Breaking News

लोगों को अदालत के फैसलों की आलोचना करने का पूरा अधिकार : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसला देते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश में दखल देने से मना कर दिया, जिसमें मुंबई के वर्सोवा-भायंदर रोड प्रोजेक्ट के लिए हजारों मैंग्रोव (समुद्री पेड़) हटाने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह सड़क बनने से आम लोगों को बड़ा फायदा होगा, खासकर ट्रैफिक जाम कम होगा और सफर आसान हो जाएगा।

नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने माना कि इस प्रोजेक्ट का ‘महत्वपूर्ण और सकारात्मक असर’ पड़ेगा। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि बीएमसी (मुंबई नगर निगम) हर साल हाई कोर्ट को रिपोर्ट देगी, जिसमें बताया जाएगा कि जितने मैंग्रोव हटाए गए हैं, उनकी भरपाई (नए पेड़ लगाकर) कैसे की जा रही है।

इस मामले में एनजीओ ‘वनशक्ति’ ने याचिका दायर की थी। उनका आरोप था कि बीएमसी ने पहले से किए गए पौधारोपण को दिखाकर कोर्ट से अनुमति ली। उन्होंने यह भी कहा कि सैटेलाइट तस्वीरों से साबित होता है कि कुछ बातें सही तरीके से नहीं बताई गईं। वहीं, बीएमसी की तरफ से सरकार के वकील ने कहा कि इस सड़क के बनने से ट्रैफिक कम होगा और लोगों का समय बचेगा, इसलिए यह प्रोजेक्ट जरूरी है। बताया जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 45,000 मैंग्रोव प्रभावित होंगे, जिनमें से लगभग 9,000 पेड़ हमेशा के लिए काटे जाएंगे। यह पूरा प्रोजेक्ट करीब 20,000 करोड़ रुपये का है और 103 हेक्टेयर इलाके में फैला हुआ है।

लोगों को अदालत के फैसले की आलोचना करने का अधिकार- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि लोगों को अदालत के फैसलों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने यह भी साफ किया कि न्यायपालिका को ऐसी आलोचनाओं को लेकर जरूरत से ज्यादा संवेदनशील नहीं होना चाहिए। दरअसल, कोर्ट के सामने एक याचिका आई थी जिसमें एनसीईआरटी की कक्षा 8 की पुरानी सामाजिक विज्ञान की किताब से एक टिप्पणी हटाने की मांग की गई थी। इस टिप्पणी में कहा गया था कि हाल के कुछ फैसलों में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों को अतिक्रमणकारी के रूप में देखा जाता है। याचिकाकर्ता, जो एनसीईआरटी के पूर्व सदस्य हैं, ने इस पर आपत्ति जताई थी।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने इस याचिका को सुनने से ही इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह सिर्फ एक दृष्टिकोण है और स्वस्थ आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि किताब में न्यायपालिका के अच्छे कामों का भी जिक्र है, इसलिए सिर्फ एक आलोचनात्मक टिप्पणी को हटाने की जरूरत नहीं है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि इस मामले की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई गई है। इस समिति में देश के बड़े कानूनी विशेषज्ञ शामिल हैं, जो किताब के उस अध्याय को दोबारा तैयार करेंगे जिसमें न्यायपालिका और भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों की चर्चा है।

पत्नी का खाना न बनाना क्रूरता नहीं- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के एक मामले में फैसला सुनाया कि अगर पत्नी खाना नहीं बनाती है तो पति इसे क्रूरता नहीं कह सकता। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि समय बदल गया है और पतियों को घरेलू कामों में मदद करनी चाहिए। जस्टिस संदीप मेहता और विक्रम नाथ ने कहा कि शादी जीवनसाथी के लिए होती है, नौकरानी के लिए नहीं, और अगली सुनवाई में पति-पत्नी दोनों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा।

न्यायपालिका पर नए अध्याय के लिए बनाई समिति
केंद्र सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि एनसीईआरटी की किताब में न्यायपालिका पर विवादित अध्याय को नए सिरे से तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के दो पूर्व न्यायाधीश जस्टिस इंदु मल्होत्रा एवं जस्टिस अनिरुद्ध बोस और पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल शामिल हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह जानकारी देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ को दी। इसके बाद शीर्ष अदालत ने इस मामले में स्वत: संज्ञान कार्यवाही का निपटारा कर दिया। यह विवाद एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार अध्याय से संबंधित था। इस पर आपत्ति जताते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने 25 फरवरी को अदालत का ध्यान आकर्षित किया था, जिसके बाद कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। हालांकि, अदालत ने पहले इस पुस्तक के प्रकाशन और वितरण पर रोक लगा दी थी और संबंधित अधिकारियों से जवाब भी मांगा था।

