जज से चीफ जस्टिस तक…पद पर रहते हुए जज साहब ने चलाई LPG एजेंसी, नियमों के दायरे में है या नहीं?

दिल्ली

द‍िल्‍ली हाईकोर्ट के पूर्व ज‍स्‍ट‍िस और मणि‍पुर हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्‍ट‍िस स‍िद्धार्थ मृदुल पर पद पर रहते हुए LPG एजेंसी चलाने का आरोप है. फ‍िलहाल BPCL ने उनकी एजेंसी की डीलरशिप रद्द कर दी, ज‍िसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा और सुर्खियों में आ गया.

 

दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस और मणिपुर हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश सिद्धार्थ मृदुल से जुड़ा मामला आजकल सुर्खियों में हैं. उन पर आरोप है कि उन्होंने संवैधानिक पद पर रहते हुए एलपीजी एजेंसी चलाई. 16 साल के अपने कार्यकाल में जस्टिस से चीफ जस्टिस बने मृदुल ने इसकी जानकारी भी भारत पेट्रोलियम (BPCL) को नहीं दी. लिहाजा अब कंपनी ने उनकी एजेंसी की डीलरशिप भी रद्द कर दी है. साथ ही सवाल खड़े कर दिए हैं कि कोई भी व्यक्ति जस्टिस जैसे संवेदनशील संवैधानिक पद पर रहते हुए गैस एजेंसी कैसे चला सकता है?

इस मामले का खुलासा तब हुआ जब बीपीसीएल द्वारा पूर्व ज‍स्‍ट‍िस को भेजे गए नोट‍िसों का जवाब नहीं म‍िला और कंपनी ने उनकी एजेंसी की मान्‍यता रद्द कर दी. इसके बाद एजेंसी को संचा‍ल‍ित कर रही मह‍िला मोन‍िका यादव ने हाईकोर्ट में याच‍िका दायर की और इसकी कई पर्तें खुल गईं.
बता दें कि संवैधानिक पद पर बैठने वाले न्यायाधीश शपथ और अलिखित आचार संहिता से बंधे होते हैं और उनसे उम्मीद की जाती है कि वे पद पर रहते हुए ऐसे कोई भी कारोबार न करें, जिसमें अन्य एजेंसियों से भी संबंध रखने पड़ते हों. यही वजह है कि इस मामले ने अब तूल पकड़ लिया है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक पूर्व चीफ जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल ने साल 1984 भारत पेट्रोलियम से एलपीजी एजेंसी किचन फ्लेम की डीलरशिप ली. उसके बाद 1986 में दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत शुरू कर दी. इतने साल वकालत करने के बाद इन्हें मार्च 2008 में दिल्ली हाई कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया और अक्टूबर 2023 में उन्हें मणिपुर हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया.
हालांकि रिपोर्ट कहती है कि 16 साल के अपने जस्टिस से चीफ जस्टिस बनने के कार्यकाल में भी वे किचन फ्लेम को चलाते रहे और बीपीसीएल के साथ एलपीजी वितरक समझौते को रिन्यू करवाते रहे. दोनों के बीच ये समझौते 25 अगस्त 1995, 24 अगस्त 2005, 23 अगस्त 2010, 25 अगस्त 2015, 7 मई 2025 और 29 सितंबर 2025 को बार-बार रिन्यू किए गए. वहीं अंतिम समझौता अभी भी 24 अगस्त 2030 तक वैध है.
हालांकि तभी दिसंबर 2025 को BPCL को सार्वजनिक रूप से शिकायत मिली कि सिद्धार्थ मृदुल पहले न्यायाधीश रह चुके हैं और उनके नाम पर गैस एजेंसी चल रही है, जिसकी डीलरशिप बीपीसीएल ने दी है. इन सवालों के उठने के बाद कंपनी ने 29 मई 2026 को पूर्व जस्टिस को नोटिस जारी किया. हालांकि जवाब न मिलने पर कंपनी ने दो नोटिस और जारी किए, लेकिन जब इन नोटिसों का पूर्व जस्टिस ने जवाब नहीं दिया तो कंपनी ने उनकी डीलरशिप रद्द कर दी. कंपनी ने तर्क दिया कि न्यायाधीश रहते हुए बिना पूर्व अनुमति डीलरशिप जारी रखना अनुबंध की शर्तों के खिलाफ है.
कब क्या हुआ?
  1. 1984: भारत पेट्रोलियम (BPCL) ने सिद्धार्थ मृदुल को एलपीजी गैस एजेंसी (डीलरशिप) आवंटित की.
  2. 1986: सिद्धार्थ मृदुल ने दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत शुरू की.
  3. 2008: उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया.
  4. 2023: वे मणिपुर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने.
  5. 21 नवंबर 2024: मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हुए.
  6. इस पूरे कार्यकाल के दौरान न्यायाधीश रहते हुए भी ‘किचन फ्लेम’ नाम से एलपीजी डीलरशिप उनके नाम पर जारी रही.
  7. 7 मई 2025: BPCL ने डीलरशिप समझौते का अगले 5 वर्षों के लिए नवीनीकरण किया.
  8. दिसंबर 2025: BPCL को एक सार्वजनिक शिकायत मिली, जिसमें आरोप लगाया गया कि सिद्धार्थ मृदुल पहले न्यायाधीश रह चुके हैं और उनके नाम पर गैस एजेंसी चल रही है.
  9. 29 मई 2026: BPCL ने नोटिस जारी कर कहा कि डीलरशिप समझौते की शर्तों का उल्लंघन हुआ है और पूछा कि एजेंसी क्यों न सस्पेंड की जाए.   BPCL का आरोप था क‍ि न्यायाधीश रहते हुए बिना पूर्व अनुमति डीलरशिप जारी रखना अनुबंध की शर्तों के खिलाफ था.
  10. हालांकि सिद्धार्थ मृदुल ने BPCL के किसी भी नोटिस का जवाब नहीं दिया. लिहाजा कंपनी ने 6 जुलाई 2026 को ‘किचन फ्लेम’ की एलपीजी डीलरशिप सस्पेंड कर दी. इसके बाद यह मामला इस एजेंसी की मौजूदा संचालक की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में उठाया गया.
एजेंसी संभालने वाली महिला पहुंची हाई कोर्ट
इस बीच किचन फ्लेम की डीलरशिप का संचालन देख रही मोनिका यादव दिल्ली हाई कोर्ट में पहुंची और BPCL को एजेंसी का स्वामित्व (प्रोपराइटरशिप) अपने नाम करने के आवेदन पर फैसला लेने का निर्देश देने की मांग की. हालांकि कंपनी ने डीलरशिप रद्द करने पर मोनिका ने आरोप लगाया कि इसके लिए  पूर्व जस्टिस ने जवाब नहीं दिया, लेकिन वह तो पूरी ईमानदारी और नियमों का पालन कर एजेंसी चला रही थी.