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तेजस्वी यादव को भारी पड़ेगी राहुल गांधी की दोस्ती, समझें RJD-कांग्रेस गठजोड़ के साइड इफेक्ट! : Opinion

 बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा सिर पर है और टिकट बंटवारा फाइनल करने से जरूरी राहुल को विदेश यात्रा लगी. तेजस्वी को सीएम फेस घोषित करने में आनाकानी, 70 सीटों के लिए अड़ जाना और डेप्युटी सीएम पद की मांग, कांग्रेस के ऐसे नखरे हैं, जो तेजस्वी को सीएम बनने में बाधक बन सकते हैं.

 

पटना
 बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की घोषणा में अब गिनती के कुछ घंटे बचे हैं. मायावती की पार्टी के 2 उम्मीदवारों को छोड़ दें तो अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने उम्मीदवारों के नाम की घोषणा नहीं की है. दोनों प्रमुख गठबंधन एनडीए और महागठबंधन में अभी तक सीटों का बंटवारा ही नहीं हुआ है. महागठबंधन में पेंच कांग्रेस की ओर से फंसा है तो एनडीए में अभी तक बातचीत ही चल रही है. वैसे दोनों गठबंधनों ने सीट बंटवारे का फार्मूला जरूर बना लिया है.

महागठबंधन में कांग्रेस तो एनडीए में चिराग को लेकर मामला फंसा है. कांग्रेस में सीट बंटवारे पर फैसला लेने के लिए आलाकमान स्तर का कोई व्यक्ति उपलब्ध नहीं है. राहुल गांधी तकरीबन हफ्ते भर की विदेश यात्रा पर थे. इसलिए महागठबंधन की सारी कवायदें ठप पड़ी हुई रहीं. एनडीए में चिराग पासवान का रुख भी तक साफ नहीं है. हालांकि वे एनडडीए में रहने और नीतीश कुमार को सीएम बनाने की प्रतिबद्धता दोहराते रहे हैं. 

अभी तक 2020 जैसे चिराग पासवान के तेवर नहीं दिखे हैं. अलबत्ता वे अधिक सीटें हासिल करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं. कभी 243 सीटों पर लड़ने की बात उन्होंने की तो कभी उनकी पार्टी ने उन्हें बिहार का नेतृत्व करने के सर्वथ योग्य बताया. हालांकि न तो चिराग में एनडीए को रोकने का दम दिखता है और न कांग्रेस में आरजेडी की बराबरी का कूवत बचा है.

कांग्रेस को मिलते रहे हैं 10 प्रतिशत वोट

कांग्रेस लाख नखरे करें और आरजेडी की बराबरी में खड़ा होने की जिद ठाने, पर सच्चाई इससे इतर है. बीते 35 साल में कांग्रेस कभी इस हालत में नहीं रही, जिससे लगे कि वह बिहार में अतीत की गरिमा हासिल करने में सक्षम है. कांग्रेस का राहु काल 2005 से शुरू होता है, जब उसकी सीटें इकाई-दहाई के आगे नहीं निकल पाईं.

 

महागठबंधन का लीडर बने आरजेडी की भी यही स्थिति रही है. जेडीयू और भाजपा की दोस्ती के आगे आरजेडी का 31 प्रतिशत वोटों वाला मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण के वोट भी अक्षुण्ण नहीं रह पाए. मुस्लिम वोटों को नीतीश कुमार के जेडीयू ने हथिया लिया तो मंदिर और सनातन (हिन्दुत्व) के नाम पर भाजपा ने वैश्य वोटों के साथ सवर्ण मतदाताओं को भी अपने पक्ष में कर लिया.
2005 से गैर एनडीए पार्टियों का पराभव शुरू हुआ, जो अब तक बरकरार है. बीच में विपक्ष के वनवास खत्म होने के तीन मौके मिले भी तो वह नीतीश कुमार की कृपा से ही संभव हो पाया.

