा वकीलों को तय करने में देरी और मुफ्त कानूनी सेवाओं की कम पहुंच जैसे कारण भी जिम्मेदार होते हैं. निचली अदालतों में मुकदमों में होने वाली देरी सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है. ऐसा कई कारणों से होता है. जिसमें जजों के सामने मामलों की एक बड़ी संख्या, पर्याप्त जजों की कमी और विभिन्न कारणों से मामले का स्थगन शामिल होता है. उनमें से एक कारण वकील उपलब्ध नहीं होना भी है.

अक्सर वकीलों पर काम का बहुत अधिक बोझ होता है. जिस तरह से अदालतों में रजिस्ट्री काम करती है, उसमें मुकदमों की सूची अंतिम समय में आती है. इससे वकील अक्सर किसी भी सुनवाई पर मौजूद होने से चूक जाते हैं. दूसरा कारण यह है कि भारत में एक औसत केस की सुनवाई को पूरा होने में चार साल लगते हैं. जब मुकदमेबाजी लंबे समय तक जारी रहती है, तो पीड़ित व्यक्ति को भारी कानूनी फीस का भुगतान करना महंगा पड़ता है. जबकि केंद्रीय कानून मंत्रालय के अलग-अलग आंकड़ों से पता चलता है कि 2017-18 और 2021-22 के बीच एक करोड़ से अधिक लोगों ने कानूनी सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से प्रदान की जाने वाली निशुल्क कानूनी सेवाओं का लाभ उठाया है. जबकि कानून के जानकारों का कहना है कि इस आंकड़े को मान लेना कठिन है और इसकी अधिक जांच होनी चाहिए.

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