‘पारदर्शी नहीं है चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति’: मणिशंकर अय्यर ने सीईसी पर उठाए सवाल, काम के तरीके पर क्या कहा?
कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने मुख्य चुनाव आयुक्त के व्यवहार को ‘शर्मनाक’ बताते हुए उन्हें अब तक का सबसे खराब सीईसी करार दिया है। उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।
श्रीनगर
पाकिस्तान और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर बयान देकर सुर्खियों में रहने वाले कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने अब मुख्य चुनाव आयुक्त पर भी बयान दिया है। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का व्यवहार शर्मनाक रहा है। इस दौरान अय्यर ने दोनों चुनाव आयुक्तों को आड़े हाथों लिया है। उनका कहना है कि दो चुनाव आयुक्तों का व्यवहार भी ठीक नहीं रहा, क्योंकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से उन 14-15 नोटों का समर्थन नहीं किया, जो उन्होंने लिखे थे। इसलिए, मुझे सच में लगता है कि ये अब तक के सबसे खराब चुनाव आयुक्त रहे हैं।
भारत की कूटनीति को क्या बताया?
कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा कि हमें पाखंडी माना जा रहा है क्योंकि हम दुनिया को बताते हैं कि यह युद्ध का दौर नहीं है और फिर हम पाकिस्तान के साथ युद्ध करते हैं। हम कहते हैं कि कूटनीति और बातचीत होनी चाहिए। पाकिस्तान ही एकमात्र ऐसा देश है जिसके साथ हमारी कोई कूटनीति या बातचीत नहीं है। हमने ‘क्वाड’ में शामिल होकर चीन को भी नाराज कर दिया है। अब तो अमेरिका भी कह रहा है कि ‘क्वाड’ का कोई महत्व नहीं है। तो यह किस तरह की कूटनीति है? इसका हमारी रणनीतिक स्वायत्तता से कोई लेना-देना नहीं है।
भारत-पाकिस्तान संबंधों पर क्या बोले?
इसके पहले कांग्रेस नेता ने भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने दोनों देशों के बीच फिर से बातचीत शुरू करने की वकालत की थी। श्रीनगर में आयोजित पांचवे हल्ला बोल सम्मेलन में उन्होंने कहा कि भारत के पास पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक करने का साहस है, तो दोनों देशों के बीच बातचीत करने का साहस क्यों नहीं है।
सरकार को क्या सुझाव दिया?
अय्यर ने सुझाव दिया था कि दोनों देशों के बीच अटारी-वाघा सीमा पर भी बातचीत हो सकती है। उन्होंने कहा कि सीमा पर ही एक टेबल लगाकर दोनों देशों के प्रतिनिधि बातचीत कर सकते हैं जिससे कि संवाद के लिए किसी तीसरे पक्ष की जरूरत न पड़े। भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर अय्यर ने कहा कि अतीत के विवादों को लेकर लगातार बहस करना विदेश नीति नहीं है। उनके अनुसार, किसी भी रचनात्मक समाधान तक पहुंचने का रास्ता बातचीत से ही निकलता है।