सोशल मीडिया पर ब्लैकमेल करना भी डिजिटल अरेस्ट के समान : सुप्रीम कोेर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर मीडियाकर्मियों का भेष बनाकर ब्लैकमेल करने वाले कुछ लोगों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ये लोग धोखेबाज हैं और डिजिटल अरेस्ट कर रहे हैं। यह टिप्पणी तब आई जब भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ के समक्ष कहा कि सोशल मीडिया पर टैब्लॉइड और अन्य प्लेटफॉर्म चलाने वाले कुछ लोग ब्लैकमेलर की भूमिका निभा रहे हैं। सीजेआई ने मेहता से सहमति जताते हुए कहा, यह डिजिटल अरेस्ट का एक वैकल्पिक रूप है। दुर्भाग्य से, इसे अभी भी अपराध नहीं माना जा रहा है। अदालत हरियाणा, गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और असम राज्यों की पुलिस की ओर से आरोपियों को हथकड़ी पहनाए जाने, रस्सियों से बांधे जाने, लाठियों से पीटे जाने, जमीन पर घुटने टेकने, सीढ़ियों से घसीटे जाने की तस्वीरें और रील जैसे मीडिया को अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम पेज/हैंडल पर अपलोड करने की कार्रवाई को उजागर करने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले में अदालत के आदेश के अनुपालन के परिणाम की प्रतीक्षा करने को कहा। इसमें न्यायालय ने सभी राज्यों की पुलिस को एक नियमावली लागू करने का निर्देश दिया था, जिसमें अभियुक्तों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाली किसी भी सामग्री को प्रदर्शित करने से रोकने वाले दिशानिर्देश शामिल हैं।

सीएम सिद्धरमैया के इशारे पर धमकी संबंधी याचिका की सुनवाई से इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका की सुनवाई से इन्कार कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने एक संपत्ति पर कब्जा करने के लिए धमकियों की साजिश रची है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ को बताया कि उनका मुवक्किल कर्नाटक में प्रवेश नहीं कर पा रहा है और उसे मजबूर होकर दिल्ली में रहना पड़ रहा है। पीठ ने पूछा, क्या कर्नाटक के मुख्यमंत्री दिल्ली में आपके पीछे लोगों को भेज रहे हैं? इस पर वकील ने जवाब दिया, दिल्ली में नहीं, यह कर्नाटक में हो रहा है। पीठ ने सवाल किया कि याचिकाकर्ता ने संबंधित उच्च न्यायालय का रुख क्यों नहीं किया। इस पर वकील ने जवाब दिया, धमकियों के कारण मुवक्किल कर्नाटक में प्रवेश नहीं कर पा रहा हूं। इसके बाद पीठ ने एक समिति का उल्लेख किया और पूछा कि क्या याचिकाकर्ता उस समिति का नेतृत्व कर रहा है? शीर्ष कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि याचिकाकर्ता अदालत में राजनीतिक लड़ाई लड़ रहा है। जब पीठ ने दो व्यक्तियों द्वारा दायर इस याचिका की सुनवाई करने में अनिच्छा दिखाई, तो वकील ने उसे वापस लेने की अनुमति मांगी।

ब्राह्मणों के खिलाफ नफरती भाषण को अलग अपराध मानने की मांग वाली अर्जी पर सुनवाई से सुप्रीम इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ नफरती भाषण को अलग से दंडनीय अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इन्कार कर दिया। जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने याचिकाकर्ता महालिंगम बालाजी की दलीलें सुनने के बाद याचिका खारिज कर दी। बाद में याचिकाकर्ता ने इसे वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा, किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरती भाषण नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस तरह की समस्याओं का समाधान शिक्षा, बौद्धिक विकास, सहिष्णुता और धैर्य से संभव है। उन्होंने कहा कि समाज में भाईचारे होगा, तो नफरती भाषण स्वत: ही खत्म हो जाएगा। याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ नफरती भाषण को जाति आधारित भेदभाव के रूप में मान्यता दी जाए और इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। पीठ ने कहा कि ऐसे मुद्दों को उठाने के लिए उचित मंच उपलब्ध हैं और न्यायपालिका हर सामाजिक या नीतिगत विषय में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

 

 

डोनेट करें - जब जनता ऐसी पत्रकारिता का हर मोड़ पर साथ दे. फ़ेक न्यूज़ और ग़लत जानकारियों के खिलाफ़ इस लड़ाई में हमारी मदद करें. नीचे दिए गए बटन पर क्लिक कर क्राइम कैप न्यूज़ को डोनेट करें.
 
Show More

Related Articles

Back to top button