क्या न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग कानून से ऊपर? ट्विशा शर्मा केस में सास गिरिबाला सिंह की ‘करतूत’ पर उठे सवाल

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Twisha Shamra Case: ट्विशा शर्मा मामले ने न्यायिक जवाबदेही और सार्वजनिक भरोसे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह पर अपने आरोपी बेटे को बचाने और सिस्टम को प्रभावित करने के कथित आरोप लगे हैं. ऐसे में ‘बैंगलोर प्रिंसिपल्स ऑफ ज्यूडिशियल कंडक्ट’ क्या कहता है, जानिए…

 

आज पूरे देश में ट्विशा शर्मा डेथ केस की चर्चा है. इस केस में भोपाल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट का दखल है. सीबीआई ट्विशा की मौत के कारणों को ढूंढ रही है. यह केस एक न्यायिक परिवार से भी जुड़ा है. जहां ट्विशा की सांस खुद एक रिटायर्ड जज और पति वकील है. ऐसे में ट्विशा शर्मा डेथ केस ने देश के सामने एक बेहद असहज सवाल खड़ा कर दिया है.

barandbench.com की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय समाज जजों को बहुत ऊंचे पदों पर बैठाता है. लेकिन, क्या समाज उनसे जवाबदेही के भी उतने ही ऊंचे मानकों की उम्मीद रखता है? यह सवाल पूछना इसलिए जरूरी है क्योंकि ट्विशा केस की जड़ें किसी एक व्यक्ति की गलती से कहीं ज्यादा गहरी हैं. इस केस को लेकर जनता में फैली बेचैनी का सबसे बड़ा कारण घटना के बाद का व्यवहार है.
रिटायर्ड जज की भूमिका पर सवाल
विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, भोपाल की रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह पर गंभीर आरोप लग रहे हैं. वह मृतक ट्विशा की सास और मुख्य आरोपी की मां हैं. आरोप है कि घटना के तुरंत बाद उन्होंने अपने रसूख का इस्तेमाल किया. उन्होंने कानूनी और प्रवर्तन प्रणाली से जुड़े प्रभावशाली लोगों से संपर्क साधा. कथित तौर पर उन्होंने अपने बेटे को कई दिनों तक कानून की पकड़ से दूर रखने में मदद की.
ट्विशा के चरित्र पर उठाई उंगली
इतना ही नहीं, सार्वजनिक रूप से दिए गए बयानों में ट्विशा के चरित्र पर भी सवाल उठाए गए. उसे मानसिक रूप से अस्थिर, लापरवाह और जल्दबाज बताया गया. एक पूर्व न्यायिक अधिकारी की तरफ से इस तरह के बयान आना लोगों को परेशान कर रहा है.
सिर्फ ‘सही होना’ काफी नहीं, ‘सही दिखना’ भी जरूरी
ये आरोप जांच का विषय हैं, लेकिन संस्थान के तौर पर ये बातें न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं. ज्यूडिशियल एथिक्स यानी न्यायिक नैतिकता में यह फर्क बहुत मायने रखता है कि आप वास्तव में क्या हैं और दुनिया आपको कैसे देख रही है. यूनाइटेड नेशन के ‘बैंगलोर प्रिंसिपल्स ऑफ ज्यूडिशियल कंडक्ट’ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त ढांचा है. इसके अनुसार, जजों के लिए ‘सही होना’ और ‘सही होने का दिखावा’ करना, दोनों ही उनकी बुनियादी जिम्मेदारियां हैं. न्यायपालिका पर जनता का भरोसा सिर्फ गलत काम से नहीं टूटता, बल्कि ऐसे व्यवहार से भी कम होता है जो पक्षपात या प्रभाव का आभास कराता हो.
जनता की उम्मीदें और न्यायिक मानक
बैंगलोर प्रिंसिपल्स साफ कहते हैं कि एक जज का आचरण ऐसा होना चाहिए जिससे न्यायपालिका की ईमानदारी में लोगों का भरोसा बढ़े. एक सदी पुराने मशहूर कानूनी फैसले ‘R v. Sussex Justices’ का हवाला देते हुए यह भी कहा गया है कि ‘न्याय न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए.’ जनता एक जज से समाज के अन्य नागरिकों के मुकाबले कहीं ज्यादा ऊंचे व्यवहार की मांग करती है. असल में, समाज जजों से लगभग निष्कलंक आचरण की उम्मीद करता है.
पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच की जरूरत
ट्विशा मामले में मुख्य मुद्दा यही है कि क्या न्यायिक पदों पर बैठे लोगों के लिए जवाबदेही अधिक नहीं होनी चाहिए? जब किसी न्यायिक अधिकारी का परिवार गंभीर आरोपों में घिरता है, तो व्यवस्था को ज्यादा पारदर्शी होना चाहिए. ऐसे मामलों में अक्सर स्वतंत्र जांच एजेंसियों को शामिल किया जाता है. स्थानीय जज खुद को सुनवाई से अलग कर लेते हैं और सरकारी वकील अनौपचारिक बातचीत से बचते हैं. इसका मकसद किसी को दोषी साबित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि न्यायिक रसूख सामान्य कानूनी प्रक्रिया में बाधा न बने.