मोदी सरकार से जनगण को बचाओ, देश बचाओ !

हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत दर्ज करने के बाद केंद्र पर सत्तारुढ़ भाजपा को यह भरोसा हो चला है कि आज के दौर के भारत में ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो उसे मात दे सके।
हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत दर्ज करने के बाद केंद्र पर सत्तारुढ़ भाजपा को यह भरोसा हो चला है कि आज के दौर के भारत में ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो उसे मात दे सके। अपने इसी गुमान के चलते भाजपा सरकार जनता की भावनाओं की कद्र किए बगैर मनमाने फैसले लेती है। लेकिन भाजपा को ये याद रखना चाहिए कि देश में अब भी लोकतंत्र जिंदा है। 28 और 29 मार्च को मजदूर संघों की दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल से जो माहौल बना है, उससे यह आभास होता है कि मोदी सरकार के आगे सभी लोग आत्मसमर्पण नहीं कर रहे हैं, कुछ लोग हैं, जो अब भी विरोध की ताकत और हिम्मत रखते हैं। सीटू, एटक, ऐक्टू, और इंटक समेत 10 केंद्रीय मजदूर संघों के संयुक्त फोरम ने देश के तमाम मेहनतकश लोगों से इस हड़ताल में शामिल होने का आह्वान किया और इसका व्यापक असर देखने मिल रहा है।
कम से कम 20 करोड़ लोग इस हड़ताल का हिस्सा बन रहे हैं। किसान-आंदोलन के नेतृत्वकारी मंच संयुक्त किसान मोर्चा और कई छात्र संगठन भी इस हड़ताल का समर्थन कर रहे हैं। कोयला, इस्पात, तांबा, तेल, दूरसंचार, डाक, आयकर और बीमा जैसे विभिन्न क्षेत्रों तथा असंगठित क्षेत्रों के श्रमिक, रेलवे और रक्षा क्षेत्र की यूनियनें और बैंक कर्मचारी भी हड़ताल के समर्थन में एकजुट हुए हैं। बैंक यूनियनें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण की सरकार की योजना के साथ-साथ बैंकिंग कानून संशोधन विधेयक 2021 के विरोध में हड़ताल में भाग ले रही हैं। हरियाणा में एस्मा लागू होने के बावजूद बिजली, रोडवेज और ट्रांसपोर्ट कर्मियों ने हड़ताल में शामिल होने का फैसला किया। जबकि प.बंगाल में वामदलों के सत्ता से हटने का असर इस तरह नजर आया कि टीएमसी सरकार ने आदेश जारी किया है कि हड़ताल के दिन सरकारी कार्यालय खुले रहेंगे और उस दिन कर्मचारी छुट्टी भी नहीं ले सकेंगे, अनुपस्थित रहने पर उनका वेतन काटा जाएगा।
ऑल इंडिया सेंट्रल कौंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस ने कुछ प्रमुख मांगे हड़ताल के दौरान सामने रखी हैं। जिनमें महंगाई, बेरोजगारी और छंटनी का मुद्दा तो शामिल है ही। इसके अलावा चार श्रम कोड खारिज करने, काम तथा रोजगार के अधिकार की गारंटी, शहरी गरीबों के लिए मनरेगा जैसी योजना, 100 प्रतिशत एफडीआई और कारपोरेटीकरण समेत निजीकरण पर रोक, राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइप लाइन और विद्युत (संशोधन) बिल वापस लेना, फ्रंट-लाइन वर्कर्स के लिए बीमा और सुरक्षा की गारंटी, पुरानी पेंशन योजना की बहाली, खाद्य वितरण व्यवस्था व खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना, किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस लेना, देशद्रोह और यूएपीए जैसे काले कानून रद्द करना और राजनैतिक बंदियों को रिहा करना शामिल है।
इन मांगों से स्पष्ट होता है कि यह केवल मजदूरों और कर्मचारियों की हड़ताल नहीं है, बल्कि लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई भी है। क्योंकि इस हड़ताल की धार मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों को उधेड़ती हुई दिखाई देती है। यह अकारण नहीं है कि इस हड़ताल में किसान और छात्र भी शामिल हो रहे हैं। क्योंकि इन सबके सरोकार साझा हैं। मगर देश की एक और यूनियन, आरएसएस से जुड़े भारतीय मजदूर संघ को इन सबका साथ आना खटक रहा है। अजीब बात है कि मजदूरों के कल्याण का दावा करने वाली बीएमएस ने खुद को इस हड़ताल से अलग रखा है। बीएमएस का मानना है कि यह हड़ताल राजनीति से प्रेरित है और इसका मजदूरों के हित से कोई लेना देना नहीं है। बीएमएस ने सवाल किया है कि इस हड़ताल का किसान व छात्र संगठन से क्या मतलब, वे क्यों समर्थन कर रहे हैं। बीएमएस ने आरोप भी लगाया है कि मजदूरों का इस्तेमाल चंद यूनियनें अपनी पार्टियों के फायदे के लिए कर रही हैं।
बीएमएस के सवाल और आरोप पहली नजर में हास्यास्पद लग सकते हैं, लेकिन ये असल में भाजपा के उद्योगपति हितैषी रवैये की ढाल बनने के लिए उठाए गए हैं। देश में केवल मजदूर ही नहीं, बल्कि किसानों, छात्रों और स्वतंत्र आवाज रखने वालों का एक बड़ा तबका सरकार के अत्याचार का शिकार है। चाहे शाहीन बाग का आंदोलन हो या किसान आंदोलन या फिर परीक्षाओं और नौकरियों को लेकर छात्रों का आक्रोश, देश इन सबका गवाह पिछले कुछ बरसों में बना है। हर बार विरोध की आवाज़ों को कुचलने का काम सरकार ने किया है। ऐसे में अगर मजदूर संघों की संयुक्त हड़ताल में अगर ये संगठन भी शामिल होते हैं, तो इसका मतलब यही है कि देश में सरकार का विरोध करने के लिए एक बड़ा वर्ग, एक साथ उठ खड़ा हुआ है। इस हड़ताल से मोदी सरकार को मजबूर किया जा सकता है कि वो उन फैसलों को वापस ले, जिनसे कुछ उद्योगपतियों को फायदा पहुंचता है, जबकि इन वर्गों के शोषण की आशंकाएं बढ़ती हैं। इसलिए इस हड़ताल के खिलाफ खड़े होने का मतलब है अपनी कार्पोरेटपरस्ती को जाहिर करना। बीएमएस फिलहाल यही कर रही है।
वैसे इस हड़ताल को अखिल भारतीय असंगठित कामगार और कर्मचारी कांग्रेस की तरफ से भी समर्थन मिला है। कांग्रेस की तरफ से कहा गया है कि राहुल गांधी बंद में शामिल वर्गों की मांगों के पक्ष में अपनी बात रखते रहे हैं। दरअसल जो भी नागरिक इस देश के संविधान और लोकतंत्र के लिए फिक्रमंद है, उसे इस हड़ताल से एक उम्मीद बंधी है कि सरकार की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने का माद्दा अब भी इस देश के लाखों लोगों में बचा हुआ है। वर्ना तो पांच किलो मुफ्त अनाज के बदले अपने हितों को गिरवी रखने की बात खटकने लगी थी। ‘जनगण को बचाओ, देश बचाओ’ ऐसे नारों के साथ की गई हड़ताल मोदी सरकार को आत्मविश्लेषण के लिए मजबूर करती है या नहीं ये देखना होगा।




