अदालत ने सीआरपीएफ डीजी पर लगाया 20 हजार रुपये जुर्माना, आदेश न मानना पड़ा महंगा

रणजीत कुमार सिंह बनाम कुलदीप सिंह मामले में जस्टिस नजमी वजीरी ने अपने फैसले में लिखा है, अदालत की बैंच ने इस साल नौ जून को आदेश पारित किया था। डीजी कुलदीप सिंह को एक तय समय सीमा के भीतर अदालत के आदेशों का पालन करने के लिए कहा गया। लेकिन डीजी की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला…
दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय अर्धसैनिक बल ‘सीआरपीएफ’ के डीजी कुलदीप सिंह पर अदालत के आदेशों का पालन न करने के चलते जुर्माना लगाया है। खास बात ये है कि डीजी को बीस हजार रुपये का अर्थ दंड अपनी जेब से भरना होगा। सीआरपीएफ के एग्जीक्यूटिव कैडर से संबंधित एक अधिकारी द्वारा किए गए केस में हाईकोर्ट ने डीजी को आदेश दिया था कि वे इस पर विस्तृत आदेश ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ निकालें। अदालत द्वारा तय की गई अवधि में सीआरपीएफ डीजी ने इस मामले में कोई आदेश नहीं निकाला। नतीजा, दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस नजमी वजीरी ने बल के डीजी कुलदीप सिंह पर अर्थ दंड लगा दिया। दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले की आगामी सुनवाई 24 नवंबर को होगी।
नाइंसाफी को लेकर खटखटाया अदालत का दरवाजा
बता दें कि सीआरपीएफ में कैडर समीक्षा को लेकर एग्जीक्यूटिव कैडर से जुड़े अधिकारी दिल्ली हाईकोर्ट में चले गए थे। हालांकि कैडर समीक्षा का यह मामला पिछले कई वर्षों से चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले पर सुनवाई हुई थी। उसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट में अलग से कुछ अधिकारियों ने अपने साथ हो रही नाइंसाफी को लेकर याचिका दायर कर दी। दूसरी तरफ, केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा अभी तक डीओपीटी के पास कैडर रिव्यू प्रपोजल जमा नहीं करा सका है। नियमानुसार, यह प्रपोजल जून 2021 तक डीओपीटी के पास पहुंच जाना चाहिए था। पिछली बार हुए कैडर रिव्यू के तहत कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी ने 2015 के दौरान समय पर रिपोर्ट जमा करा दी थी। इसके बाद 15 दिसंबर को कैडर रिव्यू कमेटी की बैठक हुई और 29 जून 2016 को केंद्रीय कैबिनेट ने उस प्रपोजल को अपनी मंजूरी प्रदान की थी। डीओपीटी के नियमानुसार, यह कैडर रिव्यू प्रक्रिया, हर पांच साल में होनी जरूरी है।
अदालत को डीजी के नाम से जारी करना पड़ा आदेश
रणजीत कुमार सिंह बनाम कुलदीप सिंह मामले में जस्टिस नजमी वजीरी ने अपने फैसले में लिखा है, अदालत की बैंच ने इस साल नौ जून को आदेश पारित किया था। डीजी कुलदीप सिंह को एक तय समय सीमा के भीतर अदालत के आदेशों का पालन करने के लिए कहा गया। डीजी की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। याचिकाकर्ता, जो कि सीआरपीएफ में अधिकारी हैं, उन्होंने अपने वकील के माध्यम से इस मामले को अदालत की अवमानना बताया। उक्त अधिकारी को उम्मीद थी कि अदालत के आदेशों के बाद उसे डीजी के माध्यम से संतुष्टिजनक जवाब मिलेगा। जब ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तो दिल्ली हाईकोर्ट ने 29 अक्तूबर को डीजी कुलदीप सिंह पर बीस हजार रुपये का अर्थ दंड लगा दिया। उन्हें इस अर्थ दंड का भुगतान, याचिकाकर्ता को केस की आगामी तारीख पर या उससे पहले करना होगा।
याचिकाकर्ता ने दी थी यह दलील
इस केस में सीआरपीएफ के मेडिकल कैडर को लेकर कई सारी बातें कही गई थीं। एग्जीक्यूटिव कैडर के अफसरों का कहना था कि डॉक्टरों को टाइम बाउंड रैंक नहीं मिलना चाहिए। उन्हें वेतन मिल रहा है, वह मिलता रहे। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश से बल के डॉक्टरों को अब रैंक और बैज भी मिलने लगा। कैडर अधिकारियों का कहना है कि यह उनके साथ भेदभाव है। नियमानुसार, इस तरह के मामले में यूपीएससी और डीओपीटी से सलाह लेकर ही कोई आदेश जारी किया जा सकता है। डॉक्टरों को इस तरह बैज और रैंक देने से डॉक्टर, पदोन्नति के मामले में एग्जीक्यूटिव कैडर से काफी आगे निकल गए। जबकि वे केवल मौखिक साक्षात्कार देकर बल में आते हैं।
कमांडेंट तक पहुंचने में लग जाएंगे 25 साल
एग्जीक्यूटिव कैडर के अधिकारी बताते हैं कि वे तरक्की के मोर्चे पर पिछड़ते जा रहे हैं। कैडर समीक्षा प्रक्रिया को लेकर ‘केंद्रीय गृह मंत्रालय और बल मुख्यालय’ गंभीर नहीं हैं। ‘सहायक कमांडेंट, डिप्टी कमांडेंट और सेकेंड इन कमांड’, इन तीन पदों पर प्रमोशन लेना मुश्किल हो गया है। सहायक कमांडेंट को पहली पदोन्नति मिलने में 10-12 साल से ज्यादा समय लग रहा है। अगर यूं ही चलता रहा तो उन्हें कमांडेंट तक पहुंचने में 25 साल लग जाएंगे। मतलब रिटायरमेंट की दहलीज पर जाकर, उन्हें बटालियन को कमांड करने का मौका मिल सकेगा।
सभी तरह के ऑपरेशन को करते हैं लीड
अधिकारियों का तर्क है कि वे बल की तरफ से हर छोटा-बड़ा जोखिम उठाते हैं। सभी तरह के ऑपरेशन को लीड करते हैं। यूपीएससी से नियुक्ति मिलने के बावजूद पदोन्नति में वे पिछड़ जाते हैं। अभी तक 2009 बैच के असिस्टेंट कमांडेंट को पहली पदोन्नति नहीं मिली है। डिप्टी कमांडेंट बनने के लिए उन्हें 12 से 15 साल का समय लग रहा है। 2004 बैच के डिप्टी कमांडेंट को 17 वर्षों के बाद भी ‘सेकेंड इन कमांड’ का पद नहीं मिल सका। अब बारी आती है कमांडेंट बनने की। 1999 बैच के कैडर अधिकारी 22 वर्षों के बाद कमांडेंट बनने का इंतजार कर रहे हैं। कैडर अधिकारियों के मुताबिक, ये तो पदोन्नति का मौजूदा हाल है। अगर मौजूदा कैडर रिव्यू में कुछ नहीं हुआ तो 3-4 साल बाद कमांडेंट बनने के लिए 25 से 30 साल लग जाएंगे।




