JPC: क्या होती है जेपीसी, जिसकी मांग पर अड़ा विपक्ष और कब-कब गठित की गई यह समिति? जानें

नई दिल्ली
जेपीसी संसद की वह समिति होती है, जिसमें सभी पार्टियों की बराबर भागीदारी होती है। जेपीसी को यह अधिकार मिला होता है कि वह किसी भी व्यक्ति, संस्था या किसी भी उस पक्ष को बुला सकती है और उससे पूछताछ कर सकती है, जिसको लेकर उसका गठन हुआ है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जेपीसी क्या होती है? जिसकी मांग विपक्ष संसद में कर रहा है? इसका गठन कब किया जाता है? जेपीसी का गठन कब-कब हुआ? आइए जानते हैं…
दरअसल, संसद के पास कई तरह के काम होते हैं और इन्हें निपटाने के लिए सीमित समय होता है। संसद का बहुत सा काम सदनों की समितियों द्वारा निपटाया जाता है, जिन्हें संसदीय समितियां कहते हैं। संसदीय समितियां दो प्रकार की होती हैं- स्थायी समितियां और तदर्थ समितियां। तदर्थ समितियां किसी खास उद्देश्य के लिए नियुक्त की जाती हैं और जब वो अपना काम समाप्त कर लेती हैं तथा अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत कर देती हैं, तब उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। प्रमुख तदर्थ समितियों में एक अहम समिति होती है ‘संयुक्त संसदीय समिति’ यानी जेपीसी।

संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी संसद की वह समिति होती है, जिसमें सभी पार्टियों की बराबर भागीदारी होती है। जेपीसी को यह अधिकार मिला होता है कि वह किसी भी व्यक्ति, संस्था या किसी भी उस पक्ष को बुला सकती है और उससे पूछताछ कर सकती है, जिसको लेकर उसका गठन हुआ है। अगर वह व्यक्ति, संस्था या पक्ष जेपीसी के समक्ष पेश नहीं होता है तो यह संसद की अवमानना माना जाएगा। इसके बाद जेपीसी संबंधित व्यक्ति या संस्था से इस बाबत लिखित या मौखिक जवाब या फिर दोनों मांग सकती है।

संसदीय समितियों की कार्यवाही गोपनीय होती है, लेकिन प्रतिभूति और बैंकिंग लेन-देन में अनियमितताओं के मामले में एक अपवाद है। इसमें समिति निर्णय लेती है कि मामले में व्यापक जनहित को देखते हुए अध्यक्ष को समितियों के निष्कर्ष के बारे में मीडिया को जानकारी देनी चाहिए।
मंत्रियों को आम तौर पर सबूत देने के लिए जेपीसी नहीं बुलाती है। हालांकि, प्रतिभूति और बैंकिंग लेनदेन की जांच में दोबारा अनियमितताओं के मामले में फिर एक अपवाद है। इस मामले में जेपीसी अध्यक्ष की अनुमति के साथ, मंत्रियों से कुछ बिंदुओं पर जानकारी मांग सकती है।
किसी मामले में साक्ष्य मांगने को लेकर विवाद पर अंतिम शक्ति समिति के अध्यक्ष के पास होती है।
जेपीसी में सदस्यों की संख्या अलग-अलग मामलों में भिन्न हो सकती है। इसमें अधिकतम 30-31 सदस्य हो सकते हैं, जिसका अध्यक्ष बहुमत वाली पार्टी के सदस्य को बनाया जाता है। लोकसभा के सदस्य राज्यसभा की तुलना में दोगुने होते हैं। उदाहरण के लिए यदि संयुक्त संसदीय समिति में 20 लोकसभा सदस्य हैं तो 10 सदस्य राज्यसभा से होंगे और जेपीसी के कुल सदस्य 30 होंगे।
इसके अलावा समिति में सदस्यों की संख्या भी बहुमत वाली पार्टी की अधिक होती है। किसी भी मामले की जांच के लिए समिति के पास अधिकतम 3 महीने की समयसीमा होती है। इसके बाद संसद के समक्ष उसे अपनी जांच रिपोर्ट पेश करनी होती है।
संसदीय इतिहास पर नजर डालें तो अलग-अलग मामलों को लेकर कुल आठ बार जेपीसी का गठन किया जा चुका है।

संयुक्त संसदीय समिति का गठन तब होता है जब प्रस्ताव को एक सदन द्वारा अपनाया जाता है और दूसरे सदन द्वारा इसका समर्थन किया जाता है। जेपीसी के गठन का एक अन्य तरीका भी होता है। इसमें दोनों सदनों के दो पीठासीन प्रमुख एक दूसरे को पत्र लिख सकते हैं, एक दूसरे से संवाद कर सकते हैं और संयुक्त संसदीय समिति का गठन कर सकते हैं।
– सबसे पहले जेपीसी का गठन साल 1987 में हुआ था, जब राजीव गांधी सरकार पर बोफोर्स तोप खरीद मामले में घोटाले का आरोप लगा था।
– दूसरी बार जेपीसी का गठन साल 1992 में हुआ था, जब पीवी नरसिंह राव की सरकार पर सुरक्षा एवं बैंकिंग लेन-देन में अनियमितता का आरोप लगा था।
– तीसरी बार साल 2001 में स्टॉक मार्केट घोटाले को लेकर जेपीसी का गठन हुआ था।
– चौथी बार साल 2003 में जेपीसी का गठन भारत में बनने वाले सॉफ्ट ड्रिंक्स और अन्य पेय पदार्थों में कीनटाशक होने की जांच के लिए किया गया था।
– पांचवीं बार साल 2011 में टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच को लेकर जेपीसी का गठन हुआ था।
– छठी बार साल 2013 में वीवीआईपी चॉपर घोटाले की जांच को लेकर जेपीसी का गठन हुआ।
– देश में मोदी सरकार आने के बाद पहली बार 2015 में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास बिल को लेकर जेपीसी का गठन किया गया।
– साल 2016 में आठवीं और आखिरी बार एनआरसी मुद्दे को लेकर जेपीसी का गठन हुआ था।