4 से 27 सीटों के बीच झूलती रही कांग्रेस

लालू यादव और राबड़ी देवी के कार्यकाल को किनारे कर दें तो बिहार में कांग्रेस की ताकत का असली आंकलन 2005 से शुरू होता है. आजादी के बाद से लंबे वक्त तक बिहार में अकेले शासन करने वाली कांग्रेस की सर्वाधिक दुर्गति बीते 20 वर्षों में हुई है. फरवरी 2005 में हुए असेंबली चुनाव में कांग्रेस ने 10 सीटें जीती थीं. उसी साल अक्टूबर में चुनाव हुए तो कांग्रेस 9 सीटों पर आ गई. उसे 6.09 प्रतिशत वोट मिले थे.
2010 के चुनाव में एनडीए विरोध दलों की हालत और खराब हो गई. कभी बिहार में एकछ्त्र राज करने वाली कांग्रेस 4 सीटों पर सिमट गई. यह कांग्रेस के चुनावी इतिहास का सबसे खराब समय साबित हुआ. उसकी वोट हिस्सेदारी भी 8.4 प्रतिशत रह गई.
आरजेडी के साथ तालमेल कर कांग्रेस ने 2010 का चुनाव लड़ा तो उसकी किस्मत चमकी. उसे तीन दशक में सर्वाधिक 27 सीटें मिलीं. पर, वोटों में हिस्सा घटकर 6.8 प्रतिशत रह गया. 2020 का चुनाव कांग्रेस के लिए त्रासदीपूर्ण रहा. महागठबंधन के साथ कांग्रेस ने अपने हिस्से की 70 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन जीत सिर्फ 19 पर मिली और वोट हिस्सेदारी भी मामूली सुधार के साथ 9.6 प्रतिशत हो गई.
कांग्रेस की हालत यह रह गई कि उसे 2024 के लोकसभा चुनाव में भी आरजेडी की मर्जी पर निर्भर रहना पड़ा. कांग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगी और उसके उम्मीदवार कौन होंगे, इसका फैसला लालू यादव ने किया.

राहुल ने जोर लगाया, पर फॉलोअप नहीं

2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों ने एनडीए से मुकाबले के लिए राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया नाम का अलायंस बनाया. इसका फायदा बिहार में यह हुआ कि एनडीए के हाथ से 9 सीटें निकल गईं. 40 संसदीय सीटों में 39 जीत जाने का रिकार्ड बनाने वाले एनडीए को सिर्फ 30 सीटें मिलीं. अलबत्ता राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की हालत थोड़ी सुधरी और उसे लोकसभा में 99 सीटें मिल गईं, जो पिछले 2 चुनावों के मुकाबले तकरीबन दोगुनी हैं.
लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी ने देश भर में भारत जोड़ो यात्रा (बाद में भारत जोड़ो न्याय यात्रा) निकाली थी. वे भूल गए कि कांग्रेस की सीटें बढ़ने की असल वजह विपक्ष की एकता थी, न कि उनकी यात्रा का नतीजा. इससे वे इतने उत्साहित हुए कि बिहार में आरजेडी के नेतृत्व वाले विपक्षी दलों के महागठबंधन की परवाह किए बगैर संविधान और लोकतंत्र बचाने के नाम पर बार-बार आकर सभा-सम्मेलन करने लगे. संगठन को दुरुस्त किया.
तेजसवी यादव के विरोधी माने जाने वाले कन्हैया कुमार को ‘पलायन रोको, नौकरी दो यात्रा’ पर बिहार में दौड़ा दिया. हाल में उन्होंने चुनाव आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगाकर पखवाड़े भर की वोटर अधिकार यात्रा बिहार में की. पहली बार उन्हें महागठबंधन के घटक दलों को भी शामिल करने की जरूरत फील हुई. यात्रा को लोगों ने सफल भी बनाया. पर, इस बीच चुनाव आयोग ने बिहार में गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) का काम अदालती व्यवधानों के बावजूद पूरा करा लिया.
कहां उन्हें अपने वोट चोरी अभियान का अलख जगाए रखना था, जिससे कांग्रेस मजबूत हो तो वे चुनाव की चहल-पहल से बेफिक्र होकर विदेश भ्रमण पर चले गए.

कांग्रेस से आरजेडी अलग लड़ें तो फायदा

आरजेडी को अच्छी तरह पता है कि कांग्रेस के साथ रहने के लिए उसे उसकी ऊटपटांग शर्तों को स्वीकारना खतरे की पुनरावृत्ति के सिवा कुछ नहीं है. 2020 में महागठबंधन की सरकार इसलिए नहीं बन पाई कि औकात से अधिक सीटें उसने कांग्रेस को दे दीं. तेजस्वी सीएम की कुर्सी के करीब जाकर भी उस पर बैठने से चूक गए.
तेजस्वी को 5 साल तक इस बात का मलाल रहा है. इस बार वे इसे सुधार सकते थे, पर कांग्रेस के व्यामोह में वे उलझ गए हैं. चुनाव की घोषणा सिर पर है और टिकट बंटवारा फाइनल करने से जरूरी राहुल को विदेश यात्रा लगी. तेजस्वी को सीएम फेस घोषित करने में आनाकानी, 70 सीटों के लिए अड़ जाना और डेप्युटी सीएम पद की मांग, कांग्रेस के ऐसे नखरे हैं, जो तेजस्वी को सीएम बनने में बाधक बन सकते हैं.

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